पश्चिम बंगाल के हालिया विधानसभा चुनाव परिणामों ने एक विरोधाभासी तस्वीर पेश की है। भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव प्रचार के दौरान महिला आरक्षण के क्रियान्वयन को एक प्रमुख मुद्दा बनाया था, लेकिन नई विधानसभा में महिलाओं की कुल भागीदारी पिछले सदन के मुकाबले कम हो गई है। पिछली विधानसभा में महिलाओं की हिस्सेदारी जहां 15 प्रतिशत थी, वहीं अब यह घटकर मात्र 12.5 प्रतिशत रह गई है।
आंकड़ों के लिहाज से देखें तो तृणमूल कांग्रेस में महिला विधायकों का अनुपात 18 प्रतिशत है, जबकि भाजपा के खेमे में यह आंकड़ा 11 प्रतिशत पर टिका है।
संसद में संविधान संशोधन विधेयकों पर चली खींचतान के बाद भाजपा ने बंगाल में महिला आरक्षण के मुद्दे को जोर-शोर से उछाला था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी रैलियों में ममता बनर्जी की सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए कहा था कि टीएमसी नहीं चाहती कि बंगाल की बेटियां विधायक या सांसद बनें।
भाजपा की बड़ी जीत के बाद उन्होंने तर्क दिया कि यह परिणाम उन दलों के लिए जनता का दंड है जिन्होंने महिला आरक्षण बिल को रोकने का प्रयास किया था।
हालांकि, चुनाव परिणामों का गहराई से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि आरजी कर मेडिकल कॉलेज जैसी घटनाओं और महिला सुरक्षा के मुद्दों के बावजूद सदन में महिलाओं की संख्या गिर गई है। पिछली विधानसभा में महिला विधायकों की संख्या 44 थी, जो अब घटकर 37 पर आ गई है। यह गिरावट तब देखने को मिली है जब पूरे चुनाव के दौरान महिलाओं से जुड़े विषय चर्चा के केंद्र में रहे थे।
उम्मीदवारों के चयन के मामले में तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा की तुलना में अधिक महिलाओं पर भरोसा जताया था। टीएमसी ने 291 सीटों पर चुनाव लड़ा और 52 महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया, जो उनके कुल नामांकन का लगभग 18 प्रतिशत था। इनमें से 14 महिलाओं ने जीत हासिल की, जिसके परिणामस्वरूप पार्टी के कुल 80 विधायकों में महिलाओं की भागीदारी 18 प्रतिशत बनी हुई है।
दूसरी ओर, भाजपा ने राज्य की सभी 294 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन महिला उम्मीदवारों की संख्या 34 तक ही सीमित रखी। यह उनकी कुल सीटों का लगभग 12 प्रतिशत हिस्सा था। भाजपा की ओर से 23 महिला प्रत्याशी चुनाव जीतने में सफल रहीं। इस प्रकार भाजपा के कुल 207 विधायकों के भारी-भरकम दल में महिला प्रतिनिधित्व करीब 11 प्रतिशत ही रह गया है।
अगर सफलता की दर यानी स्ट्राइक रेट को देखें तो भाजपा की महिला उम्मीदवारों ने 68 प्रतिशत की दर से जीत हासिल की, जबकि पार्टी का कुल स्ट्राइक रेट 70 प्रतिशत रहा। इसके उलट, तृणमूल कांग्रेस का कुल स्ट्राइक रेट और उसकी महिला उम्मीदवारों का स्ट्राइक रेट दोनों ही 27 प्रतिशत पर स्थिर रहे।
ये आंकड़े बताते हैं कि बंगाल चुनाव में महिला आरक्षण या लिंग आधारित मुद्दों ने किसी एक दिशा में सीधा काम नहीं किया। महिला उम्मीदवारों की जीत या हार काफी हद तक उनकी पार्टी के प्रति चल रही लहर पर निर्भर रही। ऐसा प्रतीत होता है कि मतदाताओं ने महिला प्रतिनिधित्व के सवाल से अधिक महत्व शासन और सत्ता के मूल्यांकन को दिया।
आरजी कर कांड ने समाज में लैंगिक एकजुटता पैदा करने के बजाय सरकार की विफलता के प्रतीक के रूप में अधिक काम किया। मतदाताओं ने मतदान करते समय उम्मीदवार के जेंडर के बजाय पार्टी की छवि को अधिक प्राथमिकता दी। भाजपा ने इस मुद्दे पर काफी ऊर्जा खर्च की थी, जहाँ बैंकुरा की रैली में मोदी ने टीएमसी पर ‘जंगल राज’ को चुनौती देने वाली बेटियों को रोकने का आरोप लगाया था।
टीएमसी ने इन आरोपों का जवाब यह कहते हुए दिया था कि वे पहले से ही विधानसभा और लोकसभा में अन्य दलों की तुलना में अधिक महिला प्रतिनिधित्व दे रहे हैं।
पार्टी ने भाजपा के दावों की हवा निकालने के लिए यह तर्क भी दिया कि उन्होंने संसद में महिला आरक्षण विधेयक का समर्थन किया था। चुनाव के बाद भी प्रधानमंत्री ने भाजपा मुख्यालय से विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम का विरोध करने वालों को महिलाओं के आक्रोश का सामना करना पड़ा है।
पिछली विधानसभा की तुलना में भाजपा के भीतर महिला विधायकों के प्रतिशत में सुधार जरूर हुआ है। पिछली बार भाजपा के 77 विधायकों में केवल 6 महिलाएं थीं, जो लगभग 8 प्रतिशत था। इस बार यह बढ़कर 11 प्रतिशत हो गया है। हालांकि, सदन की कुल तस्वीर में गिरावट ही दर्ज की गई है।
वामपंथी दलों, कांग्रेस और बसपा ने भी महिला उम्मीदवारों को पर्याप्त मौके दिए थे। वामपंथियों ने 40, कांग्रेस ने 39 और बसपा ने 24 महिलाओं को मैदान में उतारा था, लेकिन इनमें से कोई भी उम्मीदवार जीत की दहलीज पार नहीं कर सका।
कुछ सीटों पर महिलाओं के बीच कड़ा मुकाबला भी देखने को मिला। मानबाजार सीट पर सभी प्रमुख दलों ने महिला प्रत्याशियों को उतारा था। यहाँ भाजपा की मायना मुर्मू ने टीएमसी की संध्या टुडू को 27,000 से अधिक वोटों से हराकर जीत दर्ज की। कुल मिलाकर, यह चुनाव दिखाता है कि नारों और वादों के बीच विधायी निकायों में महिलाओं की वास्तविक संख्या का सफर अभी भी उतार-चढ़ाव भरा है।
यह भी पढ़ें-
अडानी एग्री फ्रेश अब हिमाचल में शुरू करेगी चेरी की खरीद, किसानों को मिलेगा बड़ा बाजार
अमेरिका के नए वीजा नियमों से भारतीयों की मुश्किलें बढ़ीं, शरण लेना हो सकता है कठिन









