बंटवारे पर अलग हुए भाई 74 साल बाद करतारपुर में मिले

| Updated: January 13, 2022 4:53 pm

एक दूसरे से महज 220 किलोमीटर दूर रहने के बावजूद दो भाइयों को मिलने में 74 साल लग गए।

बंटवारे से अलग हुए सिद्दीकी, जो 80 के दशक में पहुंच चुके हैं और बोगरन, फैसलाबाद के गांव से हैं, ने बुधवार को बठिंडा में रहने वाले छोटे भाई हबीब उर्फ शेला को करतारपुर कॉरिडोर में गले लगाया।

हबीब अभी भी मुस्लिम हैं और भारतीय पंजाब के फुले वाला गांव में एक सिख किसान की हवेली में रह रहे हैं।

यूट्यूब पर पंजाबी लहर चैनल चलाने वाले नासिर ढिल्लों ने करतारपुर से बताया, “फुले वाला सिद्दीकी और हबीब का ननिहाल है।”

नरोवाल के पास कॉरिडोर गुरदासपुर के करीब पाकिस्तान और भारत के बीच अंतरराष्ट्रीय सीमा से 4.7 किलोमीटर दूर है। गुरु नानक ने अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष उसी स्थान पर बिताए, जिसका उद्घाटन नवंबर 2019 में दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों ने अपने-अपने पक्ष में किया था।

प्रवेश के प्वाइंट मार्च 2020 में कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए बंद कर दिया गया था, लेकिन नवंबर 2021 में गुरु नानक की 552 वीं जयंती के अवसर पर फिर से खोला गया।

सिख धर्म के सैकड़ों अनुयायी प्रतिदिन पवित्र स्थान पर पहुंचते हैं। भारतीय पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी और क्रिकेटर से राजनेता बने प्रसिद्ध नवजोत सिंह सिद्धू भी नानक देवजी की 552वीं जयंती पर गुरुद्वारा करतारपुर पहुंचे थे। तीर्थयात्रा के अलाव करतारपुर उन परिवारों के लिए मिलन स्थल बन गया है जो 1947 में पंजाब के खूनी विभाजन में अलग हो गए थे।

नासिर ने कहा, “हबीब सिद्दीकी से दो साल छोटे हैं और विभाजन के दौरान मां के साथ फुले वाला गए थे। उधर बठिंडा स्थित पैतृक गांव पर हिंसक हमलों के कारण सिद्दीकी और परिवार के अन्य सदस्यों को भागकर पाकिस्तान जाना पड़ा।”

उन्होंने कहा, “हम 2018 में बोगरान में विभाजन की एक कहानी रिकॉर्ड करने गए थे। वहां हम सिद्दीकी से मिले, जिन्होंने हमसे उनके छोटे भाई हबीब को खोजने का अनुरोध किया।”

नासिर ने कहा, सिद्दीकी को तब दृढ़ विश्वास था कि उनका भाई जीवित है और भारत में रहता है। हालांकि नासिर ने कहा, सिद्दीकी ने सात दशकों में हबीब की कोई खबर कभी नहीं सुनी थी।

“हमने उनका संदेश अपने चैनल (पंजाबी लहर) पर डाला और कुछ ही दिनों में फुले वाला के डॉ. जगसीर सिंह का संदेश प्राप्त हुआ। जगसीर ने उनसे कहा, “हबीब अभी भी जीवित है और फुले वाला के लोग उसके अलगाव की कहानी जानते थे।”

फिर सबसे पहले उन्होंने सोशल मीडिया पर वीडियो कॉल की व्यवस्था की थी, लेकिन रुबरू मुलाकात की व्यवस्था करने में उन्हें लगभग दो साल लग गए।

नासिर ने कहा, “आप समझ सकते हैं…74 साल… भावनाएं चरम पर थीं… हम सब रोए।” नासिर ने बताया कि हबीब के साथ उनके गांव के दोस्त और बुजुर्ग थे, जबकि सिद्दीकी भी अपने बेटों और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ करतारपुर पहुंच गए थे।

सोशल मीडिया पाकिस्तान और भारत में लाखों लोगों के बीच ऑनलाइन मुलाकातों का मंच बन चुका है। फ़ेसबुक पर सैकड़ों पेज और YouTube पर दर्जनों चैनल हैं, जो 1947 में हुए विभाजन और विभाजन से पहले की कहानियों को साझा करते हैं।

‘पंजाबी लहर’, ‘इक पिंड पंजाब दा’, ‘देसी इंफोटेनर’, ‘सांझा पंजाब 1947’, ‘इंडस डायरीज’, ‘सुब दा पंजाब’, ‘एक सी पंजाब’ और कई अन्य चैनल ऐसी भूमिका निभा रहे हैं।

करतारपुर में जमा हुए सिद्दीकी, हबीब, नासिर, लवली सिंह, डॉ. जगसिर सिंह और दर्जनों लोगों ने दोनों पक्षों की सरकारों से अपील की कि वे वीजा नीति को नरम करें और पाकिस्तान और भारत के लोगों को बिना किसी परेशानी के एक-दूसरे से मिलने दें।

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