रूस से कच्चे तेल के आयात को लेकर अमेरिका एक बार फिर भारत पर रणनीतिक दबाव बनाने की तैयारी में है। अमेरिकी सीनेट में एक ऐसा नया विधेयक पेश किया गया है, जिसमें भारत सहित पांच देशों पर 100 प्रतिशत आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने का प्रस्ताव है। नई दिल्ली इस पूरे घटनाक्रम पर बेहद बारीकी से नजर रख रही है, क्योंकि यदि यह कानून बनता है तो इसका सीधा असर भारत-अमेरिका के मजबूत होते द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ सकता है।
इस विवादित विधेयक को डेमोक्रेटिक सीनेटर रिचर्ड ब्लूमेंटथल और रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने अमेरिकी सीनेट में गुरुवार को पेश किया है, जिसे 60 से अधिक सांसदों का समर्थन प्राप्त है। इस प्रस्ताव के दायरे में भारत के अलावा चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अज़रबैजान को रखा गया है। यह बिल फिलहाल शुरुआती चरण में है और इसे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास मंजूरी के लिए भेजे जाने से पहले अमेरिकी सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (प्रतिनिधि सभा) दोनों से पारित होना अनिवार्य होगा।
इस प्रस्तावित कानून में अमेरिका की चुनिंदा नीतियों और दोहरे मापदंडों की साफ झलक दिखाई देती है। जहां एक ओर रूसी तेल खरीदने के लिए भारत जैसे देशों को निशाना बनाया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यूरोपीय संघ (EU) द्वारा रूस से किए जाने वाले लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) के आयात को इस प्रतिबंध से पूरी तरह छूट दी गई है। इतना ही नहीं, अमेरिका ने खुद के लिए भी रूसी यूरेनियम, मेडिकल आइसोटोप और अंतरिक्ष-परमाणु क्षेत्र में जारी द्विपक्षीय सहयोग को इस बिल के दायरे से बाहर रखा है।
भारतीय रणनीतिक हलकों में अमेरिका के इस पक्षपातपूर्ण रुख की तीखी आलोचना हो रही है। सूत्रों के मुताबिक, होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में जारी भारी भू-राजनीतिक तनाव के बीच रूसी तेल की आपूर्ति को जबरन रोकने की किसी भी कोशिश से वैश्विक बाजार में ईंधन का संकट गहरा सकता है, जिससे भारत सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। नई दिल्ली लगातार अपने इस फैसले का बचाव करती आई है कि देश की ऊर्जा सुरक्षा और घरेलू बाजार में कीमतों की स्थिरता बनाए रखने के लिए रूस से रियायती तेल खरीदना बेहद जरूरी है।
‘सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर’ के हालिया आंकड़ों के मुताबिक, भारत ने जून महीने में रूस से 4.5 बिलियन यूरो मूल्य के कच्चे तेल का आयात किया है। इसके साथ ही भारत, चीन के बाद रूसी तेल का दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बना हुआ है। ईरान युद्ध की शुरुआत के बाद से भारत द्वारा रूसी कच्चे तेल के आयात में अभूतपूर्व तेजी आई है, जो पिछले महीने की तुलना में 34 प्रतिशत बढ़कर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी।
यह पूरा राजनीतिक घटनाक्रम ऐसे नाजुक समय में सामने आया है जब भारत और अमेरिका एक बड़े द्विपक्षीय व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए लगातार बातचीत कर रहे हैं। यही वजह है कि मोदी सरकार ने अमेरिकी संसद में इस विधेयक के पेश होने को बेहद गंभीरता से लिया है। इससे पहले पिछले साल भी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत पर 25 प्रतिशत का टैरिफ लगाया था, लेकिन बाद में व्यापार वार्ता में प्रगति होने पर उस फैसले को वापस ले लिया गया था।
अमेरिका की यह आक्रामक व्यापारिक नीति सिर्फ भारत या एशिया तक सीमित नहीं है। हाल ही में वाशिंगटन ने दक्षिण अमेरिकी महाद्वीप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, ब्राजील पर भी 25 प्रतिशत का टैरिफ ठोक दिया है, जिससे दोनों देशों के संबंध काफी तल्ख हो गए हैं। हालांकि, अमेरिका ने अपने देश के भीतर घरेलू महंगाई को काबू में रखने के लिए ब्राजील के कुछ विशिष्ट सामानों को इस टैक्स से छूट भी दी है, जो उसकी आर्थिक प्राथमिकताओं और रणनीतिक सहूलियत को उजागर करता है।
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