गुजरात हाई कोर्ट ने शुक्रवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए आसाराम आश्रम ट्रस्ट की सभी आपत्तियों को खारिज कर दिया है। चीफ जस्टिस सुनीता अग्रवाल और जस्टिस डीएन राय की खंडपीठ के इस फैसले के बाद राज्य सरकार के लिए एक बड़ा रास्ता साफ हो गया है। अब सरकार अहमदाबाद के मोटेरा इलाके में मौजूद 45,000 वर्ग मीटर से अधिक की बेशकीमती जमीन को वापस अपने कब्जे में ले सकेगी।
गांधीनगर से जुड़े इस बहुचर्चित कानूनी विवाद का अंत अहमदाबाद के खेल भविष्य के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है। यह विवादित जमीन नरेंद्र मोदी स्टेडियम और सरदार पटेल स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स के ठीक बगल में स्थित है। यह भूखंड गुजरात की राष्ट्रमंडल खेल 2030 (कॉमनवेल्थ गेम्स) की तैयारियों और भविष्य के ओलंपिक लक्ष्यों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है।
इस मामले में पहले भी अदालत का कड़ा रुख देखने को मिला था। इसी साल फरवरी महीने में सिंगल-जज बेंच की जस्टिस वैभवी नानावटी ने अहमदाबाद कलेक्टर द्वारा की गई कार्रवाई को सही ठहराया था।
अदालत ने माना था कि शर्तों के उल्लंघन और अतिक्रमण हटाने को लेकर शुरू की गई कानूनी प्रक्रिया पूरी तरह से उचित है। राजस्व अधिकारियों और गुजरात राजस्व न्यायाधिकरण के सामने चली लंबी कानूनी लड़ाई के बाद यह अंतिम फैसला आया है।
यह पूरा विवाद मुख्य रूप से उस जमीन से जुड़ा है जिसे दशकों पहले सीमित धार्मिक उपयोग के लिए आवंटित किया गया था। हालांकि, समय के साथ राज्य के अधिकारियों ने जांच में पाया कि आश्रम ने तय सीमा से कहीं ज्यादा हिस्से पर अपना कब्जा जमा लिया है।
सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार, आश्रम को लगभग 33,980 वर्ग मीटर जमीन आवंटित की गई थी, लेकिन असल में उनका कब्जा करीब 50,000 वर्ग मीटर क्षेत्र तक फैल चुका था।
मामले की सुनवाई के दौरान सरकारी वकील जीएच विर्क ने अदालत को बताया कि जमीन वापस लेने की कार्यवाही एक सख्त प्रक्रिया के तहत की गई है। इस पूरी प्रक्रिया में कई नोटिस, जमीनी निरीक्षण और 20 से अधिक सुनवाई शामिल रही हैं। उन्होंने अदालत का ध्यान आश्रम के रवैये की ओर भी खींचा।
सरकारी वकील ने तर्क दिया कि अनधिकृत निर्माण को नियमित कराने के लिए आश्रम द्वारा कई आवेदन दिए गए थे। यह कदम खुद इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि उन्होंने बिना किसी कानूनी मंजूरी के ढांचे खड़े किए थे।
अदालत ने सरकार के इस तर्क को पूरी तरह से स्वीकार किया कि कोई भी व्यक्ति एक तरफ अपनी गलती से इनकार नहीं कर सकता और दूसरी तरफ उसी अवैध काम को नियमित करने की मांग भी नहीं कर सकता।
बेंच ने आश्रम की चुनौती को खारिज करते हुए बेहद कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि ट्रस्ट ने एक आदतन अपराधी की तरह काम किया है और बार-बार शर्तों का उल्लंघन करके सार्वजनिक संपत्ति पर अतिक्रमण किया है।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि इस मामले में अवैध निर्माण को नियमित करने का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। मामले के तथ्यों को देखते हुए याचिकाकर्ता को किसी भी तरह की कानूनी या मानवीय रियायत नहीं दी जा सकती।
सभी परिस्थितियों पर गौर करने के बाद अदालत ने पाया कि ट्रस्ट की कोई भी मांग विचार करने योग्य नहीं है और इसी आधार पर याचिकाओं को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया।
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