देश में लगातार सामने आ रहे पेपर लीक के मामलों ने पूरी परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस बड़ी चुनौती से निपटने के लिए इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि ने एक बेहद प्रभावी समाधान सुझाया है। उनका मानना है कि प्रश्नों का एक विशाल बैंक तैयार किया जाना चाहिए, जिससे परीक्षा शुरू होने से ठीक पहले अंतिम पेपर जनरेट किया जा सके।
नीलेकणि के अनुसार, परीक्षा वाले दिन ही क्वेश्चन पेपर तैयार करने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद भी ली जा सकती है। हालांकि इस पूरी योजना को धरातल पर उतारने के लिए परीक्षा के पारंपरिक ‘पेन-पेपर’ मोड को पूरी तरह से खत्म करना होगा। इसकी जगह कंप्यूटर आधारित टेस्ट (CBT) प्रणाली को अपनाना अनिवार्य हो जाएगा।
केंद्र सरकार ने परीक्षा सुधारों को लेकर इसी साल जुलाई में छह सदस्यीय उच्चाधिकार प्राप्त टास्क फोर्स का गठन किया था। नंदन नीलेकणि इसी महत्वपूर्ण पैनल के अध्यक्ष हैं। परीक्षा व्यवस्था की कमियों को दूर करने के लिए बनाई गई यह समिति इसी महीने अपनी विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपने वाली है।
मंगलवार को ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम 2026 में बोलते हुए नीलेकणि ने इस मुद्दे पर बेबाक राय रखी। व्यवस्था की खामियों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि पहले से छपे हुए प्रश्न पत्र ही लीक का सबसे बड़ा कारण हैं। यह पूरी प्रक्रिया इसे बेचने वालों के लिए एक बड़ा आर्थिक लालच पैदा करती है। अगर ऐन मौके पर लाखों सवालों के बैंक से अचानक पेपर तैयार हो, तो इस आर्थिक प्रोत्साहन और लीक की गुंजाइश को पूरी तरह खत्म किया जा सकता है।
इस विशेष टास्क फोर्स का गठन एक बड़े बवाल के बाद हुआ था। नीट-यूजी (NEET-UG) 2026 पेपर लीक मामले को लेकर देश भर में छात्रों ने भारी विरोध प्रदर्शन किया था। इसके बाद तत्कालीन केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को 25 जुलाई को अपना इस्तीफा देना पड़ा था। ठीक अगले दिन यानी 26 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विशेष टास्क फोर्स के गठन की घोषणा कर दी थी।
समिति का मुख्य उद्देश्य संकट से घिरी नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) में तकनीकी और ढांचागत सुधार लाना है। नीलेकणि के अलावा इस टीम में कई दिग्गज विशेषज्ञ शामिल हैं। इनमें इसरो के पूर्व अध्यक्ष एस. सोमनाथ, आईबी के पूर्व निदेशक तपन डेका और आईआईटी चेन्नई के निदेशक वी. कामकोटि का नाम प्रमुख है। इनके साथ ही पूर्व शिक्षा सचिव अनीता करवल और लॉजिस्टिक्स विशेषज्ञ अमृत लाल मीणा भी इस टीम का अहम हिस्सा हैं। गठन के समय पैनल को रिपोर्ट सौंपने के लिए तीन महीने का वक्त दिया गया था।
पैनल फिलहाल सभी परीक्षाएं सीबीटी (CBT) मोड में कराने की व्यावहारिक संभावनाओं का अध्ययन कर रहा है। गौरतलब है कि नीट-यूजी 2026 की परीक्षा करीब 22 लाख छात्रों ने पेन-पेपर मोड में ही दी थी। नीलेकणि ने जोर देकर कहा कि सबको कंप्यूटर आधारित टेस्ट पर लाने के लिए परीक्षा केंद्रों के एक विशाल नेटवर्क की दरकार होगी। अभी देश में 1,50,000 ऐसे केंद्र मौजूद हैं, लेकिन इस संख्या को बड़े पैमाने पर बढ़ाना होगा।
परीक्षा केंद्रों की इसी कमी को दूर करने के लिए एनटीए ने अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) से मदद मांगी है। इसके जरिए सरकारी संस्थानों में मौजूद खाली जगहों और आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर की मैपिंग की जा रही है, ताकि वहां मानक टेस्टिंग सेंटर बनाए जा सकें। सरकार अब निजी संस्थानों को परीक्षा केंद्र बनाने के पक्ष में बिल्कुल नहीं है, क्योंकि कमजोर सुरक्षा व्यवस्था के कारण वहां पेपर लीक का खतरा ज्यादा रहता है।
नीलेकणि ने साफ किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समिति के सुझावों को जल्द से जल्द लागू करने के लिए बेहद उत्सुक हैं। जब उनसे पूछा गया कि क्या परीक्षा वाले दिन तुरंत पेपर बनाने के लिए एआई (AI) का इस्तेमाल मुमकिन है, तो उन्होंने पूरी सहमति जताई। उनका मानना है कि अगर हम समस्या की जड़ तक जाएं, तो तकनीक की मदद से हर चुनौती का पक्का समाधान निकाला जा सकता है।
यह टास्क फोर्स अपने काम को लेकर काफी सक्रिय है और अब तक इसके सदस्यों की 18 आधिकारिक बैठकें हो चुकी हैं। इसके अलावा 40 अन्य परामर्श बैठकें भी आयोजित की गई हैं। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान समिति को छात्रों, अभिभावकों और डॉक्टर्स एसोसिएशन से 50,000 से ज्यादा सुझाव मिले हैं। नेशनल रिक्रूटमेंट एजेंसी, कर्मचारी चयन आयोग और रेलवे भर्ती बोर्ड जैसी परीक्षा आयोजित करने वाली अहम संस्थाओं ने भी अपने सुझाव इस पैनल को सौंपे हैं।
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