दिल्ली, लंदन या टोक्यो के किसी भी सुपरमार्केट में जाएं और किसी भी ग्लोबल ब्रांड का कोई पैक्ड उत्पाद उठाएं, जैसे कि चॉकलेट बार, कोल्ड ड्रिंक या ब्रेकफास्ट सीरियल। इनकी पैकेजिंग और ब्रांडिंग बिल्कुल एक जैसी दिखती है और स्वाद व सुविधा का दावा भी हर जगह समान होता है। लेकिन लेबल को ध्यान से पढ़ने पर एक अलग ही सच्चाई सामने आती है। आप पाएंगे कि किसी देश में चीनी की मात्रा अधिक है, तो किसी में फैट का कंपोजिशन अलग है। अलग-अलग बाजारों में एडिटिव्स और प्रिजर्वेटिव्स के इस्तेमाल में भी अंतर होता है। उच्च आय वाले देशों की तुलना में भारत में बिकने वाले उत्पादों में पाम ऑयल या हाई-इंटेंसिटी वाले स्वीटनर जैसी सस्ती चीजों का अधिक इस्तेमाल किया जाता है।
यह अंतर सिर्फ ग्राहकों की पसंद का मामला नहीं है। यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या वैश्वीकरण ने सचमुच एक समान खाद्य प्रणाली बनाई है? या फिर असमान नियमों, क्रय शक्ति और पोषण से जुड़े परिणामों के आधार पर भोजन की गुणवत्ता को देशों के बीच चुपचाप बांट दिया गया है।
भारत में खाद्य सुरक्षा का जिम्मा मुख्य रूप से भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के पास है। इसका काम यह सुनिश्चित करना है कि भारत में बिकने वाला खाना सुरक्षित हो, उसकी लेबलिंग सही हो और वह तय मानकों पर खरा उतरे। FSSAI ने मिलावट, गंदगी और साफ-सफाई से जुड़ी पुरानी चिंताओं को दूर करने में अहम भूमिका निभाई है। हालांकि, अब भारत का फूड सिस्टम एक बिल्कुल अलग चुनौती का सामना कर रहा है, जो सिर्फ सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि लंबे समय तक डाइट से जुड़े जोखिमों के दायरे में आता है।
सुरक्षा और गुणवत्ता
इस बदलाव को समझने का एक आसान तरीका खाद्य पदार्थों का ‘नोवा’ (NOVA) वर्गीकरण है, जो औद्योगिक प्रोसेसिंग की सीमा और उद्देश्य के आधार पर डाइट को बांटता है। इसके तहत अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स (UPF) केवल प्राकृतिक खाद्य पदार्थों का बदला हुआ रूप नहीं हैं। ये सुविधा, लंबे समय तक खराब न होने और बेहतरीन स्वाद के लिए तैयार किए गए औद्योगिक उत्पाद हैं। इनमें पैक्ड स्नैक्स, मीठे पेय पदार्थ, इंस्टेंट नूडल्स और कई रेडी-टू-ईट उत्पाद शामिल हैं, जो अब भारतीय घरों में आम हो चुके हैं। भारत में अब पोषण से जुड़ी मुख्य चिंता केवल कैलोरी या भोजन की उपलब्धता नहीं है, बल्कि रोजमर्रा की डाइट में इन अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स की बढ़ती हिस्सेदारी है।
यहीं से खाद्य सुरक्षा और भोजन की गुणवत्ता के बीच एक गहरी खाई पैदा होती है। एक उत्पाद मौजूदा नियमों का पूरी तरह से पालन करते हुए भी अल्ट्रा-प्रोसेस्ड श्रेणी में आ सकता है, जिसका मोटापा, टाइप 2 डायबिटीज और अन्य मेटाबोलिक बीमारियों के साथ सीधा संबंध है। सरल शब्दों में कहें तो मौजूदा सिस्टम यह सुनिश्चित कर सकता है कि खाना कम समय के लिए सुरक्षित है, लेकिन यह इसके दीर्घकालिक पोषण संबंधी नुकसानों पर मौन रहता है।
शहरी और ग्रामीण भारत में पैक्ड फूड्स के तेजी से बढ़ते चलन को देखकर यह अंतर और भी साफ हो जाता है। चीनी वाले पेय पदार्थ, पैक्ड स्नैक्स और इंस्टेंट फूड्स अब हर आय वर्ग के लोग खा-पी रहे हैं। सस्ते दाम, सुविधा, आक्रामक मार्केटिंग और छोटे बाजारों तक गहरी पहुंच के कारण लोग इन्हें पसंद करते हैं। लेकिन इनमें चीनी, रिफाइंड फैट और सोडियम की मात्रा बहुत अधिक होती है, जो मेटाबोलिक बीमारियों को बढ़ा रही है। आज भारत कुपोषण की दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ एनीमिया और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी है, तो दूसरी तरफ मोटापा और डायबिटीज तेजी से बढ़ रहे हैं। हालांकि, हमारा रेगुलेटरी सिस्टम अभी भी इन्हें खाद्य प्रणाली के बदलाव के रूप में देखने के बजाय अलग-अलग समस्याओं के तौर पर देखता है।
वैश्विक स्तर पर तुलना करने पर यह स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। कई उच्च आय वाले देशों में सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों का फोकस अब केवल खाद्य सुरक्षा पर नहीं, बल्कि भोजन की पोषण गुणवत्ता पर भी है। शुगर टैक्स, पैकेट के सामने चेतावनी वाले लेबल (फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग) और बच्चों को टारगेट करने वाली मार्केटिंग पर प्रतिबंध जैसी नीतियों ने कंपनियों को अपने उत्पाद सुधारने पर मजबूर किया है। इस मामले में चिली को एक पथप्रदर्शक माना जाता है। इसके विपरीत, भारत में लेबलिंग के नियम तो हैं, लेकिन लोगों में जागरूकता की कमी और लेबल के मुश्किल होने के कारण इनका ज्यादा असर नहीं दिखता। नतीजतन, उत्पाद खरीदते समय पोषण से जुड़े खतरे ग्राहकों की नजरों से छिपे रह जाते हैं।
एक जैसा ब्रांड, लेकिन खाना अलग
यहां उपभोक्ता के व्यवहार और जानकारी के अभाव की भूमिका सामने आती है। लोग क्या खाते हैं, इसे अक्सर उनकी निजी जिम्मेदारी मान लिया जाता है, लेकिन असल में यह इस बात पर निर्भर करता है कि ग्राहक को कितनी जानकारी है। पैक्ड फूड पर लगे पोषण संबंधी लेबल अक्सर बहुत तकनीकी होते हैं, जिनमें सर्विंग साइज, दैनिक मूल्य का प्रतिशत और सामग्री की सूची को समझना हर किसी के लिए आसान नहीं होता। ऐसे में लोग पोषण से ज्यादा कीमत, स्वाद, ब्रांड पर भरोसे और विज्ञापन के आधार पर सामान खरीदते हैं। जहां पोषण संबंधी साक्षरता कम है, वहां सेहतमंद विकल्प चुनने के लिए उपभोक्ताओं को सही दिशा दिखाने वाला ढांचा बेहद कमजोर है।
इसी समय, नेस्ले (Nestlé) और पेप्सीको (PepsiCo) जैसी ग्लोबल फूड कंपनियां अलग-अलग नियमों और आर्थिक माहौल वाले देशों में काम करती हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि किसी भी उत्पाद को बनाने का तरीका ग्लोबल ब्रांड रणनीति और स्थानीय दबावों के आधार पर तय होता है, जिसमें टैक्स, नियम और कीमतों को लेकर ग्राहकों की संवेदनशीलता शामिल है। जहां नियम सख्त होते हैं, जैसे शुगर टैक्स या पैकेट पर स्पष्ट चेतावनी, वहां कंपनियां अपने उत्पादों में तेजी से सुधार करती हैं। जहां ऐसे नियम कमजोर हैं या अभी बन रहे हैं, वहां पोषण में सुधार बहुत धीमी गति से होता है।
पेप्सी का उदाहरण इसे बिल्कुल साफ कर देता है। संयुक्त राज्य अमेरिका में पेप्सी को मीठा करने के लिए मुख्य रूप से हाई-फ्रुक्टोज कॉर्न सिरप का इस्तेमाल होता है। वहीं, कई यूरोपीय बाजारों और यूके में शुगर टैक्स और नियमों के दबाव में कंपनी ने चीनी की मात्रा कम की है और सुक्रालोज (sucralose) तथा एसेसल्फेम-के (acesulfame-K) जैसे कृत्रिम स्वीटनर का इस्तेमाल शुरू किया है। भारत में पेप्सी अभी भी चीनी आधारित मिठास पर अधिक निर्भर है, जो यहां के अलग बाजार और नियमों को दर्शाता है। इसी तरह, मेक्सिको में शुगर टैक्स और पैकेट पर सख्त चेतावनी वाले नियमों के कारण पेप्सी को अपने उत्पादों में चीनी कम करनी पड़ी। इससे पता चलता है कि एक ही ग्लोबल ब्रांड के उत्पादों का पोषण अलग-अलग देशों में काफी अलग हो सकता है। यह इस बात का प्रमाण है कि राष्ट्रीय नीतियां ही तय करती हैं कि कंपनियां अपने खाद्य पदार्थों में कितनी जल्दी और किस दिशा में बदलाव करेंगी।
समय के साथ, ये अंतर असमान पोषण के रूप में सामने आते हैं। लोग न केवल अलग-अलग मात्रा में प्रोसेस्ड फूड खा रहे हैं, बल्कि कई बार एक ही ब्रांड का ‘समान’ दिखने वाला खाना भी अलग-अलग गुणवत्ता का खा रहे हैं। यह चिंता का विषय है क्योंकि डाइट से जुड़ा यह जोखिम शरीर में चुपचाप बढ़ता रहता है।
एक समस्या, कई परतें
भारत में यह समस्या तीन स्तरों पर है। पहला है नियमों की कमी, जहां खाद्य प्रशासन का ध्यान पोषण गुणवत्ता और प्रोसेसिंग के तरीके के बजाय अभी भी सिर्फ सुरक्षा और मिलावट पर है। दूसरा है जानकारी की कमी, जहां ग्राहकों को स्पष्ट और आसानी से समझ आने वाले पोषण संबंधी संकेत नहीं मिलते। तीसरा है व्यवहार से जुड़ी समस्या, जहां स्वस्थ विकल्पों को बढ़ावा देने वाले ठोस प्रयासों के अभाव में सुविधा, सस्ते दाम और मार्केटिंग खाने-पीने की आदतों पर हावी हो जाते हैं।
इन कमियों को दूर करने के लिए खाद्य नियमों के मूल उद्देश्य पर फिर से विचार करने की जरूरत है। भोजन का सुरक्षित होना बहुत जरूरी है, लेकिन तेजी से बदलते फूड मार्केट में अब सिर्फ इतना ही काफी नहीं है। आज के समय की जरूरत है कि नियमों में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड्स के पोषण संबंधी प्रभावों को शामिल किया जाए, फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग को गंभीरता से लागू किया जाए और विशेष रूप से बच्चों को लुभाने वाली मार्केटिंग पर सख्त कार्रवाई की जाए।
विश्व पोषण सप्ताह के दौरान यह समझना जरूरी है कि पोषण सिर्फ इस बात पर निर्भर नहीं करता कि व्यक्ति क्या खाना चुनता है, बल्कि उन व्यवस्थाओं पर भी निर्भर करता है जो इन विकल्पों को तय करती हैं। जब एक ही ब्रांड के उत्पाद का पोषण अलग-अलग देशों में अलग हो सकता है, तो यह स्पष्ट है कि वैश्विक खाद्य प्रणालियां निष्पक्ष नहीं हैं। वे आर्थिक, नियामक और सूचनात्मक असमानताओं के आधार पर काम करती हैं।
इसलिए, 21वीं सदी में कुपोषण से लड़ने के लिए सिर्फ कैलोरी और सुरक्षा से आगे बढ़कर भोजन की गुणवत्ता से जुड़ी राजनीति को गंभीरता से समझना होगा। अंततः, सवाल सिर्फ यह नहीं है कि खाना खाने के लिए सुरक्षित है या नहीं। बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारा खाद्य तंत्र सचमुच ऐसी डाइट दे रहा है जो लंबे समय तक हमारी सेहत को बेहतर बनाए रख सके।
डॉ. तानिया साह, बेंगलुरु की विद्याशिल्प यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र की सहायक प्रोफेसर हैं। इस लेख में व्यक्त किए गए विचार उनके निजी हैं। लेख मूल रूप से द वायर न्यूज वेबसाइट द्वारा प्रकाशित किया जा चुका है।











