कोलकाता के बहुसंस्कृतिवाद की मिसाल माना जाने वाला मोमिनपुर का ऐतिहासिक जन्माष्टमी उत्सव इस साल एक बड़े बदलाव का गवाह बन रहा है। दशकों से इस आयोजन में मुस्लिम समुदाय की अहम भूमिका रही है, लेकिन अब इसे पूरी तरह से सिर्फ हिंदुओं का कार्यक्रम बना दिया गया है।
इस कदम का मकसद हिंदू परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत पर जोर देना बताया जा रहा है। शहर की मिली-जुली संस्कृति को दर्शाने वाले इस उत्सव के आयोजक अब केवल हिंदू समुदाय के लोग होंगे।
इस साल पोर्ट विधानसभा क्षेत्र से भाजपा के उम्मीदवार रहे राकेश सिंह ने साफ किया है कि जन्माष्टमी पूरी तरह से हिंदुओं का त्योहार है, इसलिए अब इसका आयोजन भी विशेष रूप से हिंदू ही करेंगे। एक समय में कांग्रेस के पदाधिकारी रहे और इंटक के जरिए अलीपुर चिड़ियाघर की लेबर यूनियन को संभालने वाले सिंह अब विश्व हिंदू परिषद (विहिप) की विचारधारा का समर्थन करते हैं।
उनका मानना है कि धर्म व्यक्तिगत है और त्योहार भी उन्हीं व्यक्तियों के हैं। उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उस बहुचर्चित बयान की भी आलोचना की जिसमें कहा गया था कि ‘धर्म व्यक्तिगत है, लेकिन त्योहार सबके हैं’।
यह ऐतिहासिक आयोजन कोलकाता नगर निगम के वार्ड 79 में भूकैलाश रोड और हुसैन शाह रोड के चौराहे पर होता है। यह इलाका पोर्ट विधानसभा का हिस्सा है और मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी तथा पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र की सीमा से लगा हुआ है।
इस बार यह उत्सव अपने 58वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है। कभी इस आयोजन के प्रमुख संरक्षकों में शहर के पूर्व मेयर फिरहाद हकीम और तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मोहम्मद आलम और सिराजुल करीम जैसे नाम शामिल हुआ करते थे।
आयोजन समिति के अध्यक्ष होने का दावा करने वाले राकेश सिंह का यह कदम विहिप के उस हालिया निर्देश के ठीक बाद आया है, जिसमें शहर के दुर्गा पूजा आयोजकों को कुछ खास नियम बताए गए थे। विहिप ने देवी-देवताओं की मूर्तियों से कोई छेड़छाड़ न करने, हिंदू संस्कृति बनाए रखने और पंडाल के मुख्य हिस्से में मांसाहारी भोजन पर सख्त पाबंदी लगाने को कहा था।
सिंह का तर्क है कि हम अपनी पारंपरिक संस्कृति को नीचा नहीं दिखा सकते। उनका कहना है कि अन्य धर्मों के लोगों को दर्शन के लिए जरूर आना चाहिए, लेकिन धार्मिक कार्यों की रक्षा करना हिंदुओं का कर्तव्य है।
स्थानीय लोगों के अनुसार, खिदिरपुर समाज कल्याण समिति द्वारा आयोजित किए जाने वाले इस उत्सव की नींव करीब छह दशक पहले एक मुस्लिम सामाजिक कार्यकर्ता मोहम्मद कासिम ने रखी थी। बीच के कुछ वर्षों में यह उत्सव अपनी चमक खोने लगा था, लेकिन 2011 में तृणमूल कांग्रेस के सत्ता में आने के बाद मुस्लिम युवाओं के एक समूह ने इसे फिर से भव्य रूप दिया था।
तृणमूल पदाधिकारी और आयोजन समिति के पूर्व सदस्य मोहम्मद आलम ने इस बदलाव के बारे में अहम जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 2011 से वे लोग मिलकर यहां जन्माष्टमी का आयोजन कर रहे थे।
उस दौरान समिति में करीब 20 सदस्य थे और उनमें से आधे मुस्लिम थे। वे सब एकजुट होकर त्योहार मनाते थे, प्रसाद बांटते थे और सभी रीति-रिवाजों का पालन सुनिश्चित करते थे। हालांकि, इस साल आयोजन समिति से सभी मुस्लिम चेहरों को पूरी तरह बाहर कर दिया गया है।
फिलहाल आयोजन स्थल पर एक विशाल भगवा और सफेद रंग का पंडाल बनाया जा रहा है। वहां पंडाल निर्माण की देखरेख कर रहे एक आयोजक ने स्पष्ट किया कि पिछले साल तक जन्माष्टमी के आयोजन में मुसलमानों का भी नियंत्रण था। लेकिन इस साल इसका पूरा प्रबंधन केवल हिंदुओं द्वारा ही किया जा रहा है। आयोजकों की ओर से इस बड़े बदलाव को एक तरह की ‘शुद्धिकरण’ गतिविधि करार दिया गया है।
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