आरटीआई के जवाब में, जहां मंत्रालय ने सुरक्षा और गोपनीयता संबंधी चिंताओं का हवाला दिया, वहीं सीआईएसएफ ने यह कहते हुए विवरण साझा करने से इनकार कर दिया कि वह इस कानून के दायरे से छूट प्राप्त संगठन है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत की सुरक्षा पर केंद्र सरकार कितना खर्च करती है, यह जानने के लिए दायर सूचना का अधिकार (आरटीआई) आवेदनों के जवाब में गृह मंत्रालय और केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआईएसएफ) दोनों ने मांगी गई जानकारी देने से इनकार कर दिया है।
मंत्रालय ने जहां सुरक्षा और निजता से जुड़े प्रावधानों का हवाला दिया, वहीं सीआईएसएफ ने यह कहते हुए विवरण देने से मना कर दिया कि वह आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों से बाहर रखा गया संगठन है।
गौरतलब है कि भागवत किसी संवैधानिक पद पर नहीं हैं। वह एक गैर-सरकारी संगठन, आरएसएस के सरसंघचालक (प्रमुख) हैं। इसके बावजूद, केंद्र सरकार द्वारा उन्हें उच्च स्तरीय सुरक्षा प्रदान की जाती है। ऐसे में उनकी सुरक्षा पर होने वाले वास्तविक खर्च के बारे में पूछताछ करना स्वाभाविक और प्रासंगिक है।
यह मामला केवल किसी व्यक्ति की सुरक्षा व्यवस्था से नहीं, बल्कि सार्वजनिक धन और राज्य के संसाधनों के उपयोग के संबंध में पारदर्शिता के व्यापक सिद्धांत से भी जुड़ा है।
आरटीआई आवेदन में क्या जानकारी मांगी गई थी?
16 अप्रैल, 2026 को इस संवाददाता ने केंद्रीय गृह मंत्रालय में एक आरटीआई आवेदन दायर कर सात विशिष्ट बिंदुओं पर जानकारी मांगी थी। आवेदन में अब तक भागवत की सुरक्षा पर हुए कुल खर्च, 2015 से होने वाले वार्षिक खर्च और सीआईएसएफ, राज्य पुलिस बलों व अन्य एजेंसियों द्वारा किए गए खर्च का विवरण मांगा गया था।
इसके साथ ही वाहनों, संचार प्रणालियों, हथियारों, यात्रा और अन्य रसद व्यवस्थाओं से जुड़े खर्चों के साथ-साथ उनके सुरक्षा घेरे को अपग्रेड किए जाने के बाद हुए अतिरिक्त खर्च और अन्य विवरणों की भी मांग की गई थी।
इस विशेष मामले के संबंध में, सीआईएसएफ को प्रस्तुत एक अलग आवेदन में भागवत की सुरक्षा के लिए बल की शुरुआती तैनाती, तैनात कर्मियों की कुल संख्या और रैंक के अनुसार कर्मियों के विवरण के बारे में जानकारी मांगी गई थी।
इसमें यह भी पूछा गया था कि क्या उनके लिए कोई विशेष सुरक्षा इकाई नामित की गई है और वर्तमान में सीआईएसएफ की सुरक्षा में कितने वीवीआईपी/वीआईपी हैं।

मंत्रालय का जवाब क्या था?
7 मई, 2026 के एक जवाब में, गृह मंत्रालय की वीआईपी सुरक्षा इकाई ने उत्तर दिया कि आवेदन में मांगी गई जानकारी सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 8(1)(जी) और 8(1)(जे) के तहत छूट प्राप्त है, और इसलिए इसे उपलब्ध नहीं कराया जा सकता है।
दूसरे शब्दों में कहें तो मंत्रालय ने खर्च से संबंधित कोई आंकड़ा नहीं दिया। साथ ही सुरक्षा स्तर के बारे में कोई स्पष्ट विवरण नहीं दिया और मानक संचालन प्रक्रियाओं (एसओपी) को भी साझा नहीं किया।
इन धाराओं के क्या मायने हैं?
धारा 8(1)(जी) यह प्रावधान करती है कि यदि किसी जानकारी के खुलासे से किसी व्यक्ति के जीवन या सुरक्षा को खतरा हो सकता है, या यदि यह कानून प्रवर्तन या सुरक्षा उद्देश्यों के लिए सहायता प्रदान करने वाले स्रोतों की पहचान उजागर करता है, तो ऐसी जानकारी रोकी जा सकती है।
धारा 8(1)(जे) व्यक्तिगत जानकारी से संबंधित है। इस प्रावधान के अनुसार, व्यक्तिगत विवरण के अनुरोध को अस्वीकार किया जा सकता है यदि जानकारी का किसी सार्वजनिक गतिविधि या जनहित से सीधा संबंध नहीं है, या यदि इसका खुलासा किसी व्यक्ति की निजता का अनुचित उल्लंघन होगा।
इन दोनों धाराओं का हवाला देकर गृह मंत्रालय ने यह संकेत दिया कि खर्च, संसाधनों और सुरक्षा व्यवस्था के बारे में जानकारी उजागर करने से संभावित रूप से सुरक्षा जोखिम पैदा हो सकता है या निजता से जुड़ी चिंताएं उत्पन्न हो सकती हैं।
हालांकि, आरटीआई कार्यकर्ता लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि कुल सार्वजनिक खर्च का खुलासा करना सुरक्षा अभियानों के रणनीतिक विवरणों को उजागर करने से अलग है। उदाहरण के लिए, किसी व्यक्ति की सुरक्षा पर होने वाले कुल वार्षिक खर्च को बताने का मतलब यह नहीं है कि परिचालन संबंधी बारीकियों का खुलासा किया जाए।

सीआईएसएफ ने क्या कहा?
24 अप्रैल, 2026 के अपने जवाब में, सीआईएसएफ ने कहा कि आरटीआई अधिनियम की धारा 24 और दूसरी अनुसूची के अनुसार, वह एक ऐसी संस्था है जिसे नियमित मामलों पर जानकारी प्रस्तुत करने की बाध्यता से छूट प्राप्त है।
सीआईएसएफ ने आगे कहा कि जानकारी का खुलासा केवल भ्रष्टाचार या मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़े मामलों में ही किया जा सकता है। चूंकि मांगी गई जानकारी इन श्रेणियों में नहीं आती है, इसलिए आवेदन को ‘रखरखाव योग्य नहीं’ माना गया है।
धारा 24 के तहत, देश की कुछ खुफिया और सुरक्षा एजेंसियों को आरटीआई अधिनियम के दायरे से व्यापक छूट दी गई है। सीआईएसएफ ने इसी प्रावधान का इस्तेमाल किया।

इन जवाबों के क्या मायने हैं?
इन दोनों जवाबों से स्पष्ट होता है कि भागवत की सुरक्षा से संबंधित सार्वजनिक खर्च के बारे में नागरिकों की पहुंच लगभग न के बराबर है। गृह मंत्रालय ने सुरक्षा और निजता संबंधी चिंताओं का हवाला दिया, जबकि सीआईएसएफ ने संस्थागत छूट का सहारा लिया।
यह परिदृश्य कई सवाल खड़े करता है। जब सुरक्षा का खर्च करदाताओं के पैसे से वहन किया जाता है, तो क्या कम से कम समेकित वित्तीय विवरणों को सार्वजनिक नहीं किया जाना चाहिए? क्या कुल खर्च का खुलासा करने से वास्तव में सुरक्षा तंत्र खतरे में पड़ जाता है? और, क्या भारत में वीआईपी सुरक्षा एक ऐसा क्षेत्र बन गया है जहां जवाबदेही काफी हद तक सीमित कर दी गई है?
मोहन भागवत की सुरक्षा वृद्धि की समय-सीमा
भागवत 2009 से आरएसएस सरसंघचालक का पद संभाल रहे हैं। हालांकि, पिछले एक दशक में उनकी सुरक्षा व्यवस्था कई चरणों में विकसित और मजबूत हुई है। ये बदलाव केवल सुरक्षा एजेंसियों के मूल्यांकन पर आधारित नहीं थे, बल्कि इन्होंने राजनीतिक और सार्वजनिक बहसों को भी जन्म दिया।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 2012 में यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान भागवत को ‘जेड-प्लस’ श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की गई थी। उस अवधि में, उनकी सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी महाराष्ट्र पुलिस के पास थी, जबकि केंद्रीय बलों की भूमिका सीमित थी। रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्र सरकार ने महाराष्ट्र पुलिस को सीआईएसएफ की भूमिका सहित आवश्यक कर्मियों को तैनात करने का निर्देश दिया था।
इन्हीं रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया था कि सीआईएसएफ के स्पेशल सिक्योरिटी ग्रुप (एसएसजी) ने तुरंत पूरी जिम्मेदारी नहीं ली थी। इसका कारण यह बताया गया था कि बल के पास पर्याप्त जनशक्ति का अभाव था और वह चाहता था कि सुरक्षा की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से किसी एक एजेंसी के हाथों में हो।
उस समय सीआईएसएफ के एक अधिकारी ने कहा था कि यह बेहतर है कि सुरक्षा की जिम्मेदारी एक ही बल को सौंपी जाए। यही कारण था कि फैसला होने के काफी समय बाद भी सीआईएसएफ सीधे तौर पर सुरक्षा घेरा मुहैया कराने में शामिल नहीं हुई।
जून 2015 में, केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के ठीक एक साल बाद, गृह मंत्रालय ने भागवत की सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह से सीआईएसएफ को सौंपने का फैसला किया। द हिंदू की रिपोर्ट्स के अनुसार, सीआईएसएफ कमांडो ने नागपुर में आरएसएस मुख्यालय, उनके आवास और देश भर में उनकी यात्राओं के दौरान भागवत को सुरक्षा घेरा प्रदान करना शुरू कर दिया।
इस बदलाव के साथ सुरक्षा प्रोटोकॉल में कई नए तत्व शामिल किए गए। भागवत को चौबीसों घंटे सुरक्षा प्रदान करने के लिए लगभग 60 प्रशिक्षित कमांडो तैनात किए गए थे।
इस कार्य के लिए नियुक्त सीआईएसएफ की वीवीआईपी कमांडो इकाई कथित तौर पर आधुनिक हथियारों से लैस थी। इनमें एके-सीरीज़ राइफलों के साथ-साथ उन्नत संचार प्रणाली और तोड़फोड़-रोधी तकनीक शामिल थीं। इसके अलावा, ‘जेड-प्लस’ श्रेणी की सुरक्षा के लिए निर्धारित विशिष्ट मानकों को पूरा करने के लिए उनके काफिले के वाहनों को अपग्रेड किया गया था।
अगस्त 2024 में, खुफिया एजेंसियों से नए खतरे की जानकारी मिलने के बाद, भागवत के मौजूदा ‘जेड-प्लस’ सुरक्षा घेरे में एक ‘एडवांस सिक्योरिटी लाइजन’ (एएसएल) घटक जोड़ा गया। यह अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था केवल चुनिंदा उच्च-जोखिम वाले व्यक्तियों को ही प्रदान की जाती है। उस समय, गृह मंत्री अमित शाह कथित तौर पर एएसएल सुरक्षा कवर प्राप्त करने वाले दूसरे व्यक्ति थे।
एएसएल प्रोटोकॉल के तहत, एक विशेष टीम किसी भी दौरे से पहले संबंधित स्थान का दौरा करती है। यह टीम स्थानीय पुलिस और प्रशासन के साथ समन्वय करती है, संभावित खतरों का आकलन करती है, कमजोरियों की पहचान करती है और एक बहु-स्तरीय सुरक्षा घेरा स्थापित करती है। इसमें यात्रा मार्ग और कार्यक्रम स्थल से लेकर चिकित्सा सहायता और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रोटोकॉल तक सब कुछ शामिल होता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, सुरक्षा एजेंसियों को खुफिया जानकारी मिली थी कि कुछ प्रतिबंधित संगठन आरएसएस प्रमुख को निशाना बनाने की कोशिश कर सकते हैं। नतीजतन, गृह मंत्रालय ने सुरक्षा समीक्षा की और उनकी सुरक्षा को और मजबूत करने के निर्देश जारी किए।
भाजपा नेता ने उठाए भागवत की सुरक्षा पर सवाल
भागवत की सुरक्षा बढ़ाए जाने को लेकर सिर्फ विपक्ष ने ही नहीं बल्कि खुद बीजेपी के अंदर से भी सवाल उठे थे। बीबीसी हिंदी की एक रिपोर्ट के मुताबिक, राजस्थान बीजेपी के तत्कालीन प्रवक्ता कैलाश नाथ भट्ट ने एक फेसबुक पोस्ट में सवाल उठाया था कि संघ प्रमुख को ‘जेड-प्लस’ सुरक्षा घेरा क्यों दिया गया है और क्या यह कदम उन्हें आम स्वयंसेवकों से दूर नहीं करेगा।
8 जून, 2015 के एक फेसबुक पोस्ट में भट्ट ने लिखा था कि वह नहीं जानते कि ‘परम पूज्य’ सरसंघचालक जी को जेड-प्लस सुरक्षा क्यों दी गई है, और उन्होंने इसे स्वीकार किया है या नहीं। उन्होंने आगे लिखा कि आज देश के सुरक्षाकर्मी भी सुरक्षित नहीं हैं, हाल ही में मणिपुर में हमारे 20 से अधिक जवान शहीद हो गए।
भट्ट ने अपनी पोस्ट में कहा था कि घोर संकट के समय भगवान ने ही ‘गुरुजी’ और ‘बालासाहेब देवरस जी’ की रक्षा की थी। स्व. इंदिरा गांधी की हत्या भी उनके अपने ही सुरक्षाकर्मियों ने की थी। भगवान ने सभी की सुरक्षा की जिम्मेदारी खुद ली है, फिर डर किस बात का है?
उन्होंने आगे कहा कि कृपया विचार करें, क्या यह सुरक्षा व्यवस्था आपको आम स्वयंसेवकों से दूर नहीं कर देगी? क्या यह व्यवस्था महज एक स्टेटस सिंबल बनकर नहीं रह जाएगी? उन्होंने अंत में लिखा कि अगर उनकी बातों से किसी को ठेस पहुंची हो तो वे माफी मांगते हैं, लेकिन उन्हें लगा कि अपनी बात रखनी चाहिए।
इस टिप्पणी ने पार्टी के भीतर विवाद खड़ा कर दिया। इसके बाद, भट्ट ने माफी मांगी, लेकिन उन्हें अपने पद से इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा और प्रदेश नेतृत्व ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया। यह इस बात को उजागर करता है कि कैसे भागवत की सुरक्षा के मुद्दे ने भाजपा और बड़े संघ परिवार के भीतर भी असहजता की भावना पैदा की है।
मामला अदालत तक पहुंचा
हाल के वर्षों में, भागवत की सुरक्षा को लेकर एक कानूनी चुनौती भी सामने आई। बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि आरएसएस प्रमुख को प्रदान किए गए ‘जेड-प्लस’ सुरक्षा घेरे की लागत की वसूली खुद संघ से की जाए। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया था कि एक निजी संगठन की सुरक्षा पर सार्वजनिक धन खर्च नहीं किया जाना चाहिए।
हालांकि, पीठ ने याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि जनहित याचिका के रूप में पेश की गई इस याचिका में कोई जनहित नहीं दिखाई देता है। अदालत में राज्य सरकार का प्रतिनिधित्व करते हुए, सरकारी वकील देवेंद्र वी. चौहान ने इस जनहित याचिका का विरोध किया था।
(यह लेख पहली बार द वायर हिंदी पर प्रकाशित हुआ था।)
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