सेनेगल के डकार में आयोजित यूथ ओलंपिक गेम्स में 18 वर्षीय खुशबू रजाकभाई दरजादा ने जूडो में सिल्वर मेडल जीतकर पूरे देश का सिर फक्र से ऊंचा कर दिया है। अपने अफ्रीकी मूल के कारण खुशबू को अक्सर विदेशी समझ लिया जाता है, लेकिन इस बार उनके चर्चा में आने की वजह उनका शानदार खेल रहा। डकार पहुंचने पर अपने साथी भारतीय खिलाड़ियों की तुलना में खुशबू ने पश्चिम अफ्रीकी देश के स्थानीय लोगों का ध्यान अपनी ओर सबसे ज्यादा खींचा।
सेनेगल के लोगों को यकीन ही नहीं हो रहा था कि वह भारत से हैं। खुशबू बताती हैं कि स्थानीय लोग उनसे बार-बार पूछ रहे थे कि क्या वह सच में भारतीय हैं, क्योंकि वह बिल्कुल उनके जैसी ही दिखती थीं। लोग कहते, ‘तू इंडियन नहीं दिखती।’ इस पर खुशबू ने बड़े ही मजाकिया अंदाज में जवाब दिया कि वह असल में उनकी ‘बिछड़ी हुई बहन’ हैं।
भारत में उन्हें इसलिए अलग नजरिए से देखा जाता है क्योंकि उनकी शारीरिक बनावट अलग है, लेकिन अफ्रीका में उन्हें इसलिए नोटिस किया गया क्योंकि वह वहां के लोगों जैसी ही लग रही थीं।
इस उलझन की वजह समझना बहुत आसान है। 18 वर्षीय जूडोका (जूडो खिलाड़ी) भारत के सिद्दी समुदाय से ताल्लुक रखती हैं। यह समुदाय उन पूर्वी अफ्रीकी लोगों का वंशज है, जिन्हें सैकड़ों साल पहले गुजरात लाया गया था। समुदाय के अन्य सदस्यों की तरह खुशबू के चेहरे की बनावट अफ्रीकी महाद्वीप के लोगों से काफी मिलती-जुलती है।
सोमवार को खुशबू ने महिलाओं के 63 किलोग्राम जूडो वर्ग में सिल्वर मेडल अपने नाम किया। यह यूथ ओलंपिक में अब तक का भारत का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन है। इस पूरे टूर्नामेंट में उनका सफर बेहद शानदार रहा।
उन्होंने गिनी की कैमारा ममासाता को 1-0 से हराया और फिर मोरक्को की अबीर बौजाओई व अल्जीरिया की डौनिया बेरहाउल को ‘इप्पोन’ के जरिए मात दी। फाइनल मुकाबले में उन्हें जर्मनी की जोलिना रेनहोल्ड के सामने हार का सामना करना पड़ा। यह यूथ ओलंपिक के इतिहास में भारत का केवल दूसरा जूडो मेडल है और सिद्दी समुदाय के किसी भी सदस्य द्वारा जीता गया पहला ओलंपिक पदक भी।
इस ऐतिहासिक जीत की खबर मिलते ही भारत के पश्चिमी छोर पर स्थित गुजरात के गिर-सोमनाथ जिले के सुरवा गांव में जश्न का माहौल छा गया। देर रात तक पटाखे फोड़े गए और समुदाय के पारंपरिक ‘धमाल’ गीतों पर लोग झूमते नजर आए। उनके पिता रजाकभाई ने बताया कि इस खुशी में उनका परिवार रात भर सो नहीं पाया। यह सिर्फ उनके परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के लिए सबसे बड़ा और गर्व का पल है।
फाइनल के बाद जब खुशबू ने अपने परिवार से बात की, तो उन्हें अपनी इस बड़ी उपलब्धि का पूरी तरह एहसास नहीं था। उनकी बड़ी बहन और खुद एक जूडोका, शाहीन दरजादा ने बताया कि खुशबू गोल्ड मेडल न जीत पाने के कारण रो रही थीं। ऐसे में शाहीन को उन्हें याद दिलाना पड़ा कि उन्होंने जो मुकाम हासिल किया है, वह ज्यादातर लोगों की पहुंच से कहीं दूर है।
सुरवा गांव गुजरात के उन गिने-चुने इलाकों में से एक है जहां सिद्दी समुदाय बसता है। शाहीन के अनुसार, वे दिखने में अलग हैं और उनकी संस्कृति भी अनूठी है। लोग अक्सर उन्हें बाहरी समझकर उनके साथ अंग्रेजी में बात करने की कोशिश करते हैं, जबकि उनकी मातृभाषा ठेठ गुजराती है। लोग उनके साथ बुरा बर्ताव तो नहीं करते, लेकिन अलग तरह से जरूर पेश आते हैं।
अपनी अलग पहचान के कारण इस समुदाय को मुख्यधारा में शामिल होने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा है। रजाकभाई बताते हैं कि समुदाय के ज्यादातर लोग गरीब हैं, जो मजदूरी या खेती करते हैं, या फिर पर्यटकों के लिए धमाल डांस करके अपना गुजारा करते हैं। यहां बहुत कम लोग शिक्षित हैं। खुशबू के पिता खुद पहले मजदूर थे, लेकिन बाद में उन्होंने पढ़ाई की और जूनागढ़ में सरकारी नौकरी हासिल की।
हाल के दिनों में इस समुदाय के बच्चों ने खेलों में अपनी जगह बनानी शुरू कर दी है। कई बच्चों को राज्य भर के डिस्ट्रिक्ट लेवल स्पोर्ट्स स्कूलों में चुना जाता है। खुशबू से पांच साल बड़ी बहन शाहीन जूडो अपनाने वाली समुदाय की शुरुआती लड़कियों में से थीं। शुरुआत में ट्रैक रनर बनने की तैयारी कर रही खुशबू ने तब जूडो को चुना, जब साल 2020 में शाहीन ने खेलो इंडिया यूथ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता। सात भाई-बहनों (छह बहनें और एक भाई) में सबसे छोटी खुशबू ने अपनी बहन की सफलता से प्रेरित होकर इस खेल में कदम रखा।
खुशबू ने गिर के डिस्ट्रिक्ट लेवल स्पोर्ट्स स्कूल में तीन साल तक कड़ी ट्रेनिंग की। इसके बाद अहमदाबाद की विजयी भारत स्पोर्ट्स अकादमी के जॉर्जियाई कोच लाशा किज़िलाशविली की नजर उन पर पड़ी। उन्हें ट्रेनिंग के लिए राज्य की राजधानी लाया गया। इस अकादमी में ट्रेनिंग लेने वाली वह अकेली सिद्दी एथलीट नहीं हैं। उनकी बहन शाहीन भी पांच साल से वहीं अभ्यास कर रही हैं। इसके अलावा रोहित मजगुल भी इसी अकादमी का हिस्सा हैं, जो इस साल की शुरुआत में ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों और नागोया एशियाई खेलों के लिए भारतीय टीम में जगह बनाने वाले समुदाय के पहले जूडोका बने थे।
एक प्रतिभा संपन्न अकादमी में भी खुशबू का हुनर हमेशा अलग चमका है। उन्होंने पिछले साल पुणे में कैडेट नेशनल में ब्रॉन्ज और इस साल चंडीगढ़ में यूथ नेशनल में गोल्ड मेडल जीता था। इसके बाद उन्होंने जॉर्डन में एशियाई युवा चैंपियनशिप में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया और वहां भी ब्रॉन्ज मेडल जीता, जो उनका पहला अंतरराष्ट्रीय पदक था। खुशबू का मानना है कि एशियाई चैंपियनशिप से उन्हें दुनिया के बेहतरीन खिलाड़ियों के साथ खुद को परखने और बहुत कुछ सीखने का मौका मिला।
यूथ ओलंपिक का यह सिल्वर मेडल उनके लिए और भी खास है। भारतीय दल का हिस्सा बनने, ओपनिंग सेरेमनी और मार्च पास्ट में शामिल होने का अनुभव उनके लिए शानदार रहा। खुशबू कहती हैं कि हालांकि उन्हें गोल्ड जीतने की उम्मीद थी, लेकिन पोडियम पर खड़े होकर तिरंगे को ऊपर जाते देखना उनके लिए एक बेहद गर्व का क्षण था। शाहीन का मानना है कि यह मेडल उनके समुदाय के कई अन्य लड़के-लड़कियों को खेलों से जुड़ने के लिए एक बड़ी प्रेरणा देगा।
इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद खुशबू की नजरें अब अपने अगले लक्ष्य पर टिक गई हैं। वह दिसंबर में होने वाले खेलो इंडिया यूथ गेम्स में गोल्ड जीतना चाहती हैं। इसके साथ ही उनका सबसे बड़ा सपना भविष्य में ओलंपिक में देश का प्रतिनिधित्व करके वहां भी मेडल जीतना है।
हालांकि यह सब भविष्य की बातें हैं। सेनेगल में अपने अफ्रीकी मूल के कारण सुर्खियां बटोरने के बावजूद, खुशबू की पसंद किसी भी अन्य आम भारतीय किशोर जैसी ही है। फिलहाल उनका सबसे साधारण अरमान बस इतना है कि वह जल्द से जल्द भारत लौटकर अपने दोस्तों के साथ अहमदाबाद के किसी मॉल में जाएं और मैकडॉनल्ड्स का बर्गर खाएं।
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