दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बेहद अहम टिप्पणी की है। अदालत ने उमर खालिद से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि कड़े गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत भी “जमानत नियम है और जेल अपवाद है”।
शीर्ष अदालत ने उन पिछले फैसलों की समीक्षा के दौरान यह अहम बात कही, जिनमें खालिद और सह-आरोपी शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा पीठ ने जनवरी 2026 में एक अन्य पीठ द्वारा दिए गए उस फैसले पर गंभीर आपत्ति जताई है, जिसमें खालिद और इमाम को राहत नहीं मिली थी, जबकि इसी मामले के पांच अन्य आरोपियों को जमानत दे दी गई थी।
वर्तमान पीठ का मानना है कि पहले का यह फैसला 2021 के ऐतिहासिक ‘केए नजीब’ (KA Najeeb) जजमेंट में तय किए गए कानूनी सिद्धांतों को कमजोर करता है। उस ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया था कि बिना ट्रायल के लंबे समय तक जेल में रखना अपने आप में UAPA के तहत जमानत देने का एक मजबूत आधार बन सकता है।
अदालत की यह नई टिप्पणी राजनीतिक और कानूनी रूप से काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। UAPA भारत का सबसे सख्त आतंकवाद विरोधी कानून है, जिसके तहत जमानत मिलना सामान्यतः बेहद मुश्किल होता है।
इस कानून की धारा 43D(5) आरोपी पर भारी दबाव डालती है। इसके तहत अगर आरोप “प्रथम दृष्टया सही” लगते हैं, तो अदालतें जमानत देने से इनकार कर सकती हैं। आलोचकों का लंबे समय से तर्क रहा है कि यह कड़ा प्रावधान कानूनी प्रक्रिया को ही एक प्रकार की सजा में बदल देता है, जिससे ट्रायल शुरू होने से पहले ही आरोपी कई साल जेल में बिताने को मजबूर हो जाते हैं।
यह पूरा मामला फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए भयंकर दंगों से जुड़ा है। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शनों के दौरान यह हिंसा भड़की थी, जिसमें 53 लोगों की जान चली गई और सैकड़ों लोग बुरी तरह घायल हुए थे।
दिल्ली पुलिस का आरोप था कि तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान अशांति फैलाने के लिए सीएए विरोधी प्रदर्शन एक “बड़ी साजिश” का हिस्सा थे। इस मामले में उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा और मीरान हैदर सहित कई कार्यकर्ताओं और छात्र नेताओं पर UAPA और साजिश रचने के तहत गंभीर मामले दर्ज किए गए थे।
सरकारी वकीलों ने दावा किया था कि इनके कुछ भाषणों और सुनियोजित प्रदर्शनों ने देश की संप्रभुता तथा स्थिरता के लिए बड़ा खतरा पैदा किया। इसी आधार पर जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने खालिद और इमाम को इस साजिश का “मुख्य सूत्रधार” बताते हुए उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी।
हालांकि, उसी फैसले में पांच अन्य सह-आरोपियों को सशर्त जमानत दे दी गई थी। तब अदालत का तर्क था कि पूरी साजिश में उनकी भूमिका बहुत सीमित या केवल व्यवस्थाएं जुटाने तक थी।
जनवरी के उस फैसले के बाद कानूनी हलकों में तीखी बहस छिड़ गई थी। नागरिक अधिकार समूहों और संविधान विशेषज्ञों ने चिंता जताई थी कि अदालत ने UAPA के तहत “आतंकवादी कृत्य” की परिभाषा का बहुत अधिक विस्तार कर दिया है।
आलोचकों ने चेतावनी दी थी कि चक्का जाम जैसे विरोध प्रदर्शनों को भी इसमें शामिल करने से लोकतांत्रिक विरोध और आतंकवाद के बीच का अंतर पूरी तरह धुंधला हो सकता है।
सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणियां इस बात का स्पष्ट संकेत देती हैं कि न्यायपालिका UAPA के जमानत प्रावधानों की व्याख्या पर पुनर्विचार कर रही है।
अदालत ने जोर देकर कहा है कि आतंकवाद विरोधी सख्त कानून भी अनुच्छेद 21 और 22 के तहत दी गई संवैधानिक गारंटी को खत्म नहीं कर सकते। ये अनुच्छेद हर नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उचित कानूनी प्रक्रिया की रक्षा करते हैं।
पीठ ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट की छोटी पीठ बड़ी पीठ द्वारा स्थापित बाध्यकारी मिसालों को ऐसे ही नजरअंदाज नहीं कर सकती। यह सीधा इशारा केए नजीब मामले के उस नियम की तरफ था जिसे पिछली बार जमानत खारिज करते वक्त अनदेखा कर दिया गया था।
उमर खालिद को सितंबर 2020 में गिरफ्तार किया गया था और वह तब से लगातार जेल में हैं। हालांकि उन्होंने हमेशा खुद पर लगे सभी आरोपों से इनकार किया है। अदालत की इन नई टिप्पणियों से बिना ट्रायल के इतने लंबे समय तक जेल में रहने के आधार पर भविष्य में उनके लिए जमानत की राह मजबूत हो सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम का असर केवल इसी मामले तक सीमित नहीं रहेगा। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों से देशभर में UAPA के तहत होने वाली जमानत की सुनवाई पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। यह विशेष रूप से उन मामलों के लिए राहत की खबर हो सकती है जहां ट्रायल पूरा हुए बिना आरोपियों को सालों से हिरासत में रखा गया है।
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