दक्षिणपंथी विचारधारा के प्रणेता विनायक दामोदर सावरकर ने अपनी सजा कम करवाने के लिए तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के समक्ष 10 बार दया याचिकाएं दायर की थीं। यह अहम खुलासा उनके पोते सत्यकी सावरकर ने सोमवार, 15 जून को पुणे की एक विशेष सांसद/विधायक (MP/MLA) अदालत में किया।
उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि उस दौर में कई अन्य स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी ऐसे भी थे, जिन्होंने अंग्रेजों के सामने दया की गुहार लगाने से साफ इनकार कर दिया था।
सत्यकी ने यह बयान विशेष न्यायाधीश अमोल शिंदे के समक्ष जिरह के दौरान दिया। यह अदालत फिलहाल कांग्रेस नेता राहुल गांधी के खिलाफ दायर उस आपराधिक मानहानि मामले की सुनवाई कर रही है, जिसमें सत्यकी ने उन पर लंदन में दिए गए एक भाषण के जरिए अपने दादा की छवि धूमिल करने का आरोप लगाया है।
इस मामले की सुनवाई में राहुल गांधी के वकील मिलिंद पवार सत्यकी से जिरह कर रहे हैं। सोमवार को अपनी गवाही में सत्यकी ने स्पष्ट किया कि अंडमान भेजे जाने से पहले ही गदर संगठन द्वारा संचालित एक पत्रिका में उनके दादा को ‘वीर’ की उपाधि दी गई थी।
सत्यकी ने अदालत में स्वीकार किया कि यह सच है कि सावरकर ने दस बार दया याचिका दायर की थी। उन्होंने कहा कि याचिकाएं दायर करते समय भी उन्हें ‘वीर’ ही कहा जाता था और दस बार दया मांगने वाले व्यक्ति को ‘वीर’ कहना किसी भी तरह का विरोधाभास नहीं है।
गवाही के दौरान उन्होंने यह भी माना कि उसी दौर के महान क्रांतिकारी जैसे राजगुरु, बटुकेश्वर दत्त और अशफाकुल्ला खान ने कोई दया याचिका दाखिल नहीं की थी। सत्यकी ने बताया कि सावरकर ने सजा सुनाए जाने के पहले महीने के भीतर ही अपनी पहली दया याचिका दे दी थी।
सत्यकी ने अदालत को बताया कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी कि भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने ब्रिटिश सरकार से उन्हें युद्धबंदी मानने की मांग की थी और किसी भी तरह की रियायत लेने से इनकार कर दिया था। हालांकि, उन्होंने माना कि ये दोनों क्रांतिकारी अंत तक अपनी विचारधारा और सिद्धांतों पर अडिग रहे और अंग्रेजों के साथ व्यवहार में अपने उसूलों से कभी समझौता नहीं किया।
सावरकर की याचिकाओं पर बात करते हुए सत्यकी ने बताया कि इन 10 दया याचिकाओं से जुड़े दस्तावेज आज भी आधिकारिक सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद हैं। हालांकि, उनका दावा है कि सावरकर द्वारा दायर इन याचिकाओं की भाषा से ब्रिटिश शासन के प्रति उनकी ‘वफादारी’ नहीं झलकती थी।
गवाही के मुताबिक, जेल प्रशासन इन याचिकाओं को मंजूरी के लिए ब्रिटिश सरकार के पास भेजता था। सत्यकी ने माना कि सजा को कम करने या बदलने का पूरा अधिकार ब्रिटिश सरकार की नीतियों और प्रक्रियाओं पर निर्भर था।
उन्होंने आगे बताया कि ब्रिटिश सरकार ने सावरकर की सभी दया याचिकाओं को खारिज कर दिया था। अंग्रेजों ने अपने जवाब में यह आशंका जताई थी कि अगर सावरकर को रिहा किया गया, तो वे फिर से क्रांतिकारी आंदोलन का हिस्सा बन जाएंगे जिससे ब्रिटिश शासन के खत्म होने का खतरा पैदा हो सकता है।
शिकायतकर्ता सत्यकी का कहना है कि सजा कम कराने के लिए दया याचिका लगाना उस समय ब्रिटिश सरकार के तहत एक सामान्य आधिकारिक प्रक्रिया थी। उन्होंने कहा कि सिर्फ सावरकर ही नहीं, बल्कि अन्य कैदी भी ऐसी याचिकाएं दायर करते थे और यह कोई गैर-कानूनी या असामान्य कदम नहीं था।
उन्होंने इस बात का खंडन किया कि दया याचिका में इस्तेमाल की गई भाषा में किसी तरह की विनम्रता या अंग्रेजों के प्रति वफादारी के शब्द थे। हालांकि, उन्होंने अदालत में यह जरूर माना कि उस याचिका में सावरकर ने अपनी सजा कम करने का स्पष्ट अनुरोध किया था।
सत्यकी के अनुसार, सावरकर द्वारा याचिकाओं में इस्तेमाल की गई भाषा केवल आधिकारिक प्रोटोकॉल का हिस्सा थी। उनका मानना था कि क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के अन्याय के कारण हथियार उठाए थे। उन्होंने सावरकर के विचार को भी सामने रखा कि अगर अंग्रेजों ने पहले ही सुधार लागू कर दिए होते, तो क्रांतिकारियों को हथियारों का सहारा नहीं लेना पड़ता।
अदालत ने सावरकर की एक दया याचिका के कुछ अंश भी रिकॉर्ड किए हैं। इसमें लिखा गया है कि उनके साथ अंडमान जेल भेजे गए अन्य लोगों को तो रिहा कर दिया गया, लेकिन उन्हें नहीं छोड़ा गया। इसके बजाय, उन्हें ‘क्लास डी’ कैदी के रूप में वर्गीकृत करके कठोर सजाएं दी गईं।
सत्यकी ने कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि सावरकर हर याचिका के अंत में ‘मैं आपका सबसे आज्ञाकारी सेवक बने रहने की प्रार्थना करता हूं, वी.डी. सावरकर’ लिखकर हस्ताक्षर करते थे। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनके पास सावरकर और अन्य कैदियों की याचिकाओं की विषय-वस्तु का तुलनात्मक अध्ययन करने वाली कोई विशेषज्ञ रिपोर्ट मौजूद नहीं है।
सत्यकी ने यह भी गवाही दी कि किसी भी कैदी पर दया याचिका दायर करने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं थी और यह पूरी तरह से संबंधित कैदी की मर्जी पर निर्भर करता था। उन्होंने माना कि क्रांतिकारियों ने बहुत कष्ट सहे, लेकिन वे यह नहीं जानते कि उनमें से किन विशिष्ट कैदियों ने दया याचिकाएं लगाई थीं। इस मामले में सत्यकी की जिरह अब 1 जुलाई को जारी रहेगी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मानहानि की शिकायत मुख्य रूप से इस आधार पर दर्ज की गई है कि राहुल गांधी ने पिछले कुछ वर्षों में कई बार विभिन्न मौकों पर सावरकर को कथित तौर पर बदनाम किया है। इसमें 5 मार्च 2023 की उस घटना का विशेष रूप से जिक्र किया गया है, जब गांधी ने यूनाइटेड किंगडम में ओवरसीज कांग्रेस को संबोधित किया था।
शिकायतकर्ता सत्यकी सावरकर का आरोप है कि राहुल गांधी ने जानबूझकर सावरकर पर झूठे और मनगढ़ंत आरोप लगाए। उनका उद्देश्य सावरकर की प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाना और उनके परिवार को मानसिक पीड़ा देना था।
सत्यकी का कहना है कि भले ही वह मानहानिकारक भाषण इंग्लैंड में दिया गया था, लेकिन इसके प्रकाशित और पूरे भारत में प्रसारित होने के कारण इसका व्यापक प्रभाव पुणे में भी महसूस किया गया।
सबूत के तौर पर सत्यकी ने अपनी शिकायत के साथ कई समाचार रिपोर्ट और लंदन में दिए गए गांधी के भाषण का एक यूट्यूब लिंक भी प्रस्तुत किया है। उनका दावा है कि गांधी ने सावरकर पर झूठा आरोप लगाया कि उन्होंने एक किताब में किसी मुस्लिम व्यक्ति को पीटने का जिक्र किया है, जबकि सावरकर ने कभी ऐसी कोई किताब नहीं लिखी।
सत्यकी ने अपनी याचिका में कड़ा तर्क दिया है कि गांधी ने ये बेबुनियाद आरोप सावरकर की छवि खराब करने के दुर्भावनापूर्ण उद्देश्य से लगाए थे। इसके चलते उन्होंने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 500 (मानहानि के लिए सजा) के तहत राहुल गांधी के लिए अधिकतम सजा और आपराधिक दंड संहिता (CrPC) की धारा 357 के तहत अधिकतम मुआवजे की मांग की है।
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