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राजेश एक्सपोर्ट्स का महाघोटाला: 15 लाख करोड़ के फर्जी रेवेन्यू से लेकर केनरा बैंक की बड़ी डिफॉल्ट तक, गहराया रहस्य

| Updated: June 9, 2026 11:28

सेबी के 15 लाख करोड़ रुपये के फर्जी रेवेन्यू खुलासे के बाद, केनरा बैंक के 2,458 करोड़ के लोन डिफॉल्ट और LIC के निवेश ने राजेश एक्सपोर्ट्स (Rajesh Exports) को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

राजेश एक्सपोर्ट्स और इसके कर्ताधर्ता राजेश मेहता से जुड़ा विवाद हर बीतते दिन के साथ और गहराता जा रहा है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) द्वारा कंपनी पर 15 लाख करोड़ रुपये से अधिक का फर्जी रेवेन्यू दिखाने के सनसनीखेज खुलासे के बाद अब केनरा बैंक के बकाए का मामला भी चर्चा में आ गया है। यह विवादित कारोबारी पहले से ही केनरा बैंक का 2,458 करोड़ रुपये से अधिक का कर्जदार है।

रेटिंग एजेंसी ट्रांसयूनियन सिबिल को केनरा बैंक द्वारा सौंपे गए जनवरी 2026 के बड़े डिफॉल्टरों के आंकड़ों के विस्तृत विश्लेषण से पता चलता है कि राजेश एक्सपोर्ट्स पर कुल 2,458 करोड़ रुपये का कर्ज बकाया है। इस भारी-भरकम लोन राशि को बैंक के रिकॉर्ड में 409-409 करोड़ रुपये की छह अलग-अलग एंट्रीज में विभाजित किया गया है। बैंक इस बकाया रकम की वसूली के लिए चेन्नई स्थित ऋण वसूली न्यायाधिकरण (डीआरटी) में कानूनी कार्रवाई कर रहा है।

इस पूरे लोन मामले में कंपनी के तीन निदेशकों को व्यक्तिगत गारंटर के रूप में नामित किया गया है। इनमें खुद मुख्य प्रमोटर राजेश मेहता के साथ-साथ उनके बिजनेस पार्टनर प्रशांत मेहता और एस परमशिवन शामिल हैं। इन तीनों निदेशकों पर इस भारी कर्ज को चुकाने की व्यक्तिगत जिम्मेदारी है।

दूसरी तरफ, राजेश एक्सपोर्ट्स ने भी बैंक के खिलाफ डीआरटी में एक जवाबी मुकदमा दायर कर 20,456 करोड़ रुपये से अधिक के नुकसान का दावा किया था। हालांकि, न्यायाधिकरण ने साल 2023 में कंपनी के इस दावे को खारिज कर दिया क्योंकि कंपनी ने इसके समर्थन में फर्जी बिल पेश किए थे। वर्ष 2023 के इस अदालती आदेश में यह भी सामने आया था कि राजेश एक्सपोर्ट्स ने स्विट्जरलैंड स्थित अपनी सहायक गोल्ड रिफाइनरी कंपनी ‘वाल्कैम्बी एसए’ (Valcambi SA) के माध्यम से केनरा बैंक के फंड की हेराफेरी की थी।

इस पूरे मामले में केनरा बैंक की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। बैंक ने साल 2021 में 452 करोड़ रुपये का एक सिविल रिकवरी केस तो दायर किया था, लेकिन कंपनी द्वारा फर्जी बिल पेश करने और फंड की हेराफेरी के बावजूद अभी तक केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) या प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से शिकायत नहीं की है। यह बात बेहद हैरान करने वाली है कि इतने बड़े घोटाले के बाद भी बैंक ने केंद्रीय जांच एजेंसियों का रुख क्यों नहीं किया।

इसी बीच, सेबी के हालिया 109 पन्नों के विस्तृत आदेश ने एक और चौंकाने वाला पहलू सामने रखा है। इस आदेश के अनुसार, देश की सबसे बड़ी सरकारी बीमा कंपनी लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (एलआईसी) ने इस दागी कंपनी में 10.8 फीसदी शेयर हासिल किए हुए हैं। इस तरह की विवादित और संकटग्रस्त कंपनी में एलआईसी जैसे सरकारी संस्थान द्वारा इतना बड़ा निवेश किया जाना, बिना किसी मजबूत राजनीतिक संरक्षण के मुमकिन नहीं लगता।

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