हर साल 10 लाख से अधिक भारतीय शेंगेन वीजा के लिए आवेदन करते हैं। यह एक ऐसा वीजा है जो यूरोप के 27 देशों में बेरोकटोक प्रवेश का रास्ता खोलता है। महामारी के बाद पिछले पांच वर्षों में इन आवेदनों की संख्या दोगुनी से भी अधिक हो गई है। लोगों की बढ़ती आय, यात्रा के प्रति बढ़ता रुझान और नए गंतव्यों की तलाश करने वाले भारतीय पर्यटकों की नई पीढ़ी इस वृद्धि का मुख्य कारण है।
इन लाखों वीजा आवेदनों के केंद्र में वीएफएस ग्लोबल (VFS Global) है। ज्यूरिख और दुबई में मुख्यालय वाली यह दिग्गज कंपनी भारत और यूरोप के बीच एक प्रमुख द्वार के रूप में काम करती है।
पहली बार इस प्रणाली के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। 2020 से 2025 के बीच 20 यूरोपीय संघ के सदस्य देशों में फैले वीएफएस ग्लोबल के केंद्रों की 150 से अधिक निरीक्षण रिपोर्टों में कई खामियां उजागर हुई हैं।
इन चौंकाने वाले दस्तावेजों को 40 से अधिक सूचना की स्वतंत्रता (FOI) अनुरोधों के माध्यम से प्राप्त किया गया था। ये अनुरोध यूरोपीय संघ आयोग, यूके और अलग-अलग यूरोपीय संघ के सदस्य देशों से किए गए थे। एफओआई एक कानूनी ढांचा है जो बिल्कुल भारत के सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम की तरह काम करता है। इन दस्तावेजों का विभिन्न देशों के मीडिया संस्थानों के एक अंतरराष्ट्रीय सहयोगी जांच दल द्वारा गहराई से विश्लेषण किया गया है।
इस पड़ताल के तहत दिल्ली और मुंबई के वीजा केंद्रों पर लगभग 150 आवेदकों के साक्षात्कार लिए गए और वीएफएस ग्लोबल के वित्तीय फुटप्रिंट को भी ट्रैक किया गया। दस्तावेजों से पता चलता है कि यूरोपीय देशों के प्रतिनिधियों ने भारत में अपने फील्ड दौरों के दौरान कई बड़ी चिंताएं व्यक्त की हैं।
इनमें आवेदकों के व्यक्तिगत और बायोमेट्रिक डेटा को बिना एन्क्रिप्शन वाली डिस्क पर स्टोर करने और उसके असुरक्षित परिवहन की बात शामिल है। इसके अलावा ट्रैवल एजेंटों द्वारा बड़े पैमाने पर ‘वीजा शॉपिंग’ की बात भी सामने आई है। इस प्रक्रिया में जल्दी वीजा हासिल करने के लिए किसी एक देश से शेंगेन वीजा लिया जाता है, जबकि यात्री का असल गंतव्य कोई अन्य देश होता है।
आवेदकों को दी जाने वाली मूल्य वर्धित सेवाओं (VAS) को लेकर भी स्पष्ट संचार की कमी पाई गई। प्रीमियम लाउंज जैसी सुविधाएं वैकल्पिक होती हैं और इनका वीजा मिलने या न मिलने से कोई संबंध नहीं होता, लेकिन इस बात की जानकारी आवेदकों को स्पष्ट रूप से नहीं दी जा रही थी।
वहीं, वीएफएस ग्लोबल ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। कंपनी का साफ कहना है कि उसका पूरा कामकाज कड़ी और निरंतर सरकारी निगरानी के अधीन होता है।
इस बीच यूरोपीय आयोग ने हाल ही में अपनाई गई ईयू वीजा नीति रणनीति में स्पष्ट किया है कि वीजा प्रक्रिया के लिए बाहरी सेवा प्रदाताओं (ESP) पर सदस्य देशों की बढ़ती निर्भरता को देखते हुए गुणवत्ता नियंत्रण और निगरानी को और बेहतर बनाने की तत्काल आवश्यकता है।
जांच में यह भी पाया गया कि ट्रैवल एजेंटों द्वारा वीएफएस की फर्जी अपॉइंटमेंट बेची जा रही थीं। राष्ट्रीय कार्य वीजा (नेशनल वर्क वीजा) के लिए फर्जी रोजगार अनुबंध पत्रों का भी जमकर इस्तेमाल किया गया।
2024 में जर्मनी और पोलैंड के साथ वीएफएस ग्लोबल के भारत संचालन के मूल्यांकन में पाया गया कि कंपनी की सेवाएं यूरोपीय संघ के जीडीपीआर (जनरल डेटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन) नियमों का पूरी तरह से पालन नहीं कर रही थीं। ये नियम वित्तीय और कर विवरण सहित महत्वपूर्ण डेटा की सुरक्षा को नियंत्रित करते हैं।
लक्जमबर्ग: डेटा सुरक्षा में चूक और फर्जी नियुक्तियों की भरमार
भारत में 13 वीजा आवेदन केंद्रों के साथ काम करने वाले लक्जमबर्ग दूतावास ने अपनी रिपोर्ट में सबसे विस्तृत चिंताएं जताई हैं। हालांकि, दूतावास ने यह भी बताया कि उसने 2024 से 2027 के लिए वीएफएस के साथ तीन साल के एक नए अनुबंध पर हस्ताक्षर किए हैं।
2023 की एक कार्यान्वयन रिपोर्ट में प्रकाशित 2022 के निरीक्षण निष्कर्षों में सामने आया कि आवेदकों का बायोमेट्रिक डेटा बिना एन्क्रिप्शन वाली कॉम्पैक्ट डिस्क (सीडी) पर सेव किया जा रहा था। जब डेटा संग्रह में कोई तकनीकी त्रुटि होती थी, तो बायोमेट्रिक जानकारी खुले और बिना एन्क्रिप्टेड ईमेल के जरिए भेजी जा रही थी।
ऑडिटरों ने पाया कि सीडी श्रेडर उपलब्ध होने के बावजूद स्कैन किए गए आवेदनों और बायोमेट्रिक डेटा वाली डिस्क को नियमित रूप से नष्ट नहीं किया जा रहा था। परिसर से 18 महीने से अधिक पुराने डेटा वाली सीडी तक बरामद की गईं। इसके अलावा 2024 की नई दिल्ली निरीक्षण रिपोर्ट में फर्जी वीएफएस अपॉइंटमेंट और ट्रैवल एजेंटों द्वारा की जा रही ‘वीजा शॉपिंग’ की समस्या को गहराई से रेखांकित किया गया।
रिपोर्ट में कहा गया कि जून 2024 के बाद से फर्जी रोजगार अनुबंध पत्रों की बिक्री में भारी वृद्धि देखी गई है। अहमदाबाद, चंडीगढ़ और जालंधर जैसे शहरों में वीजा शॉपिंग के कारण ‘नो-शो’ की दर 50 प्रतिशत और उससे भी अधिक दर्ज की गई। रिपोर्ट में इसका सीधा दोष ट्रैवल एजेंटों पर मढ़ा गया है।
स्वीडन: निजता का अभाव और एक ही मंजिल पर प्रतिस्पर्धी कंपनी
स्वीडिश मिशन द्वारा 2023 में मुंबई कार्यालय के अचानक किए गए निरीक्षण में 19 पृष्ठों की एक रिपोर्ट तैयार की गई, जिसमें दो मुख्य चिंताएं सामने आईं। पहली यह कि वास्को नामक एक अन्य वीजा सेवा कंपनी उसी मंजिल पर काम कर रही थी। इसके बाद वीएफएस को वास्को से खुद को अलग करने के निर्देश दिए गए और बाद में वास्को को वहां से स्थानांतरित कर दिया गया।
दूसरी चिंता आवेदकों की गोपनीयता को लेकर थी। रिपोर्ट में बताया गया कि आवेदन काउंटर केवल कम ऊंचाई वाले डिवाइडर से जुड़े हुए थे। इस वजह से वीएफएस कर्मचारियों के साथ आवेदकों की बातचीत पूरी तरह निजी नहीं रह पाती थी।
2025 तक स्वीडिश मिशन के निरीक्षण में पाया गया कि मुंबई कार्यालय 15 में से 14 श्रेणियों में नियमों का पालन कर रहा था। एकमात्र विफलता मूल्य वर्धित सेवाओं (VAS) को लेकर थी।
24 पन्नों की रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया कि वीएफएस को प्राइम टाइम, प्रीमियम लाउंज और कूरियर जैसी अपनी 7 अतिरिक्त सेवाओं को पूरी तरह वैकल्पिक बताना चाहिए। यह जानकारी वेबसाइट पर भी अपडेट होनी चाहिए और प्रीमियम लाउंज के बाहर इस बारे में स्पष्ट रूप से एक डिस्क्लेमर लगाया जाना चाहिए।
स्विट्जरलैंड और हंगरी: पुराने पासपोर्ट और रिफंड प्रणाली में खामी
स्विट्जरलैंड के मिशन ने 2023 में नई दिल्ली कार्यालय का निरीक्षण किया था। इसमें 33 अलग-अलग परिचालन क्षेत्रों की जांच की गई, जिसमें वीएफएस को 6 क्षेत्रों में गैर-अनुपालक पाया गया। वीएफएस ने अपने काउंटरों पर शेंगेन और व्यक्तिगत डेटा से जुड़ी महत्वपूर्ण फैक्टशीट उपलब्ध नहीं कराई थी। इसके अलावा कंपनी ने फोटोकॉपी और कूरियर जैसी अतिरिक्त सेवाओं की वार्षिक सूची भी जमा नहीं की थी।
सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात यह रही कि वीएफएस के कार्यालय में ऐसे पासपोर्ट भी मिले जो 2020 में वापस भेज दिए गए थे, लेकिन वे आवेदकों तक नहीं पहुंचे। स्विस ऑडिटरों ने वीजा शुल्क वापसी (रिफंड) की प्रक्रिया में भी भारी गड़बड़ी पाई। उन्होंने अपनी रिपोर्ट में बेहद सख्त लहजे में लिखा कि रिफंड की यह प्रणाली बिल्कुल काम नहीं करती है और पीक सीजन के लिए कार्यालय में पर्याप्त तिजोरियां भी नहीं हैं।
दूसरी ओर हंगरी के वाणिज्य दूतावास की 2025 की एक रिपोर्ट में 2021 के एक निरीक्षण का हवाला दिया गया। नई दिल्ली में हुई इस जांच में पाया गया कि वीएफएस प्रणाली में एक महीने से अधिक पुराना आवेदक डेटा अभी भी मौजूद था। शेंगेन वीजा नियमों के तहत ऐसे डेटा को हर हाल में 7 दिनों के भीतर हटा दिया जाना चाहिए।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि हंगरी की आईटी टीम की मदद से इस समस्या को बाद में सुलझा लिया गया और अब वहां डेटा प्रतिधारण नियमों का पूरी तरह से सम्मान किया जा रहा है।
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