गुजरात सरकार ने राज्य के सरकारी स्कूलों में चलने वाले मिड-डे मील कार्यक्रम में एक बड़ा बदलाव किया है। अब बच्चों की थाली में हर हफ्ते परोसी जाने वाली पारंपरिक और लोकप्रिय गुजराती मिठाई ‘सुखड़ी’ नजर नहीं आएगी। गेहूं के आटे, गुड़ और घी से बनने वाली इस पौष्टिक डिश को मेन्यू से हटा दिया गया है। इस बड़े फैसले का सीधा असर राज्य के करीब 32,230 सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले 38.5 लाख छात्रों पर पड़ेगा।
सरकार ने यह कदम केंद्र सरकार की ‘फिट इंडिया’ पहल के तहत उठाया है। हालांकि, यह फैसला कई सवाल भी खड़े कर रहा है, क्योंकि पोषण विशेषज्ञ सुखड़ी को कुपोषण से जूझ रहे बच्चों के लिए एक बेहतरीन हाई-कैलोरी सप्लीमेंट मानते रहे हैं। इस फैसले की टाइमिंग भी काफी हैरान करने वाली है। खुद गुजरात सरकार ने फरवरी 2024 में विधानसभा में यह स्वीकार किया था कि राज्य में 5.70 लाख बच्चे कुपोषित हैं, जिनमें से 1.31 लाख बच्चे गंभीर रूप से कम वजन वाले हैं।
अधिकारियों के अनुसार, राज्य के पोषण प्लान की समीक्षा करने वाली एक समिति ने बच्चों की डाइट में तेल और वसा (फैट) कम करने की सिफारिश की थी। इसी आधार पर सुखड़ी को मेन्यू से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
समिति का मानना था कि सुखड़ी में मौजूद घी ‘फिट इंडिया’ कार्यक्रम की डाइट गाइडलाइंस से मेल नहीं खाता है। इस बदलाव के साथ ही गुजरात अब स्कूल मेन्यू को हल्का और कम फैट वाला बनाने की केंद्र की मुहिम में शामिल हो गया है।
सुखड़ी, जिसे स्थानीय भाषा में ‘गोल पापड़ी’ भी कहा जाता है, गुजरात के सबसे पुराने और सबसे ज्यादा खाए जाने वाले खाद्य पदार्थों में से एक है। इसे घी में गेहूं का आटा भूनकर और फिर आंच से उतारकर उसमें गुड़ मिलाकर तैयार किया जाता है।
गुजराती घरों में पीढ़ियों से इसे तुरंत ऊर्जा देने वाले भोजन के तौर पर खाया जाता रहा है। इसे मंदिरों में प्रसाद के रूप में बांटा जाता है, बच्चों के स्कूल टिफिन में पैक किया जाता है और ऐतिहासिक रूप से यह बच्चों को ताकत देने वाला एक अहम आहार रहा है।
पोषण के नजरिए से देखा जाए तो सुखड़ी में गेहूं से मिलने वाले कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट, घी से मिलने वाले फैट-सॉल्यूबल विटामिन और भारी कैलोरी होती है। इसके अलावा, गुड़ से आयरन, पोटेशियम और मैग्नीशियम मिलता है।
कुपोषित बच्चों की डाइट में अक्सर इन्हीं सूक्ष्म पोषक तत्वों की भारी कमी पाई जाती है। भारत में मिड-डे मील लागू करने वाली सबसे बड़ी संस्थाओं में से एक, अक्षय पात्र फाउंडेशन भी सुखड़ी को गुजरात के लिए एक बेहतरीन और क्षेत्रीय रूप से अनुकूल आहार मानता है।
गुजरात सरकार ने मार्च 2024 में ही छात्रों के कैलोरी और माइक्रोन्यूट्रिएंट स्तर को बढ़ाने के स्पष्ट उद्देश्य के साथ इसे स्कूल के भोजन में शामिल किया था। राज्य के मिड-डे मील पोर्टल पर इसकी रेसिपी को सीएफटीआरआई (CFTRI) और पोषण विशेषज्ञों द्वारा प्रमाणित बताया गया था।
इसके बाद नवंबर 2024 में सरकार ने ‘मुख्यमंत्री पोषण अल्पाहार योजना’ शुरू की, जिसमें चना चाट, बाजरे की सुखड़ी और अन्य चीजें शामिल कर कार्यक्रम का विस्तार किया गया। लेकिन अब, इसे शुरू किए हुए दो साल भी नहीं बीते हैं और 2026 में पारंपरिक गेहूं-घी-गुड़ वाली सुखड़ी को पूरी तरह हटा दिया गया है।
गुजरात के बाल पोषण के आंकड़े राज्य की आर्थिक रूप से समृद्ध छवि के बिल्कुल विपरीत कहानी कहते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के अनुसार, राज्य में पांच साल से कम उम्र के लगभग 39 से 40 प्रतिशत बच्चे नाटेपन (स्टंटिंग) का शिकार हैं।
इसका मतलब है कि वे इतने कुपोषित हैं कि उनका शारीरिक विकास स्थायी रूप से प्रभावित हो चुका है। बिहार और महाराष्ट्र जैसे प्रमुख राज्यों के साथ किए गए अध्ययन में गुजरात में गंभीर रूप से कमजोर बच्चों (Severe wasting) की दर सबसे अधिक पाई गई है।
नीति आयोग की 2023-24 की एसडीजी (SDG) रिपोर्ट ने भी गुजरात को राष्ट्रीय भूख सूचकांक (हंगर इंडेक्स) में 25वें स्थान पर रखा है। प्रति व्यक्ति आय में देश के टॉप पांच राज्यों में शामिल होने के बावजूद, गुजरात को बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ के साथ ‘आकांक्षी’ (Aspirant) श्रेणी में रखा गया है।
केंद्र सरकार ने तीन साल के दौरान पोषण अभियान के तहत गुजरात को 2,879 करोड़ रुपये आवंटित किए हैं। इतनी भारी-भरकम राशि के बावजूद, पोषण कार्यक्रमों में सक्रिय लाभार्थियों की संख्या 2021-22 में 4.28 मिलियन से घटकर मार्च 2024 तक 3.78 मिलियन ही रह गई है।
गुजरात विधानसभा में पेश किए गए सरकारी आंकड़ों ने खुद इस जमीनी हकीकत को स्वीकार किया था। राज्य में 5.70 लाख कुपोषित बच्चों में से 4.38 लाख कम वजन के और 1.31 लाख गंभीर रूप से कम वजन के हैं। महज एक साल के भीतर सबसे ज्यादा 9,634 कुपोषित बच्चे अकेले खेड़ा जिले में बढ़े हैं। इसके बाद अहमदाबाद में 3,516, भरूच में 1,584 और वलसाड में 1,335 कुपोषित बच्चों की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
सुखड़ी हटाए जाने से सीधे तौर पर प्रभावित होने वाले गुजरात के 32,230 सरकारी प्राथमिक विद्यालयों के ये बच्चे मुख्य रूप से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) परिवारों से आते हैं।
राज्य के आदिवासी बहुल जिलों— दाहोद, डांग, नर्मदा, साबरकांठा, बनासकांठा, भरूच, पंचमहल, तापी, वडोदरा, वलसाड और नवसारी— में बाल पोषण के आंकड़े सबसे ज्यादा खराब हैं। यहां कुपोषण की दर गुजरात के औसत से कहीं ऊपर है। इन ग्रामीण इलाकों के कई बच्चों के लिए सरकारी स्कूल में मिलने वाला भोजन ही दिनभर का सबसे भरोसेमंद और पौष्टिक आहार होता है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने स्कूल फीडिंग प्रोग्राम में ‘फिट इंडिया’ की डाइट गाइडलाइंस लागू करने के तर्क पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि ये दिशानिर्देश मुख्य रूप से शहरी भारत में बढ़ते मोटापे और गतिहीन जीवन शैली से निपटने के लिए बनाए गए थे। इनका इस्तेमाल उन ग्रामीण बच्चों पर नहीं किया जाना चाहिए जो पहले से ही जरूरी कैलोरी और आवश्यक पोषक तत्वों की कमी से जूझ रहे हैं।
अगस्त 2019 में शुरू किया गया फिट इंडिया मूवमेंट जरूरत से ज्यादा खाने से होने वाली लाइफस्टाइल बीमारियों से लड़ने के लिए तैयार किया गया था, ना कि कुपोषण से निपटने के लिए। फैट कम करने और डाइट में फाइबर व सब्जियां बढ़ाने की इसकी सिफारिशें भारत के शहरी मध्यम वर्ग के लिए हैं।
पोषण विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि कम वजन वाले बच्चों के लिए घी बेहद फायदेमंद है क्योंकि इससे फैट-सॉल्यूबल विटामिन (A, D, E, K) और जरूरी कैलोरी मिलती है। सरकारी रिकॉर्ड भी बताते हैं कि स्कूलों में दी जाने वाली सुखड़ी कोई अनियंत्रित मिठाई नहीं थी, बल्कि इसे विशेषज्ञों की एक कमेटी ने खास तौर पर स्कूली बच्चों के पोषण के लिए वैज्ञानिक तरीके से तैयार किया था।
संशोधित मुख्यमंत्री पोषण अल्पाहार योजना के नए मेन्यू के तहत, अब पारंपरिक सुखड़ी की जगह रोटेशन में मूंग चाट, वेजिटेबल पोहा, मिक्स्ड पल्सेस (दाल) चाट, बाजरे की सुखड़ी और वेजिटेबल उपमा परोसा जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि ये नई चीजें स्वास्थ्य और फिटनेस गाइडलाइंस के अनुरूप हैं और बच्चों को एक संतुलित पोषण प्रदान करती हैं।
सरकार ने एक आधिकारिक विज्ञप्ति में बताया है कि पीएम पोषण योजना के अलावा बालवाटिका से आठवीं कक्षा तक के सभी छात्रों को पौष्टिक नाश्ता देने वाला गुजरात देश का पहला राज्य है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में इस स्नैक प्रोग्राम के लिए 617.67 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
पोषण विशेषज्ञ मानते हैं कि मूंग चाट और मिक्स्ड पल्सेस चाट जैसे दाल आधारित विकल्पों से प्रोटीन और फाइबर मिलता है, जबकि पोहा और उपमा से शरीर को आयरन और कॉम्प्लेक्स कार्बोहाइड्रेट मिलते हैं। हालांकि, उनकी सबसे बड़ी चिंता कैलोरी को लेकर है।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि पारंपरिक सुखड़ी की तुलना में इन नए विकल्पों में कैलोरी की मात्रा काफी कम है, जबकि कुपोषण का सामना कर रहे बच्चों को सबसे ज्यादा कैलोरी की ही जरूरत होती है।
इसके अलावा, इन नई डिशेज को पकाने की प्रक्रिया जटिल है, जो कम कर्मचारियों और सीमित सुविधाओं वाले गांव के स्कूलों की रसोई के लिए एक बड़ी व्यावहारिक चुनौती बन सकती है।
महज दो साल के छोटे से अंतराल में गुजरात के स्कूल पोषण कार्यक्रम में सुखड़ी को शामिल करने और फिर अचानक हटा देने से राज्य की नीतिगत निरंतरता पर बहस छिड़ गई है। मार्च 2024 में सप्लीमेंट को शामिल किया गया, नवंबर 2024 में स्नैक्स कार्यक्रम का दायरा बढ़ाया गया और अब 2026 में पारंपरिक सुखड़ी को वापस ले लिया गया है।
इस सच्चाई को स्वीकार करते हुए कि बाल कुपोषण राज्य में एक गंभीर ढांचागत चुनौती बना हुआ है, गुजरात ने मार्च 2025 में विकसित गुजरात फंड के तहत एक पोषण मिशन भी लॉन्च किया था। इसके लिए 2025-26 के बजट में 75 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है।
अधिकारियों ने उस समय यह भी माना था कि साल 2011-12 में प्रस्तावित बिल्कुल ऐसी ही एक पहल अपने तय लक्ष्य को हासिल करने में पूरी तरह विफल रही थी।
यह भी पढ़ें-
भारत का पहला डेंटल मैप: दांतों की बनावट से खुलेगा इंसान की पहचान और इलाके का राज
ईरान पर अमेरिकी-इजरायली हमले की इनसाइड स्टोरी: ट्रंप और नेतन्याहू की वह अहम बातचीत










