सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक बेहद अहम और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अब इन रिश्तों को भी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत कानूनी सुरक्षा के दायरे में ला दिया गया है। अदालत का स्पष्ट मानना है कि बदलते सामाजिक परिवेश के साथ कानूनों में भी समय-समय पर बदलाव होना चाहिए। इस फैसले का मुख्य उद्देश्य महिलाओं को घरेलू हिंसा और उत्पीड़न के गहरे साये से बचाना है। अब लिव-इन में रहने वाली महिलाओं के साथ होने वाली क्रूरता भी कानूनन दंडनीय अपराध मानी जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को अपने फैसले में स्पष्ट किया कि खासकर शहरी इलाकों में लिव-इन रिलेशनशिप अब एक जमीनी सच्चाई बन चुके हैं। ऐसे में जो लोग आपसी सहमति से इस तरह के रिश्ते चुनते हैं, उन्हें प्रताड़ना से बचाने के लिए कानून को खुद को ढालना होगा। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. के. सिंह की पीठ ने यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। इसके तहत अब लिव-इन को भी आईपीसी की धारा 498A या भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 के दायरे में रखा गया है। इसके अनुसार, यदि कोई पुरुष या उसके परिवार वाले महिला के साथ क्रूरता करते हैं, तो उन्हें तीन साल तक की जेल की सजा हो सकती है।
शीर्ष अदालत ने उस दलील को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि धारा 498A का इस्तेमाल केवल पारंपरिक रूप से विवाहित महिलाओं तक ही सीमित है। पीठ ने कहा कि इस कानूनी प्रावधान का मूल उद्देश्य समाज में महिलाओं के लिए समानता सुनिश्चित करना और पुरानी पुरुष वर्चस्ववादी सोच से बाहर निकलना है। हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि धारा 498A या बीएनएस की धारा 85 का लाभ केवल उन्हीं लिव-इन रिलेशनशिप को मिलेगा जो ‘शादी की प्रकृति’ (nature of marriage) वाले होंगे।
पीठ ने बहुत ही सख्त लहजे में टिप्पणी करते हुए कहा कि क्रूरता दरवाजे पर यह पूछकर दस्तक नहीं देती कि घर में रहने वाली महिला शादीशुदा है या नहीं। एक बार जब यह किसी के जीवन में प्रवेश करती है, तो इसके विनाश की क्षमता और भी भयंकर हो जाती है। फैसला लिखने वाले जस्टिस करोल ने कहा कि धारा 498A का मकसद महिला को शारीरिक या मानसिक चोट पहुंचाने वाले या उसे आत्महत्या के लिए उकसाने वाले उत्पीड़न को रोकना है। ऐसे में यह तर्क देना कि ऐसा उत्पीड़न केवल शादी के बाद ही हो सकता है, मामले का अति-सरलीकरण होगा।
इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने धारा 498A के बढ़ते कथित दुरुपयोग पर भी गहरी चिंता जाहिर की। अदालत ने माना कि आपसी हिसाब चुकता करने और अपनी भड़ास निकालने के लिए इस कानून के गलत इस्तेमाल का चलन बेहद चिंताजनक है। इसी वजह से अदालत ने यह स्पष्ट किया कि उनका यह फैसला सिर्फ ‘शादी की प्रकृति वाले रिश्तों’ पर ही लागू होगा। साथ ही, कानून का संरक्षण मांगने वाली महिला पार्टनर पर ही शुरुआत में यह साबित करने की जिम्मेदारी (बर्डन ऑफ प्रूफ) होगी कि उनका रिश्ता इस दायरे में आता है।
सुप्रीम कोर्ट ने समाज के तेजी से होते विकास का जिक्र करते हुए कहा कि शादी को हमेशा से एक पवित्र बंधन माना गया है, लेकिन अब यह अवधारणा भी बदल रही है। शादी से पहले साथ रहना अब हमारे समाज में कोई अनसुनी या अस्वीकार्य बात नहीं रह गई है। अदालत ने उदाहरण देते हुए कहा कि ठीक वैसे ही जैसे कभी समलैंगिक रिश्तों को अपराध और मानसिक बीमारी माना जाता था, लेकिन अब उन्हें अपराध की श्रेणी से बाहर कर स्वाभाविक मान लिया गया है।
अंत में पीठ ने कहा कि कोई भी व्यक्ति यह सोचकर किसी रिश्ते में नहीं जुड़ता कि उसके साथ क्रूरता होगी। शुरुआत में हर जोड़े की नीयत अच्छी होती है, लेकिन समय के साथ कुछ रिश्ते परेशानी भरे रास्ते पर चले जाते हैं, जिसके लिए कानून का होना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाहित और शादी की प्रकृति वाले लिव-इन रिलेशनशिप के बीच धारा 498A के तहत भेदभाव करना, घरेलू हिंसा रोकने के मूल उद्देश्य से भटकना है। अदालत के अनुसार, ऐसा कोई भी भेदभाव सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन है।
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