गुजरात सरकार ने राज्य में अनुसूचित जाति (एससी) समुदाय के लिए एक समर्पित आयोग के गठन की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस अहम कदम का मुख्य उद्देश्य एससी वर्ग की शिकायतों के निवारण के लिए एक मजबूत संस्थागत ढांचा तैयार करना है। इसके साथ ही, यह नया आयोग समुदाय के लिए बनाए गए सुरक्षा उपायों और कल्याणकारी योजनाओं को जमीनी स्तर पर सही तरीके से लागू करने की निगरानी भी करेगा।
सरकार के इस फैसले को राजनीतिक और सामाजिक दोनों ही नजरियों से काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसे सत्तारूढ़ भाजपा द्वारा अनुसूचित जाति वर्ग के बीच अपनी पैठ और मजबूत करने के एक बड़े प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। गौरतलब है कि गुजरात की कुल आबादी में इस समुदाय की हिस्सेदारी करीब 7 प्रतिशत है। इसके अलावा, राज्य की विधानसभा में 13 सीटें विशेष रूप से एससी उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं।
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग जल्द ही इस संबंध में एक व्यापक विचार-विमर्श की प्रक्रिया शुरू करेगा। इस बातचीत में एससी समुदाय के प्रतिनिधियों, विभिन्न सामाजिक संगठनों और संबंधित सरकारी विभागों के अधिकारियों को शामिल किया जाएगा। इन महत्वपूर्ण चर्चाओं के आधार पर ही प्रस्तावित आयोग की विस्तृत रूपरेखा, उसके कामकाज के तरीके और शक्तियों का निर्धारण किया जाएगा।
इस मुद्दे पर सामाजिक न्याय विभाग ने अपनी औपचारिक तैयारियां तेज कर दी हैं। वहीं, कानूनी विभाग भी इस बात की बारीकी से जांच कर रहा है कि क्या इस आयोग की स्थापना के लिए राज्य में कोई नया कानून बनाने की आवश्यकता होगी। सरकारी सूत्रों का कहना है कि सारी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद आने वाले कुछ ही हफ्तों में सरकार इसकी आधिकारिक घोषणा कर सकती है।
अधिकारियों का मानना है कि यह प्रस्तावित आयोग भेदभाव और अधिकारों के हनन से जुड़ी शिकायतों की गहन जांच करने में सक्षम होगा। यह आयोग अनुसूचित जातियों से जुड़े नीतिगत और विधायी मामलों में राज्य सरकार को अपनी जरूरी सिफारिशें भी दे सकेगा। ऐसी भी संभावना है कि शिकायतों की सुनवाई के दौरान इस आयोग को दीवानी अदालत (सिविल कोर्ट) जैसी शक्तियां प्रदान की जाएं, जैसा कि अन्य राज्यों के आयोगों के पास होती हैं।
मौजूदा समय में अनुसूचित जातियों के संरक्षण और उनके संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मामले मुख्य रूप से राष्ट्रीय स्तर पर सुलझाए जाते हैं। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 338 के तहत स्थापित एक संवैधानिक निकाय, ‘राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग’ (एनसीएससी) काम कर रहा है। पूरे देश में इस राष्ट्रीय आयोग के कई क्षेत्रीय कार्यालय मौजूद हैं, जिनमें 12 राज्य स्तरीय कार्यालय भी शामिल हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर व्यवस्था होने के बावजूद, राज्य में अपना एक अलग आयोग बनने से गुजरात के भीतर शिकायतों की सुनवाई के लिए एक अधिक स्थानीय और सुलभ तंत्र मिल सकेगा। यह राज्य में नीतियों के बेहतर क्रियान्वयन को सुनिश्चित करेगा। आपको बता दें कि देश के कुछ अन्य राज्यों में पहले से ही अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए ऐसे समर्पित आयोग काम कर रहे हैं। इन राज्यों में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, गोवा, पंजाब और तेलंगाना प्रमुख रूप से शामिल हैं।
हालांकि यह प्रस्ताव अभी अपने शुरुआती चरण में है, लेकिन जानकारों का कहना है कि यह नया आयोग कई महत्वपूर्ण मोर्चों पर काम करेगा। यह सरकारी नौकरियों में आरक्षण के नियमों के कड़ाई से पालन की निगरानी के लिए एक बड़ा मंच साबित होगा। इसके साथ ही, सामाजिक बहिष्कार, जातिगत भेदभाव और जमीन या संपत्ति के अधिकारों से जुड़े मामलों में न्याय दिलाने में भी यह आयोग एक निर्णायक भूमिका निभाएगा।
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