गुजरात के ग्रेटर गिर परिदृश्य में शेरों के बदलते और आक्रामक होते बर्ताव ने वन विभाग की चिंताएं काफी बढ़ा दी हैं। बीते लगभग दो महीनों में इंसानों और शेरों के बीच संघर्ष के 10 मामले सामने आए हैं, जिनमें कुछ बेहद जानलेवा साबित हुए। इन खौफनाक घटनाओं को देखते हुए अब गुजरात वन विभाग ने वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) की मदद लेने का फैसला किया है। यह प्रतिष्ठित संस्थान शेरों के इस खतरनाक रूप और उनके व्यवहार में आए अप्रत्याशित बदलाव की गहराई से जांच करेगा।
इस प्रस्तावित अध्ययन के तहत शेरों के स्वभाव, उनके शिकार की उपलब्धता, उनके आवास और आवाजाही के रास्तों का बारीकी से विश्लेषण किया जाएगा। वरिष्ठ वन अधिकारियों का कहना है कि हाल की घटनाएं इसलिए भी ज्यादा डरावनी हैं क्योंकि शेरों ने इंसानों पर सिर्फ हमला ही नहीं किया, बल्कि उनके शवों को आंशिक रूप से अपना भोजन भी बनाया।
नाम न छापने की शर्त पर एक वरिष्ठ वन अधिकारी ने बताया कि अतीत में शेरों का ऐसा बर्ताव बेहद दुर्लभ माना जाता था। लेकिन पिछले दो महीनों में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जहां शेरों ने लोगों की जान लेकर उनके शवों को खाया है। वन विभाग अब वैज्ञानिक रूप से यह समझना चाहता है कि क्या यह कोई व्यवहारिक बदलाव है, किसी पारिस्थितिक दबाव का नतीजा है, या इसके पीछे कोई अन्य बड़ा कारण छिपा है। इसी गुत्थी को सुलझाने के लिए WII के विशेषज्ञों को बुलाया गया है।
प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यजीव) जयपाल सिंह ने भी इस अहम कदम की पुष्टि की है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि विभाग ने WII को जांच में शामिल करने का अंतिम निर्णय ले लिया है। यह अध्ययन मुख्य रूप से ग्रेटर गिर परिदृश्य पर ही केंद्रित रहेगा, जबकि इसके सटीक दायरे और कार्यप्रणाली की पूरी रूपरेखा बाद में तय की जाएगी।
हालांकि वन विभाग आधिकारिक तौर पर यह मानता है कि गिर में शेरों के लिए शिकार पर्याप्त मात्रा में मौजूद है, लेकिन जमीनी हकीकत थोड़ी अलग है। अधिकारी खुद यह स्वीकार करते हैं कि ग्रेटर गिर क्षेत्र में लंबे समय से शाकाहारी वन्यजीवों (अंगुलेट्स) की आबादी का कोई नियमित वैज्ञानिक मूल्यांकन नहीं किया गया है। बिना किसी सटीक और समयबद्ध गणना के वस्तुनिष्ठ रूप से यह कहना काफी मुश्किल है कि समय के साथ शेरों के शिकार की उपलब्धता में कोई भारी कमी आई है या नहीं।
मवेशियों पर बढ़ते हमलों के आंकड़े भी इस समस्या की एक अलग ही कहानी बयां करते हैं। गुजरात सरकार द्वारा विधानसभा में पेश किए गए हालिया आंकड़ों के अनुसार, केवल अमरेली जिले में साल 2023 में 920 पशुपालकों को शेरों द्वारा मारे गए मवेशियों के लिए मुआवजा दिया गया था।
साल 2024 तक यह आंकड़ा लगभग 5 प्रतिशत बढ़कर 965 तक पहुंच गया। वहीं, जनवरी 2025 में 81 पशुपालकों को 5.5 लाख रुपये का मुआवजा बांटा गया है। एक वरिष्ठ अधिकारी का सीधा सवाल है कि अगर जंगलों में जंगली शिकार पर्याप्त है, तो मवेशियों पर शेरों के हमले लगातार क्यों बढ़ रहे हैं।
WII को वापस बुलाने का विभाग का यह फैसला इसलिए भी काफी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि राज्य सरकार ने जुलाई 2020 में संस्थान के एक लंबे और ऐतिहासिक शेर अनुसंधान प्रोजेक्ट को अचानक बीच में ही रोक दिया था। यह रोक राज्य में शेरों की होने वाली गणना से ठीक पहले लगाई गई थी और इसका कोई स्पष्ट कारण भी सार्वजनिक नहीं किया गया था।
यह महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट साल 2006 में “इकोलॉजी ऑफ लायंस इन द एग्रो-पैस्टोरल गिर लैंडस्केप” के नाम से शुरू किया गया था। बाद में इसका दायरा और भी अधिक बढ़ने पर इसे नया नाम दिया गया। साल 2007 में शेरों को रेडियो-कॉलर पहनाने की शुरुआत हुई थी, जिसने शोधकर्ताओं को स्वतंत्र रूप से घूमने वाले एशियाई शेरों का देश में सबसे लंबा डेटाबेस तैयार करने में मदद की।
इस 14 साल तक चले प्रोजेक्ट ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए थे। अध्ययन में यह बात सामने आई थी कि शेर एक ही रात में लगभग 100 किलोमीटर तक का लंबा सफर तय कर सकते हैं।
इस रिसर्च में यह भी पाया गया था कि कई किसान शेरों को अपने खेतों के आसपास इसलिए बर्दाश्त कर लेते थे, क्योंकि ये शिकारी जीव उनकी फसल बर्बाद करने वाले जंगली सुअरों और नीलगाय का शिकार करके एक तरह से उनकी मदद करते थे।
पूर्व वन अधिकारियों का मानना है कि 2020 में बिना किसी स्पष्टीकरण के इस शानदार अध्ययन को रोक देने से पारिस्थितिक निगरानी में एक बहुत बड़ी खाई पैदा हो गई। उनका कहना है कि परिदृश्य स्तर के बदलाव रातों-रात नहीं होते, बल्कि इन्हें सामने आने में सालों लग जाते हैं।
अगर WII का वह शोध लगातार जारी रहता, तो आज हमारे पास शेरों के बदलते बर्ताव और उनके रास्तों का एक निरंतर वैज्ञानिक रिकॉर्ड मौजूद होता। उस डेटा की मदद से यह समझना बहुत आसान हो जाता कि आखिर अचानक से इंसानों और शेरों के बीच संघर्ष की घटनाएं इतनी तेजी से क्यों बढ़ रही हैं।
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