1998 के बहुचर्चित वड़ताल स्वामीनारायण मंदिर बोर्ड के चेयरमैन गुरु गदाधरानंद हत्याकांड में उम्रकैद की सजा काट रहे नारायण शास्त्री की रिहाई का मामला अब एक अहम मोड़ पर है। गुजरात हाईकोर्ट में दायर उनकी समय से पूर्व रिहाई की याचिका पर अपना औपचारिक जवाब दाखिल करने के लिए केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने अदालत से मोहलत मांगी है।
मुख्य दोषी नारायण शास्त्री गुरु ओमप्रकाशदास फिलहाल 70 वर्ष के हो चुके हैं और अब तक 17 साल से अधिक का समय जेल की सलाखों के पीछे बिता चुके हैं। अपनी इसी बढ़ती उम्र और जेल में बिताए गए इस लंबे समय का हवाला देते हुए उन्होंने सजा माफी और रिहाई की गुहार लगाई है।
इस मामले की सुनवाई करते हुए गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस एम.आर. मेंगड़े ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए सीबीआई को जवाब दाखिल करने के लिए 22 जुलाई तक का समय दिया है।
आपको बता दें कि अप्रैल 2026 में देश की सर्वोच्च अदालत ने शास्त्री की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) का निपटारा करते हुए उन्हें गुजरात हाईकोर्ट में एक नई रिट याचिका दायर करने का निर्देश दिया था। साथ ही हाईकोर्ट को कानून के अनुसार इस मामले को जल्द से जल्द देखने का सख्त निर्देश भी दिया गया था।
गुरुवार को हुई सुनवाई के दौरान सीबीआई के वकील ने अदालत को अवगत कराया कि इससे पहले भी केंद्र सरकार ने शास्त्री की समय पूर्व रिहाई को अपनी मंजूरी नहीं दी थी। वकील ने स्पष्ट किया कि नियमों के अनुसार इसके लिए केंद्र सरकार की सहमति अनिवार्य होती है और पिछली बार यह अनुमति नहीं मिली थी। अब इस नई याचिका पर सीबीआई के वकील केंद्र सरकार के वकीलों से चर्चा कर आगे का रुख स्पष्ट करेंगे। इस बीच, राहत देते हुए हाईकोर्ट ने शास्त्री की पैरोल की अवधि को सुनवाई की अगली तारीख तक के लिए बढ़ा दिया है।
यह पूरा मामला मंदिर के वर्चस्व और वित्तीय हितों के टकराव से जुड़ा था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, जिस समय गुरु गदाधरानंद चेयरमैन थे, तब मुख्य आरोपी शास्त्री और मंदिर के अन्य प्रमुख प्रशासक संप्रदाय के भीतर काफी ताकतवर पदों पर काबिज थे। विवाद की शुरुआत तब हुई जब गदाधरानंद ने आरोपियों सहित मंदिर के कुछ प्रमुख अधिकारियों का तबादला करने की योजना बनाई।
इसी बात से नाराज होकर आरोपियों ने गदाधरानंद को रास्ते से हटाने की खौफनाक साजिश रची। योजना के तहत उन्हें अगवा किया गया और फिर गला घोंटकर उनकी हत्या कर दी गई। अपने जुर्म को छिपाने के लिए आरोपियों ने शव को एक सुनसान जगह पर ठिकाने लगा दिया और वारदात में इस्तेमाल की गई गाड़ी को भी आग के हवाले कर दिया। बाद में मृतक के शव की पहचान एक चाबी, सोने के दांत (डेंचर) और डीएनए फिंगरप्रिंटिंग जैसी अत्याधुनिक फोरेंसिक जांच के जरिए ही संभव हो सकी थी।
इस हत्याकांड में शामिल धार्मिक नेताओं के भारी रसूख और मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए जांच अंततः सीबीआई को सौंप दी गई थी। सुनवाई के बाद शुरुआत में निचली अदालत ने नारायण शास्त्री को मौत की सजा सुनाई थी। इसके अलावा चार अन्य लोगों को भी भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 120-बी (आपराधिक साजिश), 302 (हत्या), 364 (अपहरण) और 201 (सबूत मिटाने) के तहत दोषी ठहराया गया था।
हालांकि, बाद में साल 2006 में जब यह मामला गुजरात हाईकोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने दोषियों की सजा को बरकरार तो रखा, लेकिन मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया। हाईकोर्ट का मानना था कि यह मामला मृत्युदंड के लिए जरूरी ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ (दुर्लभ से दुर्लभ) अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। अब सभी की निगाहें 22 जुलाई की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सीबीआई का जवाब नारायण शास्त्री के भविष्य का फैसला करेगा।
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