स्वतंत्रता संग्राम से शुरू हुआ था ईडी-कांग्रेस विवाद के केंद्र में आए नेशनल हेराल्ड का

| Updated: August 4, 2022 2:48 pm

नई दिल्ली: भारतीय पत्रकारिता के इतिहास में नेशनल हेराल्ड का स्थान अनूठा है। आखिरकार अधिकतर अखबार देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को इसके संस्थापक के रूप में और के. रामाराव, मणिकोंडा चलपति राव और खुशवंत सिंह को अपने संपादकों के रूप में होने का दावा नहीं कर सकते।

आज कांग्रेस कार्यकर्ता प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा सोनिया और राहुल गांधी से एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड (एजेएल) के स्वामित्व वाली संपत्ति के कथित हेराफेरी के संबंध में पूछताछ का विरोध कर रहे हैं। एजेएल इस अखबार का प्रकाशक रहा है। ईडी ने हेराल्ड मामले में मंगलवार को कई छापे मारे। फिर देर शाम अस्थायी तौर पर नई दिल्ली स्थित उसके दफ्तर को सील कर दिया।

1938 में लखनऊ से एक दैनिक समाचार पत्र के रूप में शुरुआत करते हुए नेशनल हेराल्ड ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। 1960 और 1970 के दशक में उसकी लोकप्रियता शिखर पर थी और 2008 में बंद होने से पहले आपातकाल की अवधि के बाद के उसने वर्षों तक संघर्ष किया।

इसकी प्रारंभिक लोकप्रियता का श्रेय भले ही नेहरू के लेखन को दिया गया, लेकिन अखबार के शुरुआती वर्षों में रामाराव ने 1946 तक इसके शिखर पुरुष के रूप में काम किया। महात्मा गांधी उन्हें “जुझारू संपादक,” तो नेहरू उन्हें “आदर्शों और मिशन वाला व्यक्ति” कहते थे।

1942 में अंग्रेजों द्वारा अखबार पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। उसी वर्ष गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया था। 1945 में इसे पुनर्जीवित करने के एक साल बाद चलपति राव ने संपादक के रूप में पदभार संभाला और तीन दशकों से अधिक समय तक अखबार चलाया।

नेहरू के करीबी होने के बावजूद राव अपने संपादकीय में उनकी नीतियों की आलोचना करते थे। नेहरू ने अखबार के रजत जयंती समारोह में कहा था, “लोग सोचते हैं कि यह मेरा पेपर है। यह वास्तव में चलपति राव का पेपर है; जो जैसा है, उसने वैसा ही बनाया है। ”

फर्स्टपोस्ट में प्रकाशित अपने लेख में वरिष्ठ पत्रकार रतन मणि लाल ने अखबार के पतन के शुरुआती वर्षों की विस्तृत जानकारी दी थी।

उन्होंने लिखा, “अंग्रेजी पत्रकारिता के सपनों की दुनिया में कुछ गलत होने का पहला अनुभव 1977 में मिला। तब जनता पार्टी सत्ता में आई थी और इंदिरा गांधी खुद भी चुनाव हार गई थीं। हमारे संपादकों ने बताया कि हम मुश्किल में पड़ सकते हैं। हालांकि 1979 तक कुछ भी नहीं बदला, जब अखबार को पहली बार तालाबंदी का सामना करना पड़ा। वे ऐसे दिन थे, जब गैर-पेशेवर लोग इसके दफ्तर को संभालने लगे। अक्सर बाहर टहलने के दौरान हमने देखा कि एक कार गेट पर रुकती है और कुछ आदमी बड़ा सूटकेस लेकर उतरते हैं। हमें बताया गया कि अखबारी कागज और मजदूरी के आंशिक भुगतान के लिए नकद बांटा गया। फिर आवश्यकता से अधिक कर्मचारी और विज्ञापनों से कमाई में कमी का अलग संकट।”

1977 में इमरजेंसी खत्म होने के बाद हेराल्ड के लिए मुश्किलें और बढ़ गईं। 21 महीने में अखबार के खिलाफ भ्रष्टाचार और पक्षपात के आरोप पहले ही लग चुके थे।

अपनी पुस्तक, द इमरजेंसी: ए पर्सनल हिस्ट्री में अनुभवी पत्रकार कूमी कपूर ने लिखा: “जवाहरलाल नेहरू द्वारा स्थापित द नेशनल हेराल्ड ने पूरे आपातकाल का समर्थन किया। फिर चतुराई के साथ इसके मास्टहेड से ‘स्वतंत्रता खतरे में है, पूरी ताकत से इसकी रक्षा करें’ वाले उद्धरण को हटा दिया।”

राव ने 1978 में अखबार छोड़ दिया। खुशवंत सिंह आए लेकिन कुछ महीनों के बाद ही इस्तीफा दे दिया, जो यह दर्शाता है कि अखबार और उसके प्रबंधन को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ा।

1978 की इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट ने बताया गया कि इमरजेंसी से पहले दिल्ली में हेराल्ड का सर्कुलेशन 15,000 से अधिक नहीं था। रिपोर्ट के मुताबिक, “इसके मुकाबले लखनऊ संस्करण का प्रदर्शन (लगभग 30,000) बेहतर था, लेकिन आपातकाल की शुरुआत से अखबार के न केवल विज्ञापन से कमाई में बल्कि सर्कुलेशन में भी भारी उछाल देखा गया।”

1977 में नेशनल हेराल्ड के दिल्ली संस्करण को बंद करने पर राज्यसभा में एक बहस के दौरान भाकपा सांसद भूपेश गुप्ता ने कहा, “जहां तक अखबार का सवाल है, नेहरू परंपरा बहुत पहले चली गई है। लेकिन जो कुछ बचा है, उसे संरक्षित किया जाना चाहिए। किसी भी लिहाज से यह जनहित का मामला है और बहुत महत्व का विषय है।”

अखबार को बंद करने की “साजिश” के आरोपों के बीच तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री एलके आडवाणी ने सदन को संबोधित करते हुए कहा कि सरकार खुश होगी (यदि) प्रबंधन उसी नीति, समान दृष्टिकोण के साथ अपने दम पर प्रकाशन जारी रखे। आडवाणी ने कहा, “…राजनीतिक नीति के आधार पर किसी भी अखबार को पक्ष या विपक्ष में कोई भेदभाव नहीं करना चाहिए।”

2008 में एजेएल ने अंततः वित्तीय घाटे का हवाला देते हुए अखबार और उसके सहयोगी प्रकाशनों नवजीवन और कौमी आवाज के प्रकाशनों को रोक दिया।

आईएएनएस की रिपोर्ट के अनुसार, “आवश्यकता से अधिक कर्मचारी, मुख्य रूप से प्रेस और गैर-पत्रकारों की, और विज्ञापनों से होने वाली आय की कमी को भी अखबार के बड़े नुकसान का मुख्य कारण बताया जाता है।”

आठ साल बाद एजेएल ने तीनों प्रकाशनों को फिर से लॉन्च करने का फैसला किया। अबकी नेशनल हेराल्ड ने डिजिटल रूप में वापसी की।

लेकिन मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं ले रही थीं। 2014 में दिल्ली की एक अदालत ने भाजपा के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी के आरोपों पर गौर करने का फैसला किया कि गांधी परिवार ने अपनी निजी कंपनी यंग इंडियन के माध्यम से एजेएल की संपत्तियों को धोखाधड़ी से हासिल किया। अगले साल ईडी ने मामले को फिर से खोलने का फैसला किया। स्वामी ने गांधी परिवार के अलावा दिवंगत कांग्रेस नेताओं मोतीलाल वोरा और ऑस्कर फर्नांडीस, उद्यमी सैम पित्रोदा और पत्रकार सुमन दुबे को भी मामले में नामजद किया था।

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