गुजरात में ट्रांसजेंडर समुदाय को चाहिए अपना स्थान और सम्मान

| Updated: March 30, 2022 10:08 pm

राजकोट की 24 वर्षीय पायल आदिवासी ट्रांसवुमन हैं। कोविड की दूसरी लहर के दौरान उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। बाद में उन्हें पिछले साल 19 जुलाई को सूरत के न्यू सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

राजकोट की 24 वर्षीय पायल आदिवासी ट्रांसवुमन हैं। कोविड की दूसरी लहर के दौरान उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। बाद में उन्हें पिछले साल 19 जुलाई को सूरत के न्यू सिविल अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

खुद से सीखी वारली कलाकार और भरतनाट्यम डांसर पायल तब टूट जाती हैं, जब वह वाइब्स ऑफ इंडिया को अपनी दर्दनाक कहानी सुनाती हैं। वह याद करती हुई कहती हैं, “मैं कोविड-19 संकट के दौरान आर्थिक रूप से संघर्ष कर रही थी। मुझे सूरत के एक युवक के साथ जबरन सेक्स कराया गया। लेकिन मैं वहां पांच लड़कों को देखकर घबरा गई। उन सबने मेरे साथ घंटों बलात्कार किया।”

चिंताजनक यह है कि इस तरह की वह अकेली नहीं हैं। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन द्वारा लगभग 5,000 ट्रांसजेंडर लोगों के एक सर्वे के अनुसार, हर पांचवें ने कहा कि उन्होंने यौन हिंसा का अनुभव किया है।

पायल ने कहा, “मैं पांच दिनों तक अस्पताल में भर्ती थी। उसके बाद शिकायत दर्ज करने के लिए कोलवाड़ सूरत पुलिस स्टेशन से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने मेरी शिकायत दर्ज करने से इनकार कर दिया।”

वह इस बात पर अफसोस जताती हैं कि गुजरात में तीसरे लिंग की देवी बहुचाराजी का मंदिर हो सकता है, लेकिन ” जब भी हम जैसे ट्रांसजेंडरों के कल्याण की बात आती है, तो हमें इससे बाहर रखा जाता है।”

पुणे स्थित एलजीबीटीक्यू कार्यकर्ता दामिनी सिन्हा ने वीओआई को बताया कि भारत के बलात्कार कानून ट्रांसजेंडर लोगों के लिए न्याय पाना लगभग असंभव बना देते हैं, क्योंकि वे अपराधियों को पुरुषों और पीड़ितों को महिलाओं के रूप में परिभाषित करते हैं।

दामिनी कहती हैं, “एक ट्रांसवुमन के लिए सेक्स करना आसान नहीं है। उनके साथ दुर्व्यवहार और बलात्कार होने की आशंका बहुत अधिक रहती है। खासकर, अगर वे कम उम्र में हैं और मासूम हैं। अध्ययनों से पता चलता है कि लगभग 96% ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को नौकरी से वंचित कर दिया जाता है और उन्हें आजीविका के लिए कम भुगतान, खतरनाक या अशोभनीय काम करने के लिए मजबूर किया जाता है। जैसे सेक्स वर्क और भीख मांगना।”

दामिनी

गुजरात में ट्रांसजेंडर के सामने आने वाली चुनौतियों पर शोध करने वाली विद्वान आम्रपाली डेन ने वीओआई को बताया कि 18 फरवरी 2019 को गुजरात सरकार ने सामाजिक न्याय और आधिकारिता मंत्री की अध्यक्षता में एक ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड के गठन की घोषणा की थी। इसे एक प्रगतिशील उपाय बताया गया। लेकिन नवंबर 2019 तक बोर्ड में एक भी ट्रांसजेंडर सदस्य नहीं था। 16 सदस्यीय बोर्ड में छह ट्रांसजेंडर लोग, आठ नागरिक समाज के प्रतिनिधि और दो सरकारी अधिकारी शामिल हैं। बोर्ड की केवल दो बार बैठक हुई है। पहली बार तब, जब इसका गठन किया गया था और आखिरी बैठक सितंबर में हुई थी।

विशेष रूप से, 2021-22 के लिए कल्याण कोष में केवल 50 लाख रुपये आवंटित किए गए हैं, जबकि किसी वास्तविक मुद्दे को उठाया नहीं जा रहा है।

आकृति पटेल

एक ट्रांसजेंडर कार्यकर्ता और बोर्ड की सदस्य आकृति पटेल ने वीओआई को बताया, “कल्याण बोर्ड कुछ नहीं कर रहा है। लगभग बेकार है। हमने शिक्षा और पेंशन योजनाओं के उचित क्रियान्वयन के साथ-साथ ट्रांसजेंडर पहचान पत्र और जनगणना कराने का सुझाव दिया। सितंबर में पिछली बैठक महज एक औपचारिकता थी। हमने जो मुद्दे उठाए थे, उनके लिए किसी ने कुछ नहीं किया। समुदाय के सदस्यों ने उन सदस्यों के रिज्यूमे भी जमा किए थे, जिन्हें बोर्ड के लिए चुना जा सकता था। लेकिन हमें कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।”

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा जारी की गई वार्षिक क्राइम इन इंडिया रिपोर्ट ने केवल 2016 में ट्रांसजेंडर व्यक्तियों पर डेटा एकत्र करना शुरू किया। हालांकि, रिपोर्ट वास्तव में अपराधों की भयावहता का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती है, क्योंकि इसमें केवल पुलिस और अन्य एजेंसियों को रिपोर्ट किए गए अपराध शामिल हैं।

पायल एक दशक से भेदभाव और उत्पीड़न की शिकार हैं। चाहे वह उत्पीड़न घर में, स्कूल में, काम पर या सड़कों पर हुआ हो। उन्होंने कहा कि उनका उत्पीड़न गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के सुरेंद्रनगर स्थित घर में तब शुरू हुआ, जब वह लगभग 13 साल की थीं। तब उनका नाम मेहुल था।

उन्होंने कहा, “जब मैं सातवीं कक्षा में थी, तब मुझे लगने लगा था कि मैं लड़की की तरह तैयार होना चाहती हूं। मैंने कारण नहीं बताया। जब भी मेरे माता, पिता और बहन घर पर नहीं होते, मैं अपनी बहन की पोशाक पहनती और खुद को आईने में देखती रहती। एक दिन मैंने मां से कहा कि मैं साड़ी पहनकर लड़की की तरह रहना चाहती हूं। फिर मेरे माता-पिता ने मुझे पीटा। मुझे बहुत रोना आया। माता-पिता मुझे कई पूजा-पाठ करने वालों, तांत्रिकों के अलावा और एक मस्जिद में भी ले गए, ताकि मुझे बुरे विचारों के लिए मजबूर करने वाले भूत से छुटकारा मिल सके। उन्हें लगा कि मैं काले जादू की शिकार हूं। पिता ने मुझे ठीक करने के लिए एक मुर्गी की भी बलि दी। माता-पिता यह नहीं समझ पाए कि मैं शारीरिक रूप से भले पुरुष था, लेकिन मैं महिला बनना चाहती थी। वे यह नहीं सुनेंगे कि मैं एक ट्रांसजेंडर थी।”

इस तरह के व्यवहार को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) द्वारा दर्ज किया गया है। इसमें कहा गया है कि ट्रांसजेंडर बच्चों के मामले में माता-पिता सक्रिय भूमिका नहीं निभाते हैं। इसके बजाय बच्चे माता-पिता, भाई-बहन और रिश्तेदारों से मौखिक और शारीरिक शोषण का शिकार होते हैं।

अगली लड़ाई शिक्षा प्राप्त करने की है। फिर कुछ सम्मान के साथ जीने के लिए काम खोजने की है। जब पायल ने 16 साल की उम्र में घर छोड़ा, तो उन्होंने 12वीं तक पढ़ाई की थी। वह कहती हैं, “कोविड लॉकडाउन के दौरान भी मैं सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा का अध्ययन करने में सफल रही। मैं इसे पूरा करना चाहती हूं।”

भारत में कई ट्रांसजेंडर व्यक्ति शैक्षणिक संस्थानों में प्रतिकूल माहौल के कारण पढ़ाई छोड़ देते हैं। 2011 की जनगणना ने ट्रांसजेंडर लोगों में 56% की साक्षरता दर दिखाई, जो राष्ट्रीय औसत 74% से काफी कम है। अहमदाबाद, मुंबई और चेन्नई में ट्रांसवुमन के यूएनडीपी के सामाजिक-आर्थिक मूल्यांकन अध्ययन से पता चला है कि सर्वेक्षण में शामिल लोगों में से केवल 14% ने ही 12 वीं तक पढ़ा था।

ऐसा नहीं है कि उनके लिए कोई कानूनी संवैधानिक और नीतिगत प्रावधान नहीं हैं। वह कहती हैं कि ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) 2019 अधिनियम के तहत स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल विकास, आवास और अन्य में उनके कल्याण के लिए प्रावधान किए गए हैं।

दृढ़ निश्चयी पायल कहती हैं, “मैं अब पीड़ित नहीं हूं, मैं एक उत्तरजीवी हूं। मुझे पता है कि सिस्टम कैसे काम करता है और मेरे जैसे कई लोगों की मदद करता है। मैं अब इस संघर्ष में सबसे आगे हूं।”

वह कहती हैं, “लेकिन गुजरात में चारों ओर देखो। हमें स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा, आवास, नौकरी और आजीविका आदि के लिए चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। दैनिक जीवन में कलंक, भेदभाव और हिंसा उन्हें हाशिये पर ले जाती है। वे सार्वजनिक प्रवचनों, सामाजिक आंदोलनों, मुख्यधारा के मीडिया से दूर रहती हैं, जो अक्सर उनके संघर्षों को नजरअंदाज कर देती हैं।” यूएनडीपी की एक रिपोर्ट में भी उनके बहिष्कार की बात है।

बेघर

हेमा (बदला हुआ नाम)

हेमा (बदला हुआ नाम) एक 30 वर्षीय ट्रांसवुमन हैं। वह  अहमदाबाद के वस्तरपुर इलाके की एक झुग्गी बस्ती के एक कमरे में रहती हैं, जहां कोई जानवर भी नहीं रह सकता। हेमा वीओआई से कहती हैं, “मुझे हर महीने 2,000 रुपये किराए के रूप में देने होंगे। चिलचिलाती गर्मी हो या सर्द सर्दियां, मुझे यहीं रहना है। हालांकि मैं समय पर किराए का भुगतान कर देती हूं, लेकिन मुझे कोई अच्छी जगह नहीं मिल रही है। अगर अपना परिवार ही हमें स्वीकार नहीं करेगा, तो और कौन करेगा?” वह अपना जीवन खुद चलाती हैं। अपनी ट्रांसजेंडर की पहचान छुपाकर बर्तन धोती हैं और एक रेस्तरां में सफाई करती हैं, जिसके लिए उन्हें दो वक्त का भोजन और 70 रुपये प्रतिदिन मिलते हैं। उन्होंने कहा, “कई लोगों को यौन कार्य करने के लिए मजबूर किया जाता है, यह गुजरात में एकमात्र मौजूदा गैर-ट्रांसफोबिक कार्यस्थल है।”

2018 में एनएचआरसी द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, 96 प्रतिशत ट्रांसजेंडरों को नौकरी से वंचित कर दिया जाता है और उन्हें कम वेतन वाला काम लेने के लिए मजबूर किया जाता है।

मनोवैज्ञानिक परेशानी

जीशा (बदला हुआ नाम) एक 20 वर्षीय ट्रांसवुमन हैं। वह  पूछती हैं, “हर कोई हमारे साथ अवमानना का व्यवहार क्यों करता है? सिर्फ इसलिए कि हम ट्रांसजेंडर हैं, क्या इसका मतलब यह है कि हमारी कोई इज्जत नहीं है?”

एक समलैंगिक साइकोलॉजिस्ट आकाश ने वाइब्स ऑफ इंडिया को बताया, “गुजरात में ट्रांस कम्युनिटी महामारी से सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। लगातार दुर्व्यवहार और स्वीकृति की कमी के कारण कई लोगों में आत्मघाती विचार विकसित हो रहे हैं। कोविड-19 संकट ने स्थिति को और खराब कर दिया है।”

इसके अलावा, ट्रांस समुदाय कोविड का विशेष शिकार है। कई कारणों से उनमें प्रतिरक्षा शक्ति कम हो रही है। इनमें सेक्स-रीअसाइनमेंट सर्जरी, एचआईवी और हार्मोन का सेवन शामिल है। इस तरह उनकी कहानी भी पायल और हेमा जैसी ही है। जीशा कहती हैं, “मैं संघर्ष कर रही हूं, मैं जल्द ही मर भी सकती हूं।”

ट्रांस व्यक्तियों में कुल भारतीय आबादी का 0.04% है, लगभग 4.9 लाख। उनमें से केवल 30,000 ही चुनाव आयोग के साथ पंजीकृत हैं। उन्हें स्थायी आजीविका के समान अवसरों से वंचित करने से आर्थिक रूप से प्रभाव पड़ता है। 2016 की विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि होमोफोबिया (और विस्तार से, पूरे एलजीबीटीक्यूआईए + समुदाय) के प्रति भय के कारण सकल घरेलू उत्पाद में भारत का नुकसान 32 बिलियन अमेरिकी डॉलर या सकल घरेलू उत्पाद का 1.7% है।

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