वीजा नियमों की सख्ती और इमिग्रेशन नीतियों में अनिश्चितता के चलते अब छात्रों का अमेरिका और कनाडा जाने का क्रेज कम हो रहा है। इसके परिणामस्वरूप वित्तीय वर्ष 2025-26 के दौरान शिक्षा ऋण के वितरण में 14% की बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
हालिया बैंकिंग आंकड़ों के मुताबिक, 2025-26 में बैंकों ने 22,116 खातों के जरिए कुल 1,786 करोड़ रुपये का एजुकेशन लोन बांटा। वहीं, इससे पिछले वित्तीय वर्ष में 22,419 खातों के माध्यम से 2,078 करोड़ रुपये का कर्ज दिया गया था।
इन आंकड़ों से यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि लोन खातों की संख्या में केवल मामूली कमी आई है, लेकिन कुल बांटी गई रकम काफी ज्यादा घट गई है। इसका सीधा मतलब है कि अब छात्र विदेश में पढ़ाई के लिए औसतन कम रकम उधार ले रहे हैं।
बैंकिंग क्षेत्र के सूत्रों का मानना है कि इस गिरावट के पीछे सबसे बड़ी वजह अमेरिका और कनाडा जैसे देशों का चुनाव करने वाले छात्रों की संख्या में भारी कमी आना है। कड़े वीजा नियमों ने कई छात्रों को अपनी विदेशी शिक्षा की योजना रद्द करने या उसे आगे टालने पर मजबूर कर दिया है।
इसी असमंजस के कारण कई मंजूर किए गए शिक्षा ऋण बांटे ही नहीं जा सके। वहीं, कुछ अन्य मामलों में छात्रों ने पहले से काफी कम रकम ही बैंक से निकाली। विदेशी शिक्षा सलाहकारों का कहना है कि यह ट्रेंड पिछले तीन सालों के मुकाबले एक बड़े और स्पष्ट बदलाव का संकेत है।
तीन साल पहले तक विदेशी शिक्षा के मामले में अमेरिका और कनाडा का ही दबदबा हुआ करता था। विदेशी शिक्षा सलाहकार भाविन ठाकर बताते हैं कि अपने उच्चतम स्तर से अमेरिका और कनाडा जाने वाले छात्रों की संख्या में लगभग 70% तक की भारी कमी आई है।
अब छात्रों का झुकाव जर्मनी, ब्रिटेन, माल्टा, इटली और फिनलैंड जैसे यूरोपीय देशों की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। इन जगहों पर न सिर्फ ट्यूशन फीस कम है, बल्कि इमिग्रेशन के नियम भी छात्रों के लिए कहीं अधिक आसान और अनुकूल माने जाते हैं।
सस्ते विकल्पों की ओर रुख करने की वजह से एजुकेशन लोन के औसत आकार में भी काफी कमी देखने को मिली है। ठाकर के अनुसार, जर्मनी में पढ़ाई का कुल खर्च करीब 15 लाख रुपये आता है, जबकि इसी तरह के किसी कोर्स के लिए अमेरिका या कनाडा में लगभग 25 लाख रुपये खर्च करने पड़ते हैं।
उन्होंने यह भी बताया कि कई छात्र विदेश जाने से पहले सिर्फ अपने पहले सेमेस्टर की फीस ही फाइनेंस करवा रहे हैं। इस फैसले से उनके द्वारा शुरुआत में लिए जाने वाले कर्ज की रकम और भी कम हो जाती है।
सलाहकारों का कहना है कि इस साल रुपये की गिरावट का एजुकेशन लोन की मांग पर कोई खास असर नहीं पड़ा है। यद्यपि कमजोर रुपये की वजह से विदेश में पढ़ाई का खर्च बढ़ा है, लेकिन छात्रों ने इसका एक स्मार्ट समाधान खोज लिया है।
छात्र अब अमेरिका और कनाडा जैसे पारंपरिक रूप से महंगे देशों को छोड़कर कम खर्चीले यूरोपीय देशों को अपनी मंजिल बना रहे हैं। इस समझदारी भरे कदम से रुपये की गिरावट से होने वाले अतिरिक्त आर्थिक बोझ की काफी हद तक भरपाई हो गई है।
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