किसी भी इमारत में आग लगने पर अक्सर लपटों से ज्यादा वह हवा जानलेवा साबित होती है, जिसमें लोग सांस लेते हैं। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि बंद जगहों पर लगी आग में जलने से कहीं ज्यादा मौतें दम घुटने, जहरीला धुआं शरीर में जाने और ऑक्सीजन की भारी कमी के कारण होती हैं। जलते हुए सामान से निकलने वाली जहरीली गैसें, फेफड़ों को झुलसा देने वाली भीषण गर्मी और शरीर को पर्याप्त ऑक्सीजन न मिल पाना इस खतरे को कई गुना बढ़ा देते हैं।
बुधवार की घटना के प्रबंधन का नेतृत्व करने वाले मैक्स हेल्थकेयर के ग्रुप मेडिकल डायरेक्टर डॉ. संदीप बुद्धिराजा ने बताया कि आग की चपेट में आई किसी इमारत में फंसने पर ज्यादातर लोगों की मौत दम घुटने से होती है। उनका कहना है कि जैसे-जैसे तापमान बढ़ता है, हवा में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिरने लगता है। इसी दौरान कार्बन मोनोऑक्साइड और हाइड्रोजन साइनाइड जैसी जहरीली गैसें धुएं में मिल जाती हैं। यह धुआं इतना गर्म होता है कि फेफड़ों को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचा सकता है, जिससे इंसान बहुत जल्दी बेहोश हो जाता है।
डॉ. बुद्धिराजा के अनुसार, सामान्य हवा में ऑक्सीजन का स्तर लगभग 21 प्रतिशत होता है, लेकिन आग से प्रभावित किसी बंद जगह पर इसमें भारी गिरावट आती है। ऑक्सीजन का स्तर कम होते ही इंसान अपना होश खोने लगता है और उसके सोचने-समझने की क्षमता खत्म हो जाती है। ऐसे हालात में अगर बचाव कार्य में थोड़ी भी देरी होती है, तो फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचता है और पीड़ित का बचना बेहद मुश्किल हो जाता है।
धुएं के संपर्क में आने का यह भयानक रूप मालवीय नगर अग्निकांड में देखने को मिला, जहां बुधवार दोपहर तक 21 लोगों की जान चली गई। इस दौरान बचाव अभियान में जुटे कम से कम 10 पुलिसकर्मियों और दो दमकलकर्मियों को भी धुएं के कारण सांस लेने में तकलीफ और घुटन की शिकायत के बाद एम्स ट्रॉमा सेंटर में भर्ती कराया गया। इनमें से कुछ लोगों को रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान संतुलन बिगड़ने या गिरने की वजह से चोटें भी आई हैं।
आग से बुरी तरह झुलसना भी कई जानलेवा जटिलताओं को जन्म देता है। आरएमएल अस्पताल के त्वचा रोग विभाग के प्रमुख डॉ. कबीर सरदाना के मुताबिक 90 प्रतिशत से ज्यादा जलना जानलेवा हो सकता है। शरीर के बड़े हिस्से के जलने से भारी मात्रा में तरल पदार्थ (फ्लूइड) का नुकसान होता है, ब्लड प्रेशर गिर जाता है और मरीज शॉक में चला जाता है। त्वचा की ऊपरी परत नष्ट होने से संक्रमण का खतरा तेजी से बढ़ता है, जो अंततः अंगों के काम करना बंद करने (ऑर्गन फेलियर) का कारण बन सकता है। मधुमेह या हृदय रोग जैसी बीमारियों से जूझ रहे लोगों के लिए यह स्थिति और भी ज्यादा खतरनाक होती है।
डॉक्टरों का मानना है कि आधुनिक इमारतें एक अलग तरह की चुनौती पेश करती हैं क्योंकि वहां मौजूद प्लास्टिक, सिंथेटिक फर्नीचर और निर्माण सामग्री जलने पर बेहद जहरीले रसायन छोड़ते हैं। अपोलो अस्पताल के बर्न और रिकंस्ट्रक्टिव सर्जन डॉ. कुलदीप सिंह बताते हैं कि बंद जगहों की आग में कार्बन मोनोऑक्साइड पॉइजनिंग मौत के सबसे आम कारणों में से एक है। यह गैस ऑक्सीजन के मुकाबले हीमोग्लोबिन से अधिक मजबूती से जुड़ती है, जिससे महत्वपूर्ण अंगों तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती और व्यक्ति चंद मिनटों में बेहोश हो सकता है। जलने वाली सामग्री साइनाइड और अन्य जहरीली गैसें भी छोड़ती है, जो इस स्थिति को और बिगाड़ देती हैं।
डॉ. सिंह का यह भी कहना है कि धुएं में मौजूद कालिख (सूट) के कण सांस की नली में गहराई तक जमा हो जाते हैं। अत्यधिक गर्म हवा सांस लेने से श्वासनली, ब्रोंकाई और फेफड़ों को थर्मल इंजरी (गर्मी से होने वाला नुकसान) होती है।
जीटीबी अस्पताल के पूर्व फैकल्टी सदस्य और बर्न एवं रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी विशेषज्ञ डॉ. विशाल कुमार के अनुसार, आग से निकाले जाने के बाद भी पीड़ित की सांस संबंधी चोटें अक्सर बिगड़ती जाती हैं। गर्म धुएं के कारण सांस की नली में सूजन आ जाती है, जिससे सांस लेना लगातार मुश्किल होता जाता है। कई बार शुरुआत में स्थिर दिखने वाले मरीज भी सांस की गंभीर तकलीफ के चलते अचानक दम तोड़ सकते हैं।
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