विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने एक बेहद अहम और गंभीर चिंता जाहिर की है। संगठन का स्पष्ट तौर पर मानना है कि सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और जेनरेटिव एआई को बच्चों के स्वास्थ्य को सीधे तौर पर प्रभावित करने वाले प्रमुख कारकों के रूप में देखा जाना चाहिए। इस मंडराते खतरे के बीच, WHO ने दुनियाभर की सरकारों से अपील की है कि वे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के नियमों को और अधिक सख्त बनाएं। कम उम्र के यूजर्स की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उनकी उम्र के हिसाब से उचित सुरक्षा उपाय लागू करना अब वक्त की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।
इस मुद्दे की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि WHO के महानिदेशक टेड्रोस एडनॉम घेब्रेयसस और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस विषय पर एक संयुक्त संदेश जारी किया है। दोनों शीर्ष नेताओं ने बताया कि लगातार बढ़ते सबूत इस बात की पुष्टि करते हैं कि बहुत ज्यादा समय डिजिटल स्क्रीन पर बिताने से बच्चों और किशोरों में एंग्जायटी, डिप्रेशन, नींद की कमी, आक्रामकता और अकेलापन बढ़ रहा है।
कुछ गंभीर मामलों में तो बच्चों के अंदर आत्महत्या जैसी प्रवृत्तियां भी देखने को मिली हैं। उन्होंने ऑनलाइन यौन शोषण, एआई द्वारा तैयार की गई बाल शोषण से जुड़ी तस्वीरों, गलत सूचनाओं के प्रसार और टार्गेटेड डिजिटल मार्केटिंग के बढ़ते खतरों को लेकर भी कड़ा अलर्ट जारी किया है।
बच्चों को सोशल मीडिया की लत से दूर रखने की यह मुहिम अब वैश्विक स्तर पर जोर पकड़ रही है। हाल ही में अपनी ऑस्ट्रेलिया यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस दिशा में उठाए गए कदमों की सराहना की थी। पीएम मोदी ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इंस्टाग्राम, फेसबुक और एक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने के कैनबरा सरकार के फैसले की जमकर तारीफ की। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि भारत भी इस साहसिक कदम से गहरी सीख ले रहा है।
भारत में भी अब कई राज्य सरकारों ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल को सीमित करने की योजनाएं बनानी शुरू कर दी हैं। कर्नाटक सरकार ने 16 वर्ष से कम आयु के यूजर्स के लिए प्रतिबंध का प्रस्ताव रखा है, जबकि आंध्र प्रदेश ने 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए ऐसे ही नियम लाने की बात कही है।
इसके अलावा, गोवा सरकार भी इसी तरह के कड़े उपायों पर गंभीरता से विचार कर रही है। हालांकि, पूरे देश में एक साथ ऐसा कोई भी प्रतिबंध लागू करना काफी चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि भारत में 1.1 अरब से ज्यादा स्मार्टफोन कनेक्शन मौजूद हैं और यहां दुनिया के युवा इंटरनेट यूजर्स की सबसे बड़ी आबादी निवास करती है।
डिजिटल लत के दुष्प्रभावों को लेकर एम्स (AIIMS) के मनोचिकित्सा विभाग के प्रोफेसर डॉ. नंद कुमार ने भी कई अहम जानकारियां साझा की हैं। उनका कहना है कि जरूरत से ज्यादा स्क्रीन देखने का शुरुआती असर किसी गंभीर मानसिक बीमारी के रूप में नहीं, बल्कि बच्चों के घटते ध्यान, कमजोर एकाग्रता और गिरते एकेडमिक प्रदर्शन के रूप में सामने आता है। उन्होंने बताया कि आमतौर पर बच्चे कभी खुद आकर अत्यधिक स्क्रीन इस्तेमाल करने की शिकायत दर्ज नहीं कराते हैं।
डॉ. कुमार के मुताबिक, जब ऐसे बच्चों की विस्तृत जांच की जाती है, तब जाकर यह सच्चाई सामने आती है कि लंबे समय तक डिजिटल गैजेट्स से चिपके रहना ही उनकी असली समस्या है। इसी के चलते बच्चों में डिजिटल निर्भरता, समाज से कटने और अकेलेपन जैसी स्थितियां पैदा हो रही हैं।
उन्होंने केवल सोशल मीडिया ही नहीं, बल्कि ऑनलाइन गेमिंग के छिपे हुए खतरों को लेकर भी माता-पिता को सचेत किया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भले ही बच्चे ऑनलाइन गेम खेलने में बेहद माहिर हो जाएं, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि उन कौशलों से असल जिंदगी में उनका ध्यान या एकाग्रता बेहतर हो जाएगी।
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