प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया नीदरलैंड दौरा उनके गृह राज्य गुजरात के लिए एक खास अहमियत रखता है। इस यात्रा के दौरान उन्होंने जल प्रबंधन और बाढ़ नियंत्रण के वैश्विक प्रतीक माने जाने वाले ऐतिहासिक अफस्लूटडाइक (Afsluitdijk) बांध का दौरा किया।
गुजरातियों और देश के सभी नागरिकों के लिए यह दौरा काफी मायने रखता है। यह खंभात की खाड़ी में बनने वाले एक विशाल जलाशय यानी महत्वाकांक्षी कल्पसर प्रोजेक्ट के लिए एक बड़ी छलांग का संकेत देता है।
आखिर यह अफस्लूटडाइक बांध गुजरात के लिए क्यों महत्वपूर्ण है? 32 किलोमीटर लंबा यह बांध इंजीनियरिंग का एक ऐसा अद्भुत नमूना है, जो नीदरलैंड को उत्तरी सागर (North Sea) से बचाता है।
इस बांध ने वहां एक विशाल मीठे पानी की झील का निर्माण किया है। साथ ही, इसने भूमि सुधार और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लचीलेपन के लिए कई अंतरराष्ट्रीय मानक भी स्थापित किए हैं।
डच प्रधानमंत्री रॉब जेटन के साथ पीएम मोदी ने वहां खुद देखा कि कैसे डच तकनीक ने इस छोटे और संवेदनशील देश को जल संबंधी बड़ी चुनौतियों के बावजूद फलने-फूलने में मदद की है।
पीएम मोदी ने डच इनोवेशन और गुजरात की आकांक्षाओं के बीच सीधा संबंध जोड़ते हुए कहा, “नीदरलैंड ने जल प्रबंधन में वैश्विक मानक स्थापित किए हैं। गुजरात के कल्पसर प्रोजेक्ट को इस तरह की अत्याधुनिक विशेषज्ञता से सीखने का बहुत बड़ा लाभ मिलेगा।”
कल्पसर प्रोजेक्ट दशकों से गुजरात के लिए एक बड़ा सपना रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य खंभात की खाड़ी पर बांध बनाकर एशिया का सबसे बड़ा मीठे पानी का जलाशय तैयार करना है।
यह परियोजना न केवल लाखों लोगों के लिए पीने के पानी और सिंचाई की व्यवस्था करेगी, बल्कि ज्वारीय ऊर्जा (tidal power) उत्पादन को भी संभव बनाएगी। इससे सौराष्ट्र और दक्षिण गुजरात के बीच परिवहन बुनियादी ढांचे को भी भारी बढ़ावा मिलेगा।
भारत के जल शक्ति मंत्रालय और डच बुनियादी ढांचा मंत्रालय के बीच हाल ही में एक ‘लेटर ऑफ इंटेंट’ पर हस्ताक्षर किए गए हैं। यह समझौता दोनों देशों के बीच तकनीकी सहयोग के एक नए युग की शुरुआत का प्रतीक है।
अफस्लूटडाइक में साबित हो चुकी विश्वस्तरीय डच हाइड्रोलिक इंजीनियरिंग अब सीधे तौर पर कल्पसर के डिजाइन, स्थिरता और मजबूती को दिशा देगी।
लंबे समय से इस प्रोजेक्ट का समर्थन कर रही गुजरात सरकार को इस डच तकनीकी ज्ञान से काफी फायदा होगा। इससे वर्षों के व्यवहार्यता अध्ययन (feasibility studies) और पर्यावरण मंजूरी के बाद अब जमीनी काम में तेजी आएगी।
यह तकनीकी सहयोग महज एक कूटनीतिक औपचारिकता से कहीं अधिक है। यह गुजरात के लिए जल सुरक्षा और आर्थिक विकास सुनिश्चित करने की दिशा में एक बहुत ही व्यावहारिक कदम है।
अफस्लूटडाइक दौरे से मजबूत हुई ‘भारत-नीदरलैंड जल रणनीतिक साझेदारी’ ने टिकाऊ बुनियादी ढांचे के इंडो-डच इनोवेशन के केंद्र में गुजरात को ला खड़ा किया है।
अपना डच दौरा समाप्त कर जब पीएम मोदी स्वीडन के लिए रवाना हुए, तो उनका संदेश बिल्कुल साफ था। गुजरात की विकास गाथा अब अंतरराष्ट्रीय सहयोग, तकनीकी प्रगति और दूरदर्शी नेतृत्व का एक शानदार उदाहरण बन रही है।
डच विशेषज्ञता के मजबूत सहारे के साथ कल्पसर प्रोजेक्ट जल्द ही गुजरात में जल प्रबंधन की दिशा बदल सकता है। इस ऐतिहासिक कदम का लाभ आने वाली कई पीढ़ियों को मिलेगा।
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