केरल की राजनीति में एक लंबे इंतज़ार के बाद कांग्रेस ने अंततः वी.डी. सतीसन को राज्य का नया मुख्यमंत्री चुन लिया है। इस फैसले से पहले पार्टी के भीतर एक दिलचस्प त्रिकोणीय सत्ता संघर्ष देखने को मिला।
राहुल गांधी का झुकाव के.सी. वेणुगोपाल की तरफ माना जा रहा था। वहीं, प्रियंका गांधी सतीसन के पक्ष में थीं और सोनिया गांधी की सहानुभूति दिग्गज नेता रमेश चेन्निथला के साथ थी। इस पूरी रस्साकशी में आखिरकार प्रियंका गांधी की राय को ही तरजीह मिली।
सतीसन का मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना सभी राजनीतिक दलों के महत्वाकांक्षी नेताओं के लिए एक बड़ा सबक है। पार्टी का शीर्ष नेतृत्व भले ही किसी और को पसंद करता हो और विधायकों का गणित भी किसी अन्य के पक्ष में दिख रहा हो, लेकिन अंत में जमीनी स्तर पर की गई लगातार मेहनत और जनता के बीच विश्वसनीयता की ही जीत होती है।
सतीसन ने पिछले पांच वर्षों तक जमीन पर पसीना बहाया। आखिरकार पार्टी आलाकमान को भी केरल की नब्ज पहचानने वालों की जनभावना के आगे झुकना पड़ा। यही कारण है कि इसे सिर्फ सतीसन की जीत नहीं माना जा सकता। यह सीधे तौर पर के.सी. वेणुगोपाल की हार है और उससे भी ज्यादा यह राहुल गांधी के लिए एक बड़ा झटका है।
वेणुगोपाल कोई साधारण उम्मीदवार नहीं थे। वह संगठन के प्रभारी एआईसीसी महासचिव हैं और आज की कांग्रेस में सबसे ताकतवर चेहरों में से एक माने जाते हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, नवनिर्वाचित कांग्रेस विधायकों के एक बड़े गुट का उन्हें समर्थन प्राप्त था। एक आंकड़े के अनुसार 63 में से 47 विधायक उनके साथ थे। लेकिन राहुल गांधी की पसंद और मजबूत संस्थागत पकड़ के बावजूद वह अंतिम मुकाम हासिल नहीं कर सके।
मध्य प्रदेश में कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने में दिग्विजय सिंह की भूमिका मानी गई थी। राजस्थान में अशोक गहलोत के आगे निकलने में अहमद पटेल का प्रभाव काम आया था। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल ने कथित ढाई-ढाई साल के सत्ता बंटवारे के फॉर्मूले के आगे झुकने से इनकार कर दिया था। वहीं कर्नाटक में सिद्धारमैया लगातार नेतृत्व परिवर्तन के दबाव का सामना करते आ रहे हैं।
इन सबके बीच केरल का मामला बिल्कुल अलग है। यहां किसी क्षेत्रीय क्षत्रप ने दिल्ली को चुनौती नहीं दी, बल्कि राहुल गांधी के सबसे पसंदीदा और शक्तिशाली माने जाने वाले नेता वेणुगोपाल खुद वह पद हासिल करने में विफल रहे जो वे चाहते थे। अब कांग्रेस के कई नेता यह सवाल पूछ रहे हैं कि जब राहुल गांधी और के.सी. वेणुगोपाल मिलकर केरल में अपनी मर्जी नहीं चला सके, तो अब उनकी नाराजगी से कौन डरेगा।
140 सदस्यों वाली केरल विधानसभा में यूडीएफ ने 102 सीटों के साथ शानदार जीत दर्ज की, जिसमें अकेले कांग्रेस ने 63 सीटें जीतीं। इसके बाद पार्टी को तुरंत सरकार बनाने की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए था।
इसके बजाय नेतृत्व के सवाल पर 10 दिनों तक असमंजस की स्थिति बनी रही। यह समय स्थिति को मजबूत करने का था, लेकिन यह हिचकिचाहट का प्रदर्शन बन गया। इस देरी ने दो मुख्य दावेदारों के बीच के अंतर को और गहरा कर दिया।
वेणुगोपाल के पास संगठनात्मक ताकत, दिल्ली तक पहुंच और विधायकों का संख्याबल था। दूसरी तरफ सतीसन के पास जनादेश का राजनीतिक स्वामित्व था।
विपक्ष के नेता के तौर पर उन्होंने पांच साल तक पिनाराई विजयन सरकार पर तीखे हमले किए और केरल में कांग्रेस की वापसी का सबसे पहचाना जाने वाला चेहरा बन गए। सहयोगी दलों और कार्यकर्ताओं ने यूडीएफ की जीत को सतीसन की राजनीतिक मेहनत का ही परिणाम माना।
दिल्ली में जितनी देरी हुई, सतीसन के पक्ष में भावनाएं उतनी ही मजबूत होती गईं। यूडीएफ की सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी पार्टी आईयूएमएल भी सतीसन के पक्ष में नजर आई। कार्यकर्ता उनके समर्थन में उतर आए और विधायकों को अपने क्षेत्रों में लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा। वायनाड और कोझीकोड में पोस्टर लगाकर राहुल और प्रियंका गांधी को वेणुगोपाल को थोपने के खिलाफ चेतावनी दी गई।
तब तक यह केवल आंतरिक नेतृत्व का चुनाव नहीं रह गया था। यह इस बात का सार्वजनिक परीक्षण बन गया था कि क्या कांग्रेस आलाकमान केरल की आवाज सुनने को तैयार है।
सतीसन को चुनकर कांग्रेस ने इस सच्चाई को स्वीकार किया कि चुनाव अभियान को दरकिनार कर मुख्यमंत्री नहीं चुना जा सकता। दिल्ली के समीकरण मायने रखते हैं, लेकिन जनादेश का राजनीतिक अर्थ सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
केरल के इस फैसले ने गांधी परिवार के भीतर के आंतरिक संतुलन को भी बदल दिया है। प्रियंका गांधी ने सतीसन का समर्थन किया था और उनका आकलन सही साबित हुआ। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केरल अब सीधे तौर पर प्रियंका के राजनीतिक क्षेत्र से जुड़ गया है।
राहुल गांधी द्वारा वायनाड सीट खाली करने के बाद प्रियंका 2024 के उपचुनाव में वहां से लोकसभा सांसद चुनी गई हैं। गांधी परिवार के पारंपरिक गढ़ों के बाहर किसी राज्य में उनका इतना सीधा जुड़ाव पहले कभी नहीं रहा।
सतीसन की नियुक्ति के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या प्रियंका गांधी अब कांग्रेस में राहुल गांधी से अधिक शक्तिशाली हो गई हैं। वायनाड की जीत ने उन्हें संसदीय वैधता दी है और केरल के फैसले में उनकी भूमिका ने उन्हें एक स्पष्ट आंतरिक सफलता दिलाई है।
अगर कांग्रेस नेता उन्हें राहुल की तुलना में राज्यों की भावनाओं को बेहतर समझने वाला मानने लगेंगे, तो उनकी बड़ी भूमिका का दावा और मजबूत होगा।
इस बीच सबसे बड़ा सवाल के.सी. वेणुगोपाल के भविष्य को लेकर है। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वह एआईसीसी महासचिव (संगठन) के पद पर बने रहेंगे या केरल के घटनाक्रम को उनकी साख में भारी गिरावट के तौर पर देखा जाएगा।
वेणुगोपाल ने सार्वजनिक रूप से आलाकमान के फैसले का स्वागत करते हुए सतीसन को बधाई दी। लेकिन राजनीतिक रूप से यह उनके लिए एक बड़ा झटका है, क्योंकि वह विधायकों के कथित समर्थन और राहुल गांधी की पसंद होने के बावजूद हार गए।
कांग्रेस हलकों में यह भी चर्चा है कि क्या वेणुगोपाल अब मल्लिकार्जुन खड़गे की जगह कांग्रेस अध्यक्ष बनना चाहेंगे। हालांकि केरल के घटनाक्रम के बाद यह राह बहुत मुश्किल नजर आती है।
खड़गे अभी अध्यक्ष हैं और शीर्ष पर कोई पद खाली नहीं है। वेणुगोपाल अगर संगठन महासचिव बने रहते हैं, तो अजय माकन, अशोक गहलोत और मुकुल वासनिक जैसे नेताओं की इस पद पर काबिज होने की उम्मीदों को झटका लगेगा।
सतीसन की जीत ने इस उत्तराधिकार के सवाल को सस्पेंस में डाल दिया है। इसके साथ ही इसने वेणुगोपाल को उस ढांचे के भीतर कमजोर कर दिया है जिसकी वह फिलहाल कमान संभालते हैं। केरल के नतीजों ने मल्लिकार्जुन खड़गे को भी अंदरूनी तौर पर काफी खुशी दी होगी, जिसे वह खुलकर जाहिर नहीं कर सकते।
यह फैसला पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट के बाद खड़गे और राहुल गांधी के बीच हुए विचार-विमर्श के बाद लिया गया। लेकिन पार्टी के भीतर एक वर्ग हमेशा से मानता रहा है कि राहुल के करीबी होने के कारण वेणुगोपाल अपने पद से कहीं अधिक प्रभाव का इस्तेमाल करते हैं। कुछ आलोचकों का तो यहां तक कहना था कि वह खड़गे के अधिकारों को भी कमतर आंकते हैं।
सतीसन के मुख्यमंत्री बनने को कई लोग इस शक्ति संतुलन को सुधारने के एक शांत प्रयास के रूप में देखेंगे। इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में खड़गे नहीं बल्कि राहुल गांधी हारे हैं। प्रियंका गांधी को फायदा हुआ है, वेणुगोपाल को रोक दिया गया है और सतीसन मुख्यमंत्री के रूप में उभरे हैं। केरल की कहानी के पीछे कांग्रेस की यही असली आंतरिक कहानी छिपी है।
अब सतीसन का यह मॉडल केरल की सीमाओं से परे एक राजनीतिक ब्लूप्रिंट के रूप में देखा जाएगा। यह मॉडल बताता है कि अगर किसी नेता के पास जनसमर्थन, सहयोगियों का भरोसा और जमीनी स्तर पर मजबूत विश्वसनीयता है, तो वह आलाकमान की पसंद को भी दरकिनार कर सकता है।
यह साबित करता है कि क्षेत्रीय नेता और गठबंधन सहयोगी अपने दबाव से दिल्ली में लिए गए फैसलों को बदल सकते हैं। इससे पता चलता है कि भविष्य की कांग्रेस राहुल गांधी की कमान और नियंत्रण वाली शैली से अलग हो सकती है। यह बदलाव पार्टी को अधिक लोकतांत्रिक बना सकता है।
राजनीति में भले ही बंद कमरों में बने आंकड़े प्रभावशाली लगें, लेकिन अंततः जनता की स्वीकृति ही इतिहास रचती है। जनादेश हमेशा उसी नेता के साथ चलता है जो जनता के बीच का होता है।
(रशीद किदवई लेखक, स्तंभकार और संवाद क्यूरेटर हैं. ये लेखक के निजी विचार हैं।)
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