भारत के जनसांख्यिकीय लाभांश को लेकर एक बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। देश के लगभग 250 जिलों में 15 से 29 वर्ष की आयु के 25 प्रतिशत से अधिक युवा न तो कोई काम कर रहे हैं और न ही किसी तरह की पढ़ाई या व्यावसायिक ट्रेनिंग ले रहे हैं। यह स्थिति हमारे देश की मानव पूंजी के सही उपयोग में मौजूद एक बहुत बड़ी खामी को उजागर करती है।
सांख्यिकी मंत्रालय द्वारा शुक्रवार को जारी की गई 2025 की पहली जिला-स्तरीय आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) रिपोर्ट में ये गंभीर आंकड़े सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, उत्तर भारत में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के लगभग दो-तिहाई जिलों में एक चौथाई युवा आबादी ‘नीट’ (नॉट इन एम्प्लॉयमेंट, एजुकेशन या ट्रेनिंग – NEET) की श्रेणी में शामिल है।
अन्य क्षेत्रों के राज्य भी इस संकट से पूरी तरह अछूते नहीं हैं। आंध्र प्रदेश, ओडिशा, असम और तेलंगाना के लगभग आधे जिलों में भी 25 फीसदी युवा इसी श्रेणी में आते हैं। हाल ही में नीति आयोग की एक रिपोर्ट ने भी देश भर में ऐसे युवाओं की कुल संख्या करीब 9 करोड़ बताई थी। हालांकि, सरकार की तरफ से यह स्पष्ट किया गया था कि इन सभी लोगों को सीधे तौर पर ‘बेरोजगार’ करार देना पूरी तरह से सही नहीं होगा।
इस चिंताजनक रिपोर्ट के बीच कुछ जिलों से सकारात्मक खबरें भी मिली हैं। देश के करीब 25 जिले ऐसे हैं जहां ‘नीट’ श्रेणी वाले युवाओं की दर 10 प्रतिशत से भी नीचे है। इनमें छत्तीसगढ़ के कबीरधाम, राजनांदगांव और उत्तर बस्तर कांकेर, हिमाचल प्रदेश का चंबा, केरल का एर्नाकुलम और मध्य प्रदेश का मंडला शामिल है।
इस मामले में सबसे बेहतरीन आंकड़ा ओडिशा के नबरंगपुर का रहा, जहां यह दर सबसे कम, मात्र 4.1 प्रतिशत दर्ज की गई। मंत्रालय के इस व्यापक सर्वेक्षण में प्रमुख राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग 600 जिलों को कवर किया गया है।
आमतौर पर युवाओं में बेरोजगारी का आकलन उनकी पढ़ाई या किसी कौशल कार्यक्रम में भागीदारी से होता है। लेकिन ‘नीट’ श्रेणी विशेष रूप से उन युवाओं का प्रतिनिधित्व करती है जो पूरी तरह से श्रम बल से बाहर हो चुके हैं और किसी भी शैक्षणिक संस्थान से नहीं जुड़े हैं। इसके कई कारण हैं। इनमें उचित अवसर न मिलने के कारण नौकरी खोजना बंद कर देना, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करना या फिर अपनी मर्जी से खाली रहना शामिल है।
इस पूरे परिदृश्य का सबसे दुखद पहलू युवा महिलाओं से जुड़ा हुआ है। सर्वेक्षण में शामिल लगभग तीन-चौथाई जिलों में युवतियों के लिए यह दर 25 प्रतिशत से अधिक पाई गई है। यह आंकड़ा इस कड़वी सच्चाई को बयां करता है कि आज भी बिना वेतन वाले घरेलू कामकाज और तमाम तरह की सामाजिक अपेक्षाओं का सबसे भारी बोझ महिलाओं के कंधों पर ही है।
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