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क्या वोटर लिस्ट से कटेंगे नाम या साबित होगी नागरिकता? चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

| Updated: May 27, 2026 15:23

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: चुनाव आयोग के विशेष सघन संशोधन (SIR) को दी हरी झंडी, जानें नागरिकता और मतदाता सूची पर क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (27 मई) को भारत के चुनाव आयोग (ECI) द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष सघन संशोधन (SIR) की वैधता को बरकरार रखा है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यह प्रक्रिया स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के संवैधानिक लक्ष्य को आगे बढ़ाती है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने उन रिट याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाया है, जिनमें पिछले साल जून में बिहार में एसआईआर आयोजित करने के चुनाव आयोग के निर्देश को चुनौती दी गई थी।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 तथा इसके तहत बनाए गए नियमों के मुताबिक एसआईआर (SIR) आयोजित करने का पूरा अधिकार है।

अदालत ने माना कि एसआईआर प्रक्रिया का सीधा संबंध स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने से है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत द्वारा सुनाए गए फैसले में कहा गया कि जब कानून स्वयं किसी भी समय विशेष संशोधन को अधिकृत करता है, तो इस कवायद को केवल इसलिए अमान्य नहीं किया जा सकता क्योंकि यह नियमित संशोधन के सामान्य तौर-तरीकों के अनुरूप नहीं है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि यह एसआईआर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का स्थान नहीं लेती है, बल्कि यह अनुच्छेद 324 के संवैधानिक जनादेश को एक वैधानिक रूपरेखा के भीतर मजबूती प्रदान करती है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि आयोग ने अपने वैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान की यांत्रिकी पर निर्भर नहीं करते हैं। यह मूल रूप से मतदाता सूचियों की अखंडता, सटीकता और विश्वसनीयता पर निर्भर करता है, जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की नींव है।

अदालत ने चुनाव आयोग द्वारा दिए गए उन कारणों को भी जायज ठहराया जिनमें कहा गया था कि पिछले सघन संशोधन के बाद से चार दशक से अधिक का समय बीत चुका है। इन वर्षों में बड़े पैमाने पर नाम जोड़े और हटाए गए हैं। तेजी से हुए शहरीकरण और पलायन के कारण मतदाता सूची में दोहराव और अशुद्धियों की संभावना बढ़ गई थी, जिसे सुधारना आवश्यक है।

प्रक्रिया ने किसी कानून का उल्लंघन नहीं किया

सुप्रीम कोर्ट ने उन दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि चुनाव आयोग द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के खिलाफ है।

अदालत ने इस तर्क को भी अमान्य कर दिया कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची में पहले से शामिल लोगों की नागरिकता की पूर्व धारणा को समाप्त करती है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सत्यापन के दौरान मतदाताओं से सहायक दस्तावेज मांगना नागरिकता की धारणा को नकारना नहीं है। यह केवल एक प्रक्रियात्मक तंत्र है जिसके माध्यम से आयोग मौजूदा प्रविष्टियों की पुष्टि या सुधार करता है।

अदालत ने कहा कि इस प्रक्रिया से लाल बाबू हुसैन मामले के फैसले का भी उल्लंघन नहीं हुआ है। वह फैसला केवल प्रक्रियात्मक निष्पक्षता पर जोर देता है और सत्यापन पर कोई रोक नहीं लगाता।

पीठ ने यह भी माना कि एसआईआर के तहत मतदाता सूची से नाम हटाना 1960 के नियमों के नियम 21ए के विपरीत नहीं है। इसमें नोटिस और सुनवाई के आवश्यक सुरक्षा उपाय अभी भी सुरक्षित रखे गए हैं।

दस्तावेजों की आवश्यकता पर भी चुनाव आयोग के ढांचे को अदालत ने सही ठहराया। अदालत ने कहा कि स्वीकार्य दस्तावेजों का वर्गीकरण चुनावी अखंडता बनाए रखने के उद्देश्य से किया गया है और यह बिल्कुल भी मनमाना नहीं है। आधार कार्ड को पहले के आदेश के तहत ही इसमें शामिल किया जा चुका है।

नागरिकता के सवालों की जांच का आयोग को अधिकार

शीर्ष अदालत ने तय किया कि चुनाव आयोग के पास मतदाता सूची में शामिल करने के उद्देश्य से नागरिकता से जुड़े सवालों की जांच करने का पूरा अधिकार है।

हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि आयोग का कोई भी नकारात्मक निर्णय यह अंतिम रूप से साबित नहीं करता कि वह व्यक्ति भारतीय नागरिक नहीं है। चुनाव आयोग की यह कवायद केवल मतदाता सूची तैयार करने तक सीमित है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि नागरिकता निर्धारण का यह परिणाम केवल व्यक्ति के मतदाता सूची में शामिल होने और चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने के अधिकार को प्रभावित करता है। यह किसी व्यक्ति की नागरिकता के दावों को पूरी तरह से खारिज नहीं करता है।

अदालत ने निर्देश दिया कि यदि आयोग किसी व्यक्ति के नागरिक होने की वैधानिक शर्तों को पूरा करने से संतुष्ट नहीं है, तो उसे कानूनी कार्रवाई के लिए उस व्यक्ति का मामला केंद्र सरकार के सक्षम प्राधिकारी को भेजना होगा।

अदालत ने चुनाव आयोग को यह भी निर्देश दिया कि वह संदिग्ध नागरिकता के आधार पर 2003 की बिहार मतदाता सूची से हटाए गए व्यक्तियों के नाम चार सप्ताह के भीतर केंद्र सरकार को भेजे।

पृष्ठभूमि और वर्तमान स्थिति

गौरतलब है कि अदालत ने एसआईआर प्रक्रिया पर कोई रोक नहीं लगाई थी। यह प्रक्रिया बिहार, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और पश्चिम बंगाल में पूरी हो चुकी है। उत्तर प्रदेश, गुजरात, राजस्थान जैसे कई अन्य राज्यों में यह कवायद अभी भी जारी है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस साल 29 जनवरी को मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था।

इस मामले में ज्यादातर याचिकाएं पिछले साल जून में बिहार में एसआईआर आयोजित करने के चुनाव आयोग के फैसले के बाद दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं में एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR), राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, सांसद महुआ मोइत्रा, मनोज झा, केसी वेणुगोपाल और सुप्रिया सुले शामिल हैं।

याचिकाकर्ताओं की दलीलें

याचिकाकर्ताओं ने इसे व्यापक संवैधानिक चुनौती देते हुए तर्क दिया था कि एसआईआर मतदाता सूची संशोधन ढांचे को पूरी तरह से बदल देता है। उनका मुख्य तर्क यह था कि यह अभ्यास चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने वाला एक वास्तविक निकाय बना देता है।

उनके अनुसार, कानून आयोग को यह अनुमति नहीं देता कि वह पहले से ही मतदाता सूची में शामिल नागरिकों से दस्तावेजों के माध्यम से अपनी नागरिकता साबित करने के लिए कहे।

याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर को राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) जैसी कवायद करार दिया था। उन्होंने चिंता जताई कि अगर सत्यापन लंबित रहने तक किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची से बाहर रखा जाता है, तो उसे बिना किसी औपचारिक निर्णय के उसके बुनियादी लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित कर दिया जाएगा।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(3) एक साथ कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस तरह के बड़े पैमाने पर एसआईआर को अधिकृत नहीं करती है।

चुनाव आयोग का पक्ष

इस कवायद का बचाव करते हुए चुनाव आयोग ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने एसआईआर की प्रकृति को पूरी तरह से गलत समझा है।

आयोग ने स्पष्ट किया कि यह निर्वासन या राष्ट्रीयता कानूनों के तहत विचार किया जाने वाला नागरिकता निर्णय तंत्र नहीं है। यह पूरी तरह से एक चुनावी सत्यापन अभ्यास है, जिसका एकमात्र उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल पात्र नागरिक ही मतदाता सूची में रहें।

एनआरसी जैसी प्रक्रिया के साथ की जा रही तुलना को खारिज करते हुए आयोग ने कहा कि एसआईआर जबरन जांच के बजाय एक बेहद उदार सत्यापन मॉडल अपनाता है।

आयोग ने स्पष्ट किया कि मौजूदा मामले में सत्यापन पुलिस अधिकारियों द्वारा नहीं, बल्कि चुनाव अधिकारियों द्वारा किया जा रहा है और इसमें पर्याप्त सुरक्षा उपाय शामिल हैं। इसके साथ ही आयोग ने किसी भी राजनीतिक मंशा के आरोपों को भी खारिज कर दिया।

इस मामले में विभिन्न याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, डॉ. एएम सिंघवी, गोपाल शंकरनारायणन, शादान फरासत, पीसी सेन, राजू रामचंद्रन, प्रशांत भूषण, वृंदा ग्रोवर, निज़ाम पाशा, शाहरुख आलम और फौज़िया शकील सहित कई वकील पेश हुए।

वहीं, चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी, मनिंदर सिंह, दामा शेषाद्रि नायडू और अधिवक्ता एकलव्य द्विवेदी अदालत में उपस्थित रहे। अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसारिया पेश हुए, जिन्होंने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर आयोजित करने की मांग करते हुए याचिका दायर की है।

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