अगर आप पश्चिमी अहमदाबाद की सीमा में कोई कृषि भूमि खरीदने की योजना बना रहे हैं, तो अब आपको राजस्व विभाग के एक बेहद अहम नियम का पालन करना होगा। नए आदेश के तहत, किसान को पूरे गुजरात में मौजूद अपनी सभी कृषि संपत्तियों की पूरी जानकारी घोषित करनी होगी। जब तक यह ब्यौरा नहीं दिया जाएगा, तब तक खरीदी गई नई जमीन के सरकारी राजस्व रिकॉर्ड में खरीदार का नाम दर्ज नहीं किया जाएगा।
यह सख्त निर्देश 20 अगस्त को शहर के डिप्टी कलेक्टर और सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (पश्चिम) द्वारा जारी किए गए एक परिपत्र (सर्कुलर) के जरिए लागू किया गया है। इस आदेश के अनुसार, पश्चिमी डिप्टी कलेक्टर के अधिकार क्षेत्र में आने वाली तीन तहसीलों— घाटलोडिया, वेजलपुर और साबरमती के ई-धरा केंद्रों पर एक हलफनामा (शपथ पत्र) जमा करना अब अनिवार्य कर दिया गया है।
इस हलफनामे का मुख्य उद्देश्य यह पता लगाना है कि खरीदार के पास पूरे राज्य में कुल कितनी कृषि भूमि है। यदि जांच में यह सामने आता है कि किसान के पास मौजूद कुल जमीन ‘गुजरात कृषि भूमि सीलिंग अधिनियम, 1976’ के तहत तय की गई अधिकतम सीमा से अधिक है, तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई भी शुरू की जा सकती है।
परिपत्र में यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि कोई खरीदार यह शपथ पत्र प्रस्तुत नहीं करता है, तो राजस्व रिकॉर्ड में उसका नाम नहीं चढ़ाया जाएगा। इसका सीधा मतलब यह है कि जमीन के दाखिल-खारिज (म्यूटेशन) की प्रक्रिया को रोक दिया जाएगा।
दरअसल, राजस्व अधिकारियों ने पाया था कि कृषि से कृषि भूमि की बिक्री के मामलों में खरीदार अपनी पुरानी संपत्तियों की जानकारी दिए बिना ही म्यूटेशन की प्रक्रिया पूरी करवा रहे थे। इस तरह पुरानी संपत्तियों को छिपाने से सीलिंग कानून का मूल उद्देश्य ही विफल हो रहा था।
इस खामी को दूर करने के लिए अब सब-डिविजन के सभी मामलातदारों, ई-धरा के डिप्टी मामलातदारों और म्यूटेशन अधिकारियों को नए निर्देश दिए गए हैं। उन्हें आदेश दिया गया है कि वे जमीन खरीदने वाले हर किसान से यह लिखित हलफनामा लें कि उनके पास सीलिंग लिमिट से ज्यादा जमीन नहीं है। साथ ही, यदि राज्य के किसी अन्य गांव में उनकी कोई कृषि भूमि है, तो उसकी पूरी जानकारी शपथ के साथ देनी होगी।
इस नए कदम को लेकर कानूनी विशेषज्ञों ने समर्थन जताया है, लेकिन साथ ही कुछ चिंताएं भी जाहिर की हैं। अधिवक्ता दीपक पटेल ने बताया कि जब भी कोई किसान कृषि भूमि खरीदता है, तो सेल डीड (बिक्री विलेख) तैयार होती है और राज्य सरकार को भारी-भरकम स्टाम्प ड्यूटी तथा रजिस्ट्रेशन फीस चुकाई जाती है।
दीपक पटेल के अनुसार, फीस चुकाने के बाद यह खरीदार का हक है कि एक तय समय सीमा के भीतर उसका नाम राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हो। उन्होंने कहा कि यद्यपि यह प्रावधान कानून में पहले से मौजूद है, लेकिन इस नए परिपत्र के बाद एक ऐसी पुख्ता व्यवस्था बनाने की जरूरत है जिससे किसानों के काम न अटकें और म्यूटेशन की प्रक्रिया बिना किसी देरी के समय पर पूरी हो सके।
कुल मिलाकर प्रशासन का यह कदम उन मामलों पर पूरी तरह से नकेल कसने के लिए उठाया गया है, जहां लोग राज्य के अन्य हिस्सों में अपनी मौजूदा जमीन की जानकारी छिपाकर नई संपत्तियां जमा कर रहे थे।
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