अहमदाबाद: गुजरात पुलिस के भगोड़ों के रजिस्टर का हाल इन दिनों बेहद हैरान करने वाला है। इस रिकॉर्ड में 10,000 लोगों की एक भीड़, एक बुजुर्ग महिला और दो अज्ञात मजदूरों जैसी प्रविष्टियां शामिल हैं। वर्तमान में इस रजिस्टर में कुल 1,682 नाम दर्ज हैं, जिसका मुख्य उद्देश्य गिरफ्तारी से बच रहे लोगों को पकड़ने में पुलिस की मदद करना है। हालांकि, इनमें से कई विवरण इतने अस्पष्ट हैं कि अधिकारियों के लिए यह समझना ही मुश्किल है कि वे आखिर किसे ढूंढ रहे हैं, उन्हें पकड़ना तो बहुत दूर की बात है।
इस लापरवाही का सबसे बड़ा उदाहरण साल 2017 में सामने आए एक दंगे के मामले में दिखता है। क्राइम ब्रांच (DCB) द्वारा दर्ज इस मामले में वांटेड आरोपी की पहचान को केवल “लगभग 10,000 लोगों की भीड़” के रूप में लिखा गया है। इस एंट्री में किसी भी एक व्यक्ति विशेष की पहचान नहीं की गई है, जिसके कारण पुलिस के पास आरोपियों तक पहुंचने का कोई ठोस सुराग ही नहीं है।
मणिनगर पुलिस के पास भी एक ऐसा ही छोटा लेकिन उतना ही मुश्किल मामला है। साल 2016 के एक केस में एक फरार व्यक्ति का हुलिया सिर्फ “40 से 42 वर्ष का एक पुरुष” बताया गया है। इस रिकॉर्ड में ऐसा कोई नाम दर्ज नहीं है जिससे अधिकारी उसकी वास्तविक पहचान स्थापित कर सकें।
यह रहस्यमयी सूची यहीं खत्म नहीं होती है। साणंद के साल 2015 के एक मामले में “जमीन के पास एक अज्ञात महिला” का जिक्र है। वहीं, शहरकोटडा पुलिस के रजिस्टर में “एक अज्ञात बुजुर्ग महिला” की तलाश की बात लिखी गई है। दूसरी तरफ, चांदखेड़ा पुलिस दो “अज्ञात मजदूरों” को वांटेड बताकर उनकी तलाश कर रही है।
इस पूरे रजिस्टर की समीक्षा करने पर यह साफ पता चलता है कि एफआईआर दर्ज करते समय जो विवरण लिखे गए थे, वे सालों से सिस्टम में उसी तरह पड़े हैं और उन्हें अपडेट करने की जहमत नहीं उठाई गई। कई मामलों में आरोपियों के नाम, उनकी तस्वीरें, सत्यापित पते और अन्य पहचान से जुड़ी अहम जानकारियां गायब हैं, जिससे इस लिस्ट की उपयोगिता लगभग खत्म हो जाती है।
इन सरकारी रिकॉर्ड्स में कई और भी अजीबोगरीब चीजें देखने को मिलती हैं। एक मामले में तो फरार व्यक्ति की पहचान केवल किसी अन्य आरोपी के साथ उसके रिश्ते के आधार पर दर्ज कर ली गई है। इसके अलावा, कुछ ज्ञात आरोपियों के नाम और उनके उपनाम अलग-अलग जिलों के रिकॉर्ड में अलग-अलग लिखे गए हैं, जो पुलिस के इस पूरे डेटाबेस की सटीकता पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
इस मामले पर पुलिस अधिकारियों का कहना है कि ऐसे अधूरे विवरण आमतौर पर एफआईआर के शुरुआती चरण में लिखे जाते हैं, जब आरोपी की पहचान पूरी तरह से स्थापित नहीं हो पाती है। असली समस्या तब पैदा होती है जब पुलिस स्टेशन जांच के दौरान नई जानकारियां मिलने के बावजूद इन पुरानी प्रविष्टियों को सुधारने में विफल रहते हैं।
नतीजतन, यह वांटेड सूची पहचान के एक बुनियादी संकट से जूझ रही है। पुलिस को यह तो पता हो सकता है कि कोई अपराधी फरार चल रहा है, लेकिन यह रजिस्टर यह बताने में पूरी तरह नाकाम साबित होता है कि वह इंसान आखिर है कौन।
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