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फीफा वर्ल्ड कप 2026: 9000 गुना छोटे ‘कुराकाओ’ ने किया क्वालीफाई, तो 140 करोड़ का भारत क्यों है खाली हाथ?

| Updated: June 19, 2026 14:00

डेढ़ लाख की आबादी वाले कुराकाओ ने फीफा वर्ल्ड कप 2026 में जगह बना ली है, जबकि 140 करोड़ का विशाल भारत आज भी लचर खेल प्रशासन और क्रिकेट के एकाधिकार की भारी कीमत चुका रहा है।

कुराकाओ कैरेबियन सागर में स्थित एक बेहद छोटा लेकिन खूबसूरत डच द्वीप है। यह जगह अपनी आकर्षक समुद्री खाड़ियों, नीले पानी वाले बीच और मूंगा चट्टानों (कोरल रीफ) के शानदार समुद्री जीवन के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। इसकी राजधानी विलेमस्टेड में औपनिवेशिक काल की रंग-बिरंगी वास्तुकला, तैरता हुआ क्वीन एम्मा ब्रिज और 17वीं सदी का सैंड-फ्लोर्ड मिकवे इज़राइल-इमैनुएल सिनागोग मौजूद है। गोताखोरी के लिए मशहूर ‘ब्लू बे’ जैसे पश्चिमी बीच भी इसी का हिस्सा हैं।

आपको जानकर हैरानी होगी कि कुराकाओ की कुल आबादी महज 1,56,000 के आसपास है। इसे ऐसे समझें कि अकेले दिल्ली की आबादी इसके बराबर करने के लिए 218 कुराकाओ चाहिए होंगे। मुंबई के लिए 135 और अहमदाबाद जैसे शहर के लिए 56 कुराकाओ लगेंगे। वहीं, एक पूरा भारत बनाने के लिए ऐसे 9000 कुराकाओ की जरूरत पड़ेगी।

इतने छोटे आकार और कम आबादी के बावजूद, कुराकाओ ने 2026 फीफा वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई कर लिया है। दूसरी तरफ, 1.4 अरब की विशाल आबादी वाला हमारा देश भारत आज तक कभी वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई नहीं कर पाया है।

वर्ल्ड कप क्वालीफाइंग राउंड में कुराकाओ का प्रदर्शन शानदार रहा और वह अजेय रहा। टीम ने सात मैचों में जीत दर्ज की और तीन मैच ड्रॉ खेले। इसके उलट, एएफसी क्वालीफायर्स में भारतीय टीम कतर और कुवैत से पीछे रहकर बाहर हो गई। जून 2024 में कतर से मिली हार ने भारत के वर्ल्ड कप के सपनों को पूरी तरह से तोड़ दिया। सच्चाई यह है कि भारत एशिया के स्तर पर ही क्वालीफाइंग की रेस में आगे नहीं बढ़ सका।

इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि भारत में प्रतिभाशाली खिलाड़ियों की कमी है या उनके अंदर जज्बा नहीं है। अगर हम इस स्थिति का गहराई से विश्लेषण करें, तो खिलाड़ी और खेल विशेषज्ञ इसके दो मुख्य कारण बताते हैं।

पहला बड़ा कारण है लालफीताशाही और खेल प्रशासन से जुड़ी ढेरों कमियां। और दूसरा कारण वह है जिसे हम सभी भली-भांति जानते हैं, वह है क्रिकेट का अनावश्यक और अत्यधिक दबदबा। देश में सारा स्पॉन्सरशिप, मीडिया अटेंशन और महत्व केवल एक ही खेल तक सीमित होकर रह गया है।

कुराकाओ की सफलता यह साबित करती है कि खेलों में कामयाबी केवल आबादी के आकार पर निर्भर नहीं करती। 40 लाख से भी कम आबादी वाले क्रोएशिया ने वर्ल्ड कप के फाइनल और सेमीफाइनल तक का सफर तय किया है। 35 लाख से कम आबादी वाले उरुग्वे ने दो बार वर्ल्ड कप जीता है। वहीं, 4 लाख से कम आबादी वाले आइसलैंड ने भी प्रमुख टूर्नामेंट्स में अपनी जगह बनाई है।

कुराकाओ अब वर्ल्ड कप में हिस्सा लेने वाला सबसे छोटा देश बन गया है। सांख्यिकी के हिसाब से भारत की विशालता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 9000 कुराकाओ मिलकर एक भारत बनाते हैं। इसके बावजूद, क्रिकेट के अलावा भारत ने हॉकी सहित अन्य खेलों में अपना पुराना दबदबा कायम नहीं रखा है। 2028 के ओलंपिक में क्रिकेट की वापसी से भारत भले ही पदकों की उम्मीद कर रहा हो, लेकिन असल जरूरत बाकी खेलों को समर्थन देने की है।

यहां यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि एक स्वशासी डच राष्ट्र होने के नाते कुराकाओ को नीदरलैंड से फुटबॉल को बढ़ावा देने में काफी मदद मिलती है। दक्षिणी कैरेबियन सागर में स्थित यह देश वेनेजुएला से सिर्फ 65 किलोमीटर, यानी करीब एक घंटे की दूरी पर है।

दुनिया के सबसे अधिक आबादी वाले देश भारत का कुराकाओ से पहले भी फुटबॉल के मैदान पर सामना हो चुका है। 2019 में थाईलैंड में खेले गए किंग्स कप में कुराकाओ ने भारत को 3-1 से करारी मात दी थी। कुराकाओ ने भारत को यह सिखा दिया है कि भारतीय फुटबॉल की सबसे बड़ी समस्या मैदान के अंदर नहीं, बल्कि मैदान के बाहर है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि भारत में फुटबॉल को लेकर उत्साह की कमी है। केरल, कोलकाता और गोवा में यह खेल बेतहाशा लोकप्रिय है। इसके अलावा लखनऊ से लेकर अहमदाबाद जैसे छोटे शहरों में भी फुटबॉल क्लब फल-फूल रहे हैं। भारतीय फुटबॉल टीम के पूर्व कप्तान बाईचुंग भूटिया ने बिल्कुल सही कहा है कि भारत में टैलेंट की कोई कमी नहीं है, लेकिन भारत के पास सही इकोसिस्टम नहीं है। उनके मुताबिक, हमारे पास लंबी सोच वाला कोई गंभीर ग्रासरूट प्रोग्राम नहीं है और दुनिया का सबसे लोकप्रिय टीम खेल होने के बावजूद दुख की बात है कि इसमें भारत की कोई जगह नहीं है।

एशिया के बाकी देशों का हाल भारत जैसा नहीं है। यह सच है कि भारत की तरह चीन ने भी कभी वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई नहीं किया है, लेकिन ईरान, जापान, जॉर्डन, दक्षिण कोरिया, उज्बेकिस्तान, कतर, सऊदी अरब और इराक जैसे देशों ने इसमें हिस्सा लिया है। उज्बेकिस्तान और जॉर्डन ने तो 2026 वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई कर लिया है, जो उनका पहला अनुभव होगा। दुनिया में उज्बेकिस्तान 50वें और जॉर्डन 63वें स्थान पर है। वहीं, 211 रजिस्टर्ड फुटबॉल संस्थाओं में भारत खिसक कर 138वें स्थान पर आ गया है। पाकिस्तान की रैंकिंग 198वीं है।

कुराकाओ के विपरीत, भारत में खेल के ढांचे में भारी नौकरशाही और सरकारी दखलंदाजी है। इस वजह से भारतीय मूल के विदेशी पासपोर्ट धारकों के लिए राष्ट्रीय टीम में शामिल होना लगभग नामुमकिन हो जाता है। आज क्रिकेटर्स को हर कोई पहचानता है, लेकिन गिने-चुने लोग ही तीन भारतीय फुटबॉल खिलाड़ियों के नाम बता पाएंगे।

अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (AIFF) ने 2014 में इंडियन सुपर लीग (ISL) शुरू की थी, लेकिन उसका भविष्य भी अधर में ही दिखता है। सरकार ने फुटबॉल को कभी क्रिकेट जैसा समर्थन नहीं दिया और AIFF आज भी स्पॉन्सरशिप के लिए संघर्ष कर रहा है। पूर्व कप्तान सुनील छेत्री का मानना है कि भारत को यथार्थवादी लक्ष्य तय करने चाहिए। सबसे पहले हमें गंभीर ट्रेनिंग और एशियाई कप में प्रतिस्पर्धा करने पर ध्यान देना चाहिए।

आगे बढ़ने के लिए एआईएफएफ को ‘ओवरसीज सिटिजन ऑफ इंडिया’ (OCI) कार्डधारकों को राष्ट्रीय टीम के लिए खेलने की अनुमति देनी चाहिए। इसी नीति ने कुराकाओ को वर्ल्ड कप क्वालीफाई करने में बड़ी मदद की है, क्योंकि उनके कई खिलाड़ी नीदरलैंड में रहते हैं और उन्हें शानदार डच कोचों द्वारा ट्रेनिंग मिली है।

मौजूदा फीफा वर्ल्ड कप में भारतीय मूल के चार खिलाड़ी दूसरे देशों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। इनमें कतर के लिए तहश मोहम्मद, ऑस्ट्रेलिया के लिए निशान वेलुपिल्ले, न्यूजीलैंड के लिए सरप्रीत सिंह और कांगो के लिए सैमुअल मुतौसामी शामिल हैं।

देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भारी खर्च हो रहा है। अहमदाबाद को कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी के लिए चुना गया है और गुजरात 2032 के ओलंपिक की मेजबानी की भी आकांक्षा रखता है। बुनियादी ढांचे पर अरबों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। लेकिन इसका हमारे खिलाड़ियों को क्या फायदा होगा? हम ग्रासरूट कोचिंग, प्रतिस्पर्धी लीग और खिलाड़ियों के वास्तविक विकास पर पर्याप्त पैसा क्यों नहीं खर्च कर रहे हैं?

इससे भी बुरी स्थिति यह है कि 2026 तक गुजरात में खेल शिक्षकों की कोई भर्ती ही नहीं हुई थी। अब जाकर सरकार ने खेल शिक्षकों की भर्ती की घोषणा की है, और वह भी पूरे 15 साल बाद। हमारे यहां ‘खेल सहायकों’ को मामूली वेतन पर 11 महीने के अनुबंध पर रखा जाता है। बिना किसी सुविधा और शर्मनाक फिक्स्ड पे के साथ उनके साथ दिहाड़ी मजदूरों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय खेलों के लिए केवल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर अरबों खर्च करने के बजाय, जहां भारत के जीतने की उम्मीद ना के बराबर है, हमें अपने शिक्षकों, कोचों और युवा प्रतिभाओं में गहराई से निवेश करना चाहिए था।

भारत के पास खेल की दुनिया की एक महाशक्ति बनने के लिए पर्याप्त आबादी और बेहिसाब टैलेंट मौजूद है। लेकिन हमारी सबसे बड़ी चुनौती उस टैलेंट को निखारने के लिए एक जरूरी इकोसिस्टम विकसित करना और उसे समर्थन देना है।

यह सच है कि कुराकाओ शायद वर्ल्ड कप में ज्यादा मैच ना जीत पाए और वह पहले ही जर्मनी से हार चुका है, लेकिन यह मुख्य मुद्दा नहीं है। असल सवाल यह है कि: यदि कुराकाओ जैसा एक छोटा सा देश वर्ल्ड कप के लिए क्वालीफाई कर सकता है, तो हमारा भारत क्यों नहीं?

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