गुजरात विधानसभा में जनता का प्रतिनिधित्व करने वाले कई विधायकों की सक्रियता पर बड़े सवाल खड़े हुए हैं। हाल ही में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, राज्य के लगभग हर चौथे विधायक ने इस साल के बजट सत्र में किसी भी बहस या चर्चा में हिस्सा ही नहीं लिया। सबसे ज्यादा हैरानी की बात यह है कि खामोश रहने वाले इन 45 विधायकों में भूपेंद्र पटेल सरकार के नौ मंत्री भी शामिल हैं।
फरवरी और मार्च के बीच चले बजट सत्र को लेकर गुजरात विधानसभा सचिवालय ने एक रिपोर्ट तैयार की है। इस रिपोर्ट का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि कुल 182 विधायकों में से 24.7 प्रतिशत सदस्य प्रश्नकाल के अलावा किसी भी अन्य विचार-विमर्श में पूरी तरह गैर-हाजिर या चुप रहे। यह स्थिति चुनावी प्रतिनिधित्व और सदन में विधायी भागीदारी के बीच एक गहरी खाई को दर्शाती है।
सदन की कार्यवाही में हिस्सा न लेने वाले इन जनप्रतिनिधियों की सूची में कई अहम नाम शामिल हैं। इनमें राज्य मंत्री त्रिकम छंगा, कांतिलाल अमृतिया, पीसी बरंडा, दर्शना वाघेला, रीवाबा जडेजा, कौशिक वेकरिया, पुरुषोत्तम सोलंकी, कमलेश पटेल और रमेश कटारा के नाम प्रमुख हैं।
हालांकि, मंत्री अक्सर अपने प्रशासनिक कामों में व्यस्त रहते हैं और सिर्फ अपने विभाग से जुड़े मुद्दों पर ही जवाब देते हैं। फिर भी, सदन के लगभग एक चौथाई सदस्यों का किसी भी चर्चा में शामिल न होना कई गंभीर सवाल उठाता है।
विधानसभा सचिवालय की इस रिपोर्ट में पूरे सत्र के दौरान अलग-अलग श्रेणियों में कुल 493 बार विधायकों की भागीदारी दर्ज की गई। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा बजट पर हुई चर्चा का रहा, जिसमें 223 बार विधायकों ने अपनी बात रखी। इससे साफ होता है कि राज्य का वार्षिक वित्तीय विवरण ही बहस का मुख्य केंद्र बना रहा।
इसके अलावा अन्य मामलों पर 144 बार, सरकारी विधेयकों पर 65 बार, राज्यपाल के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के दौरान 28 बार, गैर-सरकारी सदस्यों के संकल्पों पर 18 बार, गैर-सरकारी विधेयकों पर आठ बार और सरकारी संकल्पों पर सात बार चर्चा में हिस्सा लिया गया।
आंकड़ों से यह भी स्पष्ट होता है कि सदन में चर्चा की जिम्मेदारी मुख्य रूप से सदस्यों के एक छोटे समूह तक ही सीमित रही। विधानसभा अध्यक्ष शंकर चौधरी ने कार्यवाही के संचालन की अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए सबसे ज्यादा 47 बार हस्तक्षेप किया। वहीं, विधानसभा उपाध्यक्ष पूर्णेश मोदी ने 10 बार अपनी बात रखी। मुख्यमंत्री भूपेंद्र पटेल ने पूरे सत्र के दौरान पांच बार और उपमुख्यमंत्री हर्ष संघवी ने सात बार सदन की कार्यवाही में हिस्सा लिया।
सत्ता पक्ष की ओर से मंत्री ऋषिकेश पटेल और अर्जुन मोढवाडिया सबसे मुखर रहे। इन दोनों नेताओं ने 15-15 बार चर्चा में भाग लिया। विपक्ष की बात करें तो कांग्रेस विधायक शैलेश परमार ने भी 15 बार अपनी आवाज बुलंद की।
आम आदमी पार्टी के विधायक गोपाल इटालिया और उमेश मकवाना भी पीछे नहीं रहे, जिन्होंने 14-14 बार चर्चाओं में हिस्सा लिया। इनके अलावा निर्दलीय विधायक धवलसिंह झाला ने 13 बार, चैतर वसावा ने 12 बार, रमणलाल वोरा ने 11 बार, मंत्री जीतू वाघानी ने 10 बार और गुजरात कांग्रेस अध्यक्ष अमित चावड़ा ने आठ बार सदन में अपनी बात रखी।
विधायकों के इस रवैये पर एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की गुजरात समन्वयक पंक्ति जोग ने चिंता जताई है। उनका मानना है कि इन आंकड़ों के बाद जनता को अपने प्रतिनिधियों के कामकाज की कड़ी समीक्षा करनी चाहिए।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि विधायकों का मुख्य काम जनता से जुड़े कानूनों और नीतियों पर विचार-विमर्श करना है। जब इतनी बड़ी संख्या में चुने हुए प्रतिनिधि चुप रहते हैं, तो इससे लोकतांत्रिक निगरानी और जवाबदेही की गुणवत्ता पर सीधा और नकारात्मक असर पड़ता है।
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