बीते 23 जुलाई को अहमदाबाद में महज दो घंटे के भीतर 177 मिलीमीटर बारिश ने पूरे शहर की रफ्तार रोक दी। दिन खत्म होने तक बारिश का कुल आंकड़ा 278 मिलीमीटर से लेकर 294.6 मिलीमीटर तक पहुंच गया। यह पिछले करीब 100 वर्षों के इतिहास में एक दिन में दर्ज की गई चौथी सबसे भारी बारिश है।
शहरी योजनाकारों और जियोइन्फॉर्मेटिक्स विशेषज्ञों का मानना है कि शहर में आई यह भयंकर बाढ़ दशकों से चली आ रही घोर लापरवाही का परिणाम है। विशेषज्ञों के अनुसार, अतिक्रमण को दी गई मंजूरी, टाउन प्लानिंग स्कीम में देरी और प्राकृतिक जलस्रोतों को योजनाबद्ध तरीके से नष्ट करने के कारण आज अहमदाबाद इस बेबसी की स्थिति में पहुंच गया है।
इसके साथ ही जानकारों का यह भी कहना है कि शहर का जल निकासी तंत्र तेजी से हो रहे विकास की मांग को पूरा करने में पूरी तरह से विफल रहा है। इसी का नतीजा था कि 23 जुलाई को पश्चिमी अहमदाबाद के 300 से अधिक इलाकों में भारी जलभराव हो गया। हालात इतने बदतर थे कि घुटनों से लेकर कमर तक भरे पानी के बीच 150 से अधिक सोसायटियों के निवासी अपने ही घरों में कैद होकर रह गए।
गुजरात के शहरी विकास और आवास विभाग की एक रिपोर्ट इस पूरी तबाही के पीछे के बुनियादी ढांचे की विफलता की ओर इशारा करती है। रिपोर्ट के अनुसार, साल 2000 के बाद से शहर के केंद्र से 20 किलोमीटर के दायरे में अहमदाबाद के निर्मित क्षेत्र (बिल्ट-अप एरिया) में 33 प्रतिशत का विस्तार हुआ है।
वहीं, 20 से 50 किलोमीटर के बाहरी रिंग यानी पश्चिमी और दक्षिणी उपनगरों में यह वृद्धि चौंकाने वाली 91 प्रतिशत रही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि 50 किलोमीटर के दायरे में हुए सभी नए विकास कार्यों का 47 प्रतिशत हिस्सा सीधे तौर पर उन जमीनों पर बना है, जो उच्च और अति-उच्च भूजल पुनर्भरण (ग्राउंडवाटर रिचार्ज) क्षेत्र हैं।
इन जमीनों का मुख्य प्राकृतिक काम बारिश के पानी को सड़कों, नालियों और घरों तक पहुंचने से पहले ही सोख लेना था, लेकिन कंक्रीट के जंगलों ने इस प्रक्रिया को खत्म कर दिया।
‘सेप्ट यूनिवर्सिटी’ के जियोइन्फॉर्मेटिक्स विभाग के सी राज दीपांकर द्वारा 2022 में “स्टडी ऑफ फ्लैश फ्लड्स: केस स्टडी ऑफ अहमदाबाद” शीर्षक से एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई थी। इस अध्ययन में बताया गया है कि उत्तरी अहमदाबाद की ऊंचाई 69-88 से कम है, जबकि शहर का दक्षिणी हिस्सा पूरी तरह से एक समतल सतह है।
शहर को बाढ़ से बचाने वाली दूसरी अहम कड़ी यानी यहां की झीलों को भी बेहद सुनियोजित तरीके से मिटा दिया गया है। गुजरात शहरी विकास की उसी रिपोर्ट के मुताबिक, बोदकदेव और नरोदा की झीलें पूरी तरह से गायब हो चुकी हैं और उन्हें पाटकर जमीन में तब्दील कर दिया गया है।
जहां कुछ जलस्रोत अभी भी बचे हुए हैं, वहां भी उनका दायरा तेजी से सिकुड़ गया है। आंकड़ों पर गौर करें तो सोला झील ने अपना 53 प्रतिशत जल क्षेत्र खो दिया है, जबकि वस्त्रपुर झील का आकार भी 10 प्रतिशत तक कम हो गया है।
इस पूरे हालात पर म्युनिसिपल कमिश्नर बंछानिधि पाणि ने शहर प्रशासन के बचाव में बयान दिया है। उन्होंने दावा किया कि सड़कों से पानी पूरी तरह से निकल चुका है। वहीं, बोपल और घुमा इलाकों में हुए भारी जलभराव पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि इन जगहों की भौगोलिक स्थिति ‘तश्तरीनुमा गड्ढे’ (सॉसर डिप्रेशन) जैसी है, जहां स्वाभाविक रूप से पानी जमा हो ही जाता है।
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