गुजरात में बच्चों के कुपोषण की समस्या कोई नई बात नहीं है। यह संकट पिछले कई सालों से चला आ रहा है। ऐसे में राज्य सरकार के हालिया फैसले ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार ने पीएम पोषण योजना के तहत स्कूली बच्चों को दिए जाने वाले स्नैक्स (नाश्ते) की मात्रा कम करने का निर्णय लिया है।
सरकार ने स्नैक्स की दैनिक मात्रा को 50 ग्राम से घटाकर साप्ताहिक औसत 46 ग्राम कर दिया है। सामने आई कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, अब हर सोमवार को बच्चों को केवल 38 ग्राम स्नैक्स ही मिलेंगे। यह मात्रा पहले के 50 ग्राम के तय नियम से काफी कम है।
‘वाइब्स ऑफ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, इसी हफ्ते की शुरुआत में सरकार ने ‘सुखड़ी’ को भी मेन्यू से हटा दिया है। सुखड़ी, गुड़ और गेहूं से बना एक पारंपरिक नाश्ता है जो स्कूल मील प्रोग्राम का एक अहम हिस्सा हुआ करता था। इस कदम से राज्य सरकार को करीब 30 करोड़ रुपये की बचत होने का अनुमान है।
फरवरी 2024 में राज्य सरकार ने खुद गुजरात विधानसभा में एक आंकड़ा पेश किया था। इसके मुताबिक, राज्य में 5.70 लाख से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं। इनमें से 4.38 लाख बच्चे अंडरवेट (कम वजन वाले) हैं। वहीं, अन्य 1.31 लाख बच्चे गंभीर रूप से कम वजन के शिकार हैं।
गुजरात में पांच साल से कम उम्र के हर दस में से चार बच्चों का विकास अवरुद्ध (स्टंटेड) है। हालांकि, इस आंकड़े में कुछ सुधार देखने को मिला है। यह साल 2022 के 53.6% से सुधरकर अब 40.8% हो गया है। लगभग इसी अनुपात (39.7%) में बच्चे कम वजन वाले हैं, जो पिछले राष्ट्रीय सर्वेक्षण के 39.3% के मुकाबले न के बराबर बदला है।
वहीं, वेस्टिंग (ऊंचाई के हिसाब से कम वजन) का आंकड़ा 2022 में 8.1% से बढ़कर 2023 में 8.9% हो गया था, जो 2024 में थोड़ा कम होकर 7.8% पर आ गया है।
इसके अलावा राज्य में एनीमिया (खून की कमी) का एक बड़ा संकट भी है। 6 से 59 महीने की उम्र के लगभग पांच में से चार छोटे बच्चे (79.7%) एनीमिक हैं। पिछले राष्ट्रीय सर्वेक्षण में यह आंकड़ा 62.6% था। यानी इसमें सीधे 17 प्रतिशत अंकों का उछाल आया है।
यह देश में दर्ज की गई सबसे तेज वृद्धियों में से एक है। 15 से 49 वर्ष की आयु की महिलाओं में 65% एनीमिया से पीड़ित हैं। इसी आयु वर्ग की गर्भवती महिलाओं में यह आंकड़ा 62.5% है।
भारत के सबसे अमीर राज्यों में से एक होने के बावजूद, नीति आयोग की 2023 से 24 की एसडीजी (SDG) रिपोर्ट के हंगर इंडेक्स में गुजरात का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है। 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सूची में गुजरात 25वें स्थान पर रहा है।
जिला स्तर पर तस्वीर और भी अधिक डरावनी है। सिर्फ एक साल के भीतर अकेले खेड़ा जिले में 9,634 नए कुपोषित बच्चे जुड़ गए। यह राज्य में दर्ज की गई सबसे बड़ी बढ़ोतरी थी।
इसके बाद अहमदाबाद का नंबर आता है जहां 3,516 नए मामले सामने आए। फिर 1,584 मामलों के साथ भरूच और 1,335 मामलों के साथ वलसाड का स्थान रहा। सबसे ज्यादा कम वजन वाले बच्चों के अनुपात वाले जिलों में डांग (53.1%), दाहोद (53%) और नर्मदा (52.8%) शामिल थे।
वहीं, बेहतर प्रदर्शन करने वाले जिलों में 28.9% के साथ जामनगर, 26.4% के साथ जूनागढ़ और 25.5% के साथ पोरबंदर शामिल रहे।
पिछले तीन सालों में केंद्र सरकार ने पोषण अभियान के तहत गुजरात को कुल 2,879.3 करोड़ रुपये की धनराशि भेजी है। इसमें 2021 से 22 के दौरान 839.86 करोड़ रुपये, 2022 से 23 में 912.64 करोड़ रुपये और 2023 से 24 में 1,126.8 करोड़ रुपये शामिल हैं।
इसके अलावा, राज्य ने विकसित गुजरात फंड के तहत एक न्यूट्रिशन मिशन (पोषण मिशन) की भी घोषणा की है। इसके लिए 2025 से 26 के बजट में 75 करोड़ रुपये अलग से रखे गए हैं।
एक तरफ जहां फंड में बढ़ोतरी हुई है, वहीं दूसरी तरफ योजना की पहुंच सिकुड़ गई है। इस कार्यक्रम के तहत लाभार्थियों की संख्या 2021 से 22 में 4.287 मिलियन से घटकर मार्च 2024 तक 3.782 मिलियन रह गई है।
पोषण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि खाने की मात्रा कम करने से बच्चे कुपोषण की और गहरी खाई में धकेल दिए जाएंगे। बच्चों के सही विकास के लिए प्रोटीन, आयरन और माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की जरूरत होती है। मिठाइयां और स्नैक्स की घटी हुई मात्रा शरीर की इन जरूरतों को पूरा नहीं कर सकतीं।
इसके साथ ही एक पुरानी बहस फिर से छिड़ गई है। जब भी गुजरात के बाल पोषण के आंकड़े सुर्खियों में आते हैं, यह बहस फिर से सामने आ जाती है। यह विवाद अंडों को लेकर है।
राष्ट्रीय पोषण संस्थान (National Institute of Nutrition) भी बच्चों को अंडे देने की सिफारिश करता है। तमिलनाडु वह राज्य है जिसने गुजरात को अपना मिड-डे मील कार्यक्रम शुरू करने के लिए प्रेरित किया था। वहां सालों से बच्चों को अंडे परोसे जा रहे हैं। विज्ञान के नजरिए से इसमें कोई विवाद नहीं है।
विवाद सिर्फ इस बात पर है कि क्या गुजरात के किसी स्कूली बच्चे की थाली में उबला हुआ अंडा होना चाहिए या नहीं। दशकों बीत जाने के बाद भी इस सवाल का जवाब ‘ना’ ही है।
‘राइट टू फूड’ अभियान से जुड़े कार्यकर्ता इस मुद्दे पर काफी बेबाक रहे हैं। उनका कहना है कि गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में आप इस विषय को उठा भी नहीं सकते। ऐसा करने पर सवर्ण हिंदुओं की भावनाओं को ठेस पहुंचाने के आरोप लगने का खतरा बना रहता है।
यह कोई हालिया घटनाक्रम नहीं है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1990 के दशक के मध्य और 2000 के दशक की शुरुआत में, गुजरात में दलित और मुस्लिम माताओं को चेतावनी दी जाती थी कि वे अपने बच्चों के स्कूल टिफिन में उबला हुआ अंडा न रखें।
एक समय था जब गुजरात इस क्षेत्र में अग्रणी हुआ करता था। साल 1984 में जब तत्कालीन मुख्यमंत्री माधवसिंह सोलंकी ने मिड-डे मील योजना की शुरुआत की थी, तब तमिलनाडु के बाद ऐसा करने वाला गुजरात भारत का केवल दूसरा राज्य बना था।
कई दशकों बाद, जो राज्य कभी दूसरों का नेतृत्व करता था, वह आज बच्चों के स्नैक्स में कटौती कर रहा है। ‘सुखड़ी’ को बंद किया जा रहा है और अभी भी अंडों के विषय पर बात करने को तैयार नहीं है।
विपक्षी नेताओं ने सरकार पर खर्च कम करने की आड़ में बच्चों के स्वास्थ्य से समझौता करने का आरोप लगाया है। वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता और बाल कल्याण समूह इस फैसले को वापस लेने और प्रोटीन युक्त आहार को दोबारा बहाल करने की मांग कर रहे हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस कटौती का सबसे बुरा असर ग्रामीण और आदिवासी जिलों में देखने को मिलेगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन इलाकों के बच्चे सबसे ज्यादा स्कूल के भोजन पर ही निर्भर रहते हैं।
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