भारत के 191 सदस्यीय राष्ट्रमंडल खेल (CWG) दल को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। टीम की सबसे कम उम्र की सदस्य और 16 वर्षीय पैरा-ट्रैक साइक्लिस्ट लीशा दास ने दल में किसी भी महिला कोच या सपोर्ट स्टाफ के न होने पर गहरी निराशा व्यक्त की है। उन्होंने विदेश यात्रा पर जा रही एक नाबालिग एथलीट की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताएं जाहिर करते हुए खेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिए हैं।
खेल अधिकारियों को भेजे गए अपने ईमेल में लीशा ने अपनी पीड़ा बयां की है। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि एक नाबालिग महिला पैरा-एथलीट होने के नाते उन्हें एक महिला एस्कॉर्ट और मेडिकल सपोर्ट पेशेवर की सख्त जरूरत है। लीशा ने बताया कि उन्होंने अपनी फिजियोथेरेपिस्ट आशा शेख के नाम वाला माता-पिता का सहमति पत्र भी सौंपा था। उनका मानना है कि उचित कोचिंग, चिकित्सा सहायता और एथलीट की सुरक्षा खेल संघों की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
माता-पिता और कोच की लगातार अपीलों के बावजूद यह अहम मुद्दा अब भी अनसुलझा है। लीशा का कहना है कि भारतीय साइकिलिंग महासंघ (CFI) और भारतीय पैरालंपिक समिति (PCI) इस गंभीर मामले में भी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी थोप रहे हैं। इस प्रशासनिक विफलता के कारण एक युवा एथलीट को मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, जिसके लिए वह या उनके माता-पिता बिल्कुल भी जिम्मेदार नहीं हैं।
खेल मंत्रालय ने 9 जुलाई को सीडब्ल्यूजी दल को मंजूरी दी थी, जिसमें 126 एथलीट, 51 अधिकारी और 14 सपोर्ट स्टाफ शामिल हैं। यह बेहद हैरानी की बात है कि साइकिलिंग और पैरा-साइकिलिंग को छोड़कर हर अन्य खेल के दल में कम से कम एक महिला कोच, फिजियोथेरेपिस्ट या मेडिकल स्टाफ जरूर मौजूद है। यह अनदेखी सीधे तौर पर भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) के सुरक्षा नियमों का खुला उल्लंघन है।
याद दिला दें कि चार साल पहले साइकिलिंग और सेलिंग में महिला एथलीटों ने अपने कोचों पर उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए थे। खेलों को सुरक्षित बनाने के लिए साई (SAI) ने 15 जून 2022 को एक सख्त आदेश जारी किया था। इसके तहत घरेलू या अंतरराष्ट्रीय दौरों पर महिला एथलीटों के साथ दल में एक महिला कोच का होना अनिवार्य किया गया था। साथ ही महिला एथलीटों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पुरुष और महिला अनुपालन अधिकारियों की नियुक्ति का भी स्पष्ट निर्देश दिया गया था।
इस प्रशासनिक लापरवाही के उलट भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) का हालिया रवैया एक बेहतरीन मिसाल पेश करता है। बीसीसीआई ने बाल सुरक्षा नियमों का पालन करते हुए 15 वर्षीय बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी के माता-पिता को उनके साथ आयरलैंड और इंग्लैंड दौरे पर जाने की अनुमति दी थी। खास बात यह है कि क्रिकेट बोर्ड ने इसका पूरा खर्च खुद उठाया था ताकि युवा खिलाड़ी बिना किसी तनाव के सीनियर टीम के माहौल में ढल सके।
वर्तमान में साइकिलिंग दल के साथ जाने वाले चार सदस्यीय सपोर्ट स्टाफ में सभी पुरुष हैं। इस स्टाफ में विदेशी कोच केविन रेने मिशेल सिरियू, फिजियोथेरेपिस्ट प्रह्लाद प्रियदर्शी, तकनीशियन राहुल नागप्पन असारी और पैरा-साइकिलिंग कोच दत्तात्रेय कटकम शामिल थे। हालांकि, एक हालिया घटनाक्रम में लीशा के पुराने कोच आदित्य जितेंद्र कुमार मेहता ने आधिकारिक दल में दत्तात्रेय की जगह ले ली है। दत्तात्रेय सीएफआई के पदाधिकारी हैं और मंत्रालय के नए निर्देशों के कारण वह सरकारी खर्च पर यात्रा नहीं कर सकते।
इन बदलावों के बावजूद लीशा दास की मुख्य मांगें अभी तक पूरी नहीं हुई हैं। उनकी विशेष रेसिंग साइकिल को तैयार करने और उसे मेंटेन रखने के लिए एक तकनीशियन, उनकी व्यक्तिगत फिजियोथेरेपिस्ट आशा को शामिल करने और सबसे बढ़कर एक महिला कोच या सपोर्ट स्टाफ की नियुक्ति का मुद्दा अब भी जस का तस बना हुआ है।
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