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पीपावाव पोर्ट विवाद और भारत में पर्यावरण लोकतंत्र की स्थिति

| Updated: May 26, 2026 14:53

सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणियों और गुजरात के पीपावाव बंदरगाह विस्तार को मिली मंजूरी ने एक नई बहस छेड़ दी है: क्या बुनियादी ढांचे और विकास की दौड़ में पर्यावरण सुरक्षा को केवल एक औपचारिकता बना दिया गया है?

हाल ही में मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने खुली अदालत में टिप्पणी की थी कि पर्यावरणविदों ने शायद ही कभी किसी परियोजना का स्वागत किया हो, वे हमेशा आपत्तियां ही जताते हैं। उनके इस बयान ने कई लोगों को निराश किया है। माना जा रहा है कि इस टिप्पणी ने जनहित से जुड़े पर्यावरणीय मामलों को बहस शुरू होने से पहले ही कमजोर कर दिया है। इसके जवाब में 22 मई को 49 संगठनों और शिक्षाविदों व पर्यावरणविदों सहित 553 लोगों ने सीजेआई सूर्यकांत को एक पत्र लिखा। इस पत्र में उन्होंने सीजेआई से अपनी टिप्पणी वापस लेने की मांग करते हुए कहा कि ऐसे बयान सद्भावनापूर्ण पर्यावरणीय मुकदमों की वैधता और पर्यावरण कानूनों को लागू करने में नागरिकों की संवैधानिक भूमिका को कमतर कर सकते हैं।

यह पूरा विवाद गुजरात के पीपावाव बंदरगाह के विस्तार से जुड़ा है। सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के उस आदेश को चुनौती देने वाली अपील खारिज कर दी थी, जिसमें बंदरगाह के विस्तार को मंजूरी दी गई थी। याचिकाकर्ता और पर्यावरणविद् चेतन नवीनराय व्यास ने इस विस्तार से ओलिव रिडले कछुओं, समुद्री जीवों, पक्षियों, मैंग्रोव और सौराष्ट्र तट के मछुआरों की आजीविका पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर गंभीर चिंता जताई थी। गौरतलब है कि गुजरात का लगभग 90 प्रतिशत मछली उत्पादन इसी क्षेत्र से होता है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ इन तर्कों से सहमत नहीं हुई और याचिकाकर्ता के वकील से कहा कि आप पर्यावरण के नाम पर हर चीज को रोकना चाहते हैं, बिना बुनियादी ढांचे के देश का विकास कैसे हो सकता है?

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी पर पूरे भारत में पर्यावरण वकीलों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, सेवानिवृत्त नौकरशाहों और पूर्व वन अधिकारियों ने कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

पीपावाव बंदरगाह विस्तार को पर्यावरण मंजूरी पहली बार 2012 में मिली थी, लेकिन इस दिशा में बहुत कम काम हुआ। यह मंजूरी 2019 में समाप्त हो गई और बाद में इसे जून 2024 तक बढ़ा दिया गया। इस अवधि में केवल बुनियादी सुविधाओं का ही निर्माण हो सका। मई 2025 के मंत्रालयी रिकॉर्ड से पता चलता है कि परियोजना में बेहद कम प्रगति हुई थी। वहीं, जुलाई 2025 के एक मंजूरी पत्र में देरी का कारण व्यापक व्यावसायिक कारकों को बताया गया।

इसके बाद 29 अक्टूबर 2025 को गुजरात मैरीटाइम बोर्ड और गुजरात पीपावाव पोर्ट लिमिटेड के बीच 17,000 करोड़ रुपये के समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए। यह एमओयू जुलाई की मंजूरी के महीनों बाद आया, जो दर्शाता है कि निवेश सुरक्षित होने से पहले ही मंजूरी दे दी गई थी। यह भी दिलचस्प है कि कंपनी के काम की वास्तविक प्रकृति स्पष्ट होने या निवेश आने से पहले ही पर्यावरण प्रभाव आकलन (ईआईए) रिपोर्ट आ गई थी।

जब स्थानीय निवासियों ने नई मंजूरी का विरोध करते हुए एनजीटी की पश्चिमी क्षेत्र पीठ का दरवाजा खटखटाया, तो उन्हें 44 पन्नों का आदेश थमा दिया गया। हैरानी की बात यह रही कि इसमें से 40 से अधिक पन्ने केवल ईआईए रिपोर्ट के अंश थे। ट्रिब्यूनल ने अपनी समीक्षा के मानक पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की और किसी भी खामी को नकारते हुए अपील खारिज कर दी। साथ ही याचिकाकर्ताओं को फिर से उसी पीठ के पास जाने का निर्देश दिया। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसा ही रुख अपनाया और यह स्पष्ट नहीं किया कि याचिकाकर्ता किस आधार पर न्यायिक समीक्षा की उम्मीद कर सकते हैं।

याचिकाकर्ता का प्रतिनिधित्व कर रही वरिष्ठ अधिवक्ता अनीता शेनॉय ने अदालत में तर्क दिया कि ईआईए रिपोर्ट समुद्री पारिस्थितिकी, कछुओं और पक्षियों की जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभावों को पर्याप्त रूप से संबोधित करने में विफल रही है। इसके जवाब में पीठ ने विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) के निष्कर्षों का हवाला देते हुए कहा कि इन दावों की जांच की जा चुकी है और ये निराधार पाए गए हैं। हालांकि, पीठ ने अपनी समीक्षा प्रक्रिया को स्पष्ट नहीं किया और याचिकाकर्ता के उस तर्क पर भी ध्यान नहीं दिया जिसमें कहा गया था कि एनजीटी का आदेश बिना स्वतंत्र जांच के केवल ईआईए की नकल मात्र है। इससे न्यायिक समीक्षा के मानक अस्पष्ट ही रहे।

पीपावाव विस्तार के लिए तैयार की गई ईआईए रिपोर्ट इस क्षेत्र में पक्षियों और संरक्षित प्रजातियों सहित समृद्ध वनस्पतियों और जीवों की उपस्थिति स्वीकार करती है। लेकिन, भारत में कई अन्य ईआईए रिपोर्टों की तरह, इसमें भी यह दावा किया गया है कि परियोजना से इन्हें कोई नुकसान नहीं होगा। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या गुजरात में पर्यावरण मंजूरी पर्यावरण की सुरक्षा का साधन बनने के बजाय केवल एक औपचारिकता बनकर रह गई है?

बंदरगाह विस्तार के लिए कुल 18,243 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता है, जिसमें आस-पास के गांवों से अधिग्रहित 600 एकड़ जमीन भी शामिल है। इस क्षेत्र में कई जल निकाय, मैंग्रोव और नमक के मैदान फैले हुए हैं। एनजीटी ने भी ईआईए के उस वाक्यांश को उद्धृत किया जिसमें बंदरगाह क्षेत्र को “पक्षी विविधता के लिए स्वर्ग” बताया गया था। पर्यावरण वकील नोर्मा अल्वारेस ने फ्रन्टलाइन पत्रिका से बातचीत में इस पर एक अहम बात कही। उन्होंने कहा कि एक औद्योगिक क्षेत्र, जिसका विस्तार बड़े जहाजों और माल ढुलाई के लिए किया जा रहा हो, उसे ऐसा विशेषण देना बेहद असामान्य है।

नोर्मा अल्वारेस ने एक मुख्य समस्या को उजागर किया कि अदालतें अक्सर ईआईए को ही अंतिम सत्य मान लेती हैं, जबकि ये आकलन परियोजना समर्थकों द्वारा ही तैयार कराए जाते हैं और शायद ही कभी इनकी कोई स्वतंत्र जांच की जाती है।

याचिकाकर्ता अदालत में नियामक दस्तावेजों और वास्तविक पारिस्थितिक स्थितियों के बीच की विसंगतियों को उजागर करने का प्रयास करते हैं। लेकिन, अदालतें इन विसंगतियों की समीक्षा के मानकों को स्पष्ट करने से लगातार इनकार कर रही हैं, जिससे याचिकाकर्ताओं के मन में न्यायिक जांच की अपेक्षाओं को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।

पीपावाव का मामला कोई इकलौती घटना नहीं है। यह गुजरात में पर्यावरण शासन का एक प्रतिनिधिक उदाहरण है और तेजी से पूरे भारत की स्थिति बयान कर रहा है क्योंकि हाल के वर्षों में राष्ट्रीय स्तर पर भी इसी गुजरात मॉडल का पालन किया जा रहा है।

गुजरात की पर्यावरण मंजूरी प्रक्रिया में गहरी खामियां हैं। तटीय गलियारे, निवेश क्षेत्र और बंदरगाह विस्तार जैसी बड़ी परियोजनाएं कमजोर ईआईए रिपोर्ट के आधार पर आगे बढ़ रही हैं। जनसुनवाई आम लोगों की पहुंच से दूर रहती है और स्थानीय आपत्तियों को नियमित रूप से खारिज कर दिया जाता है। संबंधित पक्षों द्वारा मीडिया प्रबंधन के कारण सार्वजनिक बहस भी दब जाती है। औद्योगिकीकरण की आड़ में अपर्याप्त ईआईए और आपत्तियों की अनदेखी जैसी प्रणालीगत समस्याएं तेजी से बढ़ी हैं, जिससे पर्यावरण समीक्षाएं महज रस्म अदायगी बन गई हैं। हालांकि, कॉन्स्टीट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप और नेशनल एलायंस फॉर जस्टिस, अकाउंटेबिलिटी एंड राइट्स जैसे संगठनों के पत्रों के बाद इस मुद्दे पर संपादकीय जांच बढ़ी है, जिसमें 90 के दशक के सुप्रीम कोर्ट के न्यायशास्त्र का भी हवाला दिया गया है।

वकीलों के पत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि पर्यावरण संबंधी जनहित याचिकाओं का ढांचा खुद सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही स्थापित किया गया था। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार शामिल है, जो दशकों के न्यायशास्त्र से विकसित हुआ एक न्यायाधीश निर्मित कानून है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद ही 2010 में संसद द्वारा नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की स्थापना की गई थी। ऐसे में जब अदालत आज एनजीटी में की गई अपीलों को विकास में नियमित बाधा बताती है, तो यह उस प्रणाली को ही कमजोर करता है जिसे उसने खुद बनाने में मदद की थी।

आज हालात यह हैं कि एनजीटी की लगभग 80 प्रतिशत अपीलें धनी और रसूखदार उल्लंघनकर्ताओं के पक्ष में खारिज कर दी जाती हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 51ए(जी) हर नागरिक के लिए प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने का मौलिक कर्तव्य स्थापित करता है। वनों और समुद्र तटों की रक्षा के लिए मुकदमा लड़ने वाले नागरिक राज्य के विरोध में काम करने के बजाय अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी निभा रहे हैं। इसके बावजूद, जैसा कि मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की, पर्यावरण संबंधी चिंताएं उठाने वाले ऐसे नागरिकों को अक्सर विकास और राज्य के विरोधी के रूप में देखा जाता है।

वास्तविकता यह है कि कोई भी गंभीर पक्षकार भारत में बुनियादी ढांचे के निर्माण का विरोध नहीं करता है। देश को बंदरगाहों, सड़कों, बिजली और शहरों में निवेश की सख्त जरूरत है। असली मुद्दा विकास कार्यों में पारदर्शिता, गहनता और प्रभावित समुदायों के प्रति वास्तविक संवेदनशीलता की कमी का है।

जलवायु परिवर्तन के वर्तमान परिदृश्य में ये मुद्दे और भी जरूरी हो जाते हैं। भारत दुनिया के सबसे अधिक जलवायु-संवेदनशील देशों में से एक है। इसके तटीय क्षेत्र, भूजल पर निर्भर कृषि, मैंग्रोव से घिरे तटबंध और जैव विविधता से भरपूर आंतरिक इलाके बढ़ते तापमान और चरम मौसम की घटनाओं के कारण गंभीर खतरे का सामना कर रहे हैं। ऐसे में पर्यावरण मुकदमों पर न्यायिक फैसले सिर्फ व्यक्तिगत प्रभावों तक सीमित नहीं होते; वे यह तय करते हैं कि क्या नागरिक अपनी चिंताओं को उठाने के लिए सशक्त महसूस करते हैं और क्या संस्थाएं उनके प्रति जवाबदेह बनी रहती हैं।

पीपावाव बंदरगाह विस्तार का पारिस्थितिक प्रभाव अभी भी अनिश्चित है और इसके लिए कड़े, स्वतंत्र ईआईए मूल्यांकन और अपीलीय समीक्षा की आवश्यकता है। इस मामले में अदालतों ने यह स्पष्ट नहीं किया कि समीक्षा का कौन सा मानक लागू किया गया। व्यापक स्तर पर देखें तो यह मामला एक ऐसी नियामक प्रणाली को रेखांकित करता है जिसमें समीक्षा के मानक शायद ही कभी स्पष्ट किए जाते हैं, मंजूरियों को महज औपचारिकता माना जाता है, ट्रिब्यूनल दस्तावेजों की आलोचनात्मक जांच करने के बजाय उनकी नकल करते हैं और सर्वोच्च अदालत बिना समीक्षा मानदंड बताए चुनौतियों को दुर्भावनापूर्ण मान लेती है।

यह पूरा पैटर्न गुजरात में स्थापित हो चुका है, जिसकी तटरेखा भारत में सबसे लंबी है। एक ऐसी नियामक प्रणाली के तहत जो रक्षक के बजाय एक प्रवेश द्वार की तरह ज्यादा काम करती है, औद्योगिकीकरण के कारण यहां काफी बदलाव हुए हैं। गुजरात के मछली उत्पादन में अहम योगदान देने वाले सौराष्ट्र के मछुआरे पीपावाव क्षेत्र से प्रभावित पानी पर ही निर्भर हैं। लेकिन अदालतों ने दो बार इस बात पर गंभीरता से विचार करने से इनकार कर दिया कि क्या उनके हितों की रक्षा की गई थी।

जब मुख्य न्यायाधीश यह सवाल करते हैं कि क्या पर्यावरणविदों ने कभी किसी परियोजना का स्वागत किया है, तो इसका ईमानदार और सटीक जवाब यह है कि वे कभी-कभी ऐसा करते हैं। बशर्ते कि प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी हो, ईआईए रिपोर्ट वास्तव में स्वतंत्र हो, जनसुनवाई सार्थक हो और चिंताओं का सही तरीके से समाधान किया गया हो। यह नजरिया अदालत में बहुत कम पेश हो पाता है क्योंकि एनजीटी और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचने वाले मामले आमतौर पर उन्हीं परिस्थितियों से जुड़े होते हैं जहां इन मानकों का पालन नहीं किया गया होता है। नतीजतन, ऐसा प्रतीत होता है कि अदालत एक चुनिंदा नमूने के आधार पर व्यापक निष्कर्ष निकाल रही है, जो कि एक बड़ी विश्लेषणात्मक त्रुटि है।

पीपावाव का मामला अब सिर्फ एक बंदरगाह तक सीमित नहीं रह गया है; यह इस बात का प्रतीक बन गया है कि क्या भारत में पर्यावरणीय जांच अब भी मायने रखती है। आगे क्या होगा? क्या सच्चे पर्यावरण लोकतंत्र और पर्यावरणीय जांच की बात करने वाले हर व्यक्ति को अब राष्ट्रविरोधी करार दे दिया जाएगा?

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