गुजरात हाईकोर्ट ने एक संपत्ति विवाद मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। यह मामला अहमदाबाद का है, जहां जिला प्रशासन ने एक हिंदू परिवार द्वारा मुस्लिम व्यक्ति को संपत्ति बेचने पर ‘पूर्व अनुमति’ की मांग की है। हैरानी की बात यह है कि यह संपत्ति न तो अधिसूचित ‘अशांत क्षेत्र’ (Disturbed Area) में आती है और न ही इसके 500 मीटर के दायरे में स्थित है।
यह पूरा विवाद अहमदाबाद के दरियापुर-काजीपुर इलाके में स्थित 387 वर्ग फुट की एक व्यावसायिक संपत्ति से जुड़ा है। इस संपत्ति के मालिक भरत पांचाल और उनके भाई प्रफुल पांचाल हैं। वे इस जगह को सलीम मकवाना को 40 लाख रुपये में बेचना चाहते हैं।
पांचाल भाइयों ने साल 2007 में एक मुस्लिम व्यक्ति से ही यह संपत्ति खरीदी थी। उस समय उन्हें किसी भी तरह की पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं पड़ी थी, क्योंकि यह क्षेत्र किसी भी अधिसूचित अशांत क्षेत्र के अंतर्गत नहीं आता था।
हालांकि, साल 2023 में राज्य सरकार ने एक नई अधिसूचना जारी की। इसके तहत इस तरह के लेनदेन में शामिल पक्षों को राजस्व अधिकारी से एक प्रमाण पत्र प्रस्तुत करना अनिवार्य कर दिया गया। इस प्रमाण पत्र में यह पुष्टि होनी चाहिए कि संपत्ति ‘अशांत क्षेत्र अधिनियम’ के तहत अधिसूचित क्षेत्र के 500 मीटर के दायरे में नहीं आती है। इस कानून के तहत बफर जोन में भी बिना सरकारी अनुमति के संपत्ति लेनदेन पर रोक है।
इस नई अधिसूचना के बाद, दोनों पक्षों ने आवश्यक प्रमाण पत्र के लिए 2 जनवरी को असारवा के मामलातदार और कार्यकारी मजिस्ट्रेट के पास आवेदन किया। इसके जवाब में मामलातदार ने जूनियर राजस्व अधिकारी (तलाटी-सह-मंत्री) से एक रिपोर्ट मांगी।
तलाटी-सह-मंत्री ने 13 जनवरी को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसमें साफ तौर पर बताया गया कि संपत्ति प्रतिबंधित बफर जोन में नहीं आती है। लेकिन इसके साथ ही रिपोर्ट में यह भी जोड़ दिया गया कि चूंकि खरीदार और विक्रेता अलग-अलग समुदायों से हैं, इसलिए सिटी डिप्टी कलेक्टर (पूर्व) से अनुमति लेना आवश्यक है।
इसके बाद 20 जनवरी को मामलातदार ने भी इसी बात को दोहराया। उन्होंने प्रमाण पत्र देने से इनकार करते हुए कहा कि संपत्ति का लेनदेन अलग-अलग समुदायों के बीच हो रहा है, इसलिए वह अपनी तरफ से अनुमति नहीं दे सकते और इसी वजह से आवेदन को फाइल कर दिया गया।
प्रशासन की इस टिप्पणी को ‘अशांत क्षेत्र अधिनियम’ के तहत एक अनुचित प्रतिबंध मानते हुए, दोनों पक्षों ने अधिवक्ता आफताब अंसारी के माध्यम से हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने अपनी दलील में कहा कि तलाटी-सह-मंत्री की टिप्पणी तथ्यात्मक रूप से गलत, अधिकार क्षेत्र से बाहर और अधिनियम के प्रावधानों के बिल्कुल विपरीत है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की है कि मामलातदार की इस राय को रद्द किया जाए। उनका तर्क है कि मामलातदार का काम केवल यह जांचना था कि संपत्ति अधिसूचित क्षेत्र या उसके 500 मीटर के दायरे में आती है या नहीं। उन्होंने अदालत से यह भी अपील की कि वह संपत्ति पंजीकरण अधिकारियों को इस निराधार राय के आधार पर पंजीकरण में कोई बाधा उत्पन्न न करने का सख्त निर्देश दे।
इस मामले की प्रारंभिक सुनवाई के बाद, जस्टिस निशा ठाकोर ने सरकारी वकील से यह स्पष्ट करने को कहा कि ऐसा प्रमाण पत्र जारी करने के लिए वास्तव में सक्षम प्राधिकारी कौन है। हाईकोर्ट ने 2 अगस्त, 2023 को राज्य सरकार द्वारा जारी अधिसूचना का संज्ञान लेते हुए कहा कि अधिकारी खुद यह मान रहे हैं कि संपत्ति अशांत क्षेत्र के बफर जोन में नहीं है, फिर भी याचिकाकर्ताओं को सिटी डिप्टी कलेक्टर (पूर्व) से अनुमति लेने को कहा गया है।
अदालत ने अब राज्य सरकार को नोटिस जारी कर 16 अक्टूबर तक अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
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