भारत में हाल ही में शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा एक बेहद सनसनीखेज घोटाला सामने आया है। हैरानी की बात यह है कि एजुकेशनल सॉफ्टवेयर कॉन्ट्रैक्ट में हुई इस भारी सरकारी धांधली का पर्दाफाश किसी बड़े पत्रकार ने नहीं किया। बिना किसी पत्रकारिता अनुभव वाले स्कूली छात्रों ने सोशल मीडिया पर इस पूरे करप्शन की पोल खोलकर रख दी है।
यह घटना 22 मई की है। स्कूल के अंतिम वर्ष में पढ़ने वाले 17 वर्षीय तीन छात्रों- निसर्ग अधिकारी, वेदांत श्रीवास्तव और सार्थक सिद्धांत ने अपनी जांच से देशभर के शिक्षा पत्रकारों को पीछे छोड़ दिया। इन छात्रों ने केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के नए ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम के ठेके में हुए भ्रष्टाचार की खुद जांच की और सारे सबूत इंटरनेट पर डाल दिए।
यह वही सिस्टम है जिसके जरिए हर साल 17 लाख से ज्यादा छात्रों की 12वीं कक्षा की बोर्ड कॉपियां चेक की जाती हैं और उनका यूनिवर्सिटी भविष्य तय होता है।
इन तीनों किशोरों को सबसे पहले अपनी खुद की आंसर शीट में गंभीर गड़बड़ियां मिली थीं। इसके बाद उन्होंने स्वतंत्र रूप से इस पूरे मूल्यांकन सिस्टम की पड़ताल शुरू की। सार्थक ने टेंडर प्रक्रिया की जांच की कि कैसे सरकार ने एक निजी ऑपरेटर को ठेका दिया। खुद को ‘एथिकल हैकर’ बताने वाले निसर्ग ने सिस्टम की साइबर सुरक्षा खामियों को खोज निकाला। वहीं, वेदांत ने पता लगाया कि कैसे चेकिंग के दौरान छात्रों के जवाबों को आपस में मिला दिया गया था।
निसर्ग ने बाकायदा यह दिखाया कि वह कैसे सरकारी सुरक्षा प्रोटोकॉल को बायपास करके सीबीएसई की वेबसाइट और सर्वर तक पहुंच गया। उसने वहां छात्रों और शिक्षकों की निजी जानकारी देखी और परीक्षकों को बांटी गई डिजिटल आंसर शीट को मॉडिफाई करने में सफलता पाई। सार्थक ने सोशल मीडिया पर खुलासा किया कि राष्ट्रीय परीक्षा डेटा तक फुल एक्सेस रखने वाले सुपरएडमिन अकाउंट का पासवर्ड मजाक के तौर पर सिर्फ “123456” रखा गया था।
सार्थक ने वित्तीय नियमों और दस्तावेजों को खंगाल कर यह भी साबित किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रशासन में शिक्षा अधिकारियों ने टेंडर प्रक्रिया में हेरफेर की। यह सब हैदराबाद स्थित ‘कोएम्प्ट एडुटेक’ (Coempt Eduteck) नामक एक कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया। इस कंपनी को ठेका मिलने के बाद सिस्टम में भारी तकनीकी दिक्कतें आईं। छात्रों की कॉपियां आपस में मिल गईं, डिजिटल अंक मूल शीट से मेल नहीं खा रहे थे और सिस्टम में दर्ज एंट्रीज इतनी धुंधली थीं कि उन्हें ठीक से स्कैन या ग्रेड नहीं किया जा सकता था।
पत्रकारों के लिए यह समझना मुश्किल है कि यह पूरी घटना ज्यादा हास्यास्पद है या शर्मनाक। यह शिक्षा क्षेत्र के सबसे बड़े और प्रामाणिक खुलासों में से एक है जिसे बिना किसी मीडिया बैकग्राउंड वाले स्कूली बच्चों ने अंजाम दिया। सोशल मीडिया पर उनकी पोस्ट वायरल होते ही देशभर से लाखों छात्रों ने ऐसी ही शिकायतें शुरू कर दीं। नतीजतन, 40 लाख से अधिक छात्रों ने अपनी आंसर शीट की कॉपी की मांग कर दी और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को पद से हटाने की जोरदार मांग उठने लगी।
प्रधानमंत्री मोदी के तीन कार्यकालों में यह संभवतः पहली ऐसी जांच है जिस पर प्रशासन ने कुछ हद तक सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है। सार्थक को संसदीय स्थायी समिति द्वारा अपने निष्कर्ष पेश करने के लिए आमंत्रित किया गया। छात्रों के गुस्से को शांत करने के लिए सीबीएसई के अध्यक्ष और सचिव का तबादला कर दिया गया, हालांकि उन्हें निलंबित नहीं किया गया।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरकार युवाओं के आक्रोश से बचना चाहती है। श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में सोशल मीडिया से शुरू हुए जेन जेड (Gen Z) के प्रदर्शनों से सरकारें गिर चुकी हैं, इसलिए भारत सरकार इस मामले में पूरी सावधानी बरत रही है।
जिस हंगामेदार हफ्ते में भारत के भीतर यह बड़ा स्कैंडल सामने आ रहा था, उस वक्त मेनस्ट्रीम मीडिया पूरी तरह से खामोश था। ‘द वायर’ और ‘द न्यूज़ मिनट’ जैसे कुछ स्वतंत्र संस्थानों को छोड़ दें, तो मुख्यधारा के पत्रकारों ने इस खबर को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। जिन्होंने इसे कवर भी किया, उन्होंने इसे घोटाले की तरह दिखाने के बजाय “सीबीएसई बनाम छात्र” का नाम देकर इसे महज बच्चों की शरारत साबित करने की कोशिश की।
अरबपति गौतम अडानी के स्वामित्व वाले देश के सबसे बड़े टेलीविजन न्यूज़ चैनल एनडीटीवी (NDTV) के होमपेज पर पूरे हफ्ते इस घोटाले की एक भी रिपोर्ट नहीं थी। अगर किसी को खबर पढ़नी भी थी, तो उसे वेबसाइट के “एजुकेशन” टैब में जाकर खोजना पड़ता था। वहां भी सिर्फ सरकारी दावों और टेंडर प्रक्रिया को सही ठहराने वाले बयान ही प्रमुखता से छापे गए थे।
मीडिया तो चुप रहा, लेकिन सरकार की मजबूत प्रोपेगेंडा मशीनरी ने छात्रों पर ही हमला बोल दिया। सरकारी चैनल ‘दूरदर्शन न्यूज़’ के प्राइम-टाइम होस्ट अशोक श्रीवास्तव ने इन छात्रों को “पाकिस्तानी” तक कह डाला। इंटरनेट पर मौजूद ट्रोल आर्मी ने उन्हें “राष्ट्रविरोधी सोरोस एजेंट” करार दिया और कुछ मामलों में तो उन्हें “आतंकवादी” तक कहा गया। हालात इतने बिगड़ गए कि डरे हुए माता-पिता को अपने बच्चों के बचाव में सोशल मीडिया पर उतरना पड़ा।
खुलासे के एक हफ्ते बाद जब सीबीएसई ने आधिकारिक तौर पर सिस्टम की उन खामियों को मान लिया, तब जाकर कुछ न्यूज़ रूम नींद से जागे। लेकिन उन्होंने भी इन छात्रों की मेहनत को अपना “एक्सक्लूसिव” बताकर पेश करना शुरू कर दिया। अपनी मेहनत की इस चोरी के बाद सार्थक को सीएनएन न्यूज़18 (CNN News18) और टाइम्स नाउ (Times Now) को क्रेडिट न देने के लिए खुलेआम फटकार लगानी पड़ी।
पिछले एक दशक में स्वतंत्र मीडिया के जिस तरह के हालात रहे हैं, उसके बाद बड़े मीडिया घरानों से अब किसी को खास उम्मीद नहीं बची है। लेकिन इतने बड़े स्तर पर स्कूली बच्चों को प्रभावित करने वाली खबर को छिपाने की मीडिया की यह कायरता एक नई गिरावट है। भारत में आज पत्रकारिता की स्थिति ऐसी हो चुकी है कि वह अपने ही बच्चों को नुकसान पहुंचाने में कोई संकोच नहीं कर रही है।
मौजूदा दौर की पत्रकारिता की यह खासियत बन गई है कि यह आम जनता को सरकार या ताकतवर व्यापारिक हितों के बराबर नहीं मानती। इस मामले में भी स्कूली बच्चों को खबर के हाशिये पर ही रखा गया। यह एक ऐसी पत्रकारिता है जो लोगों को सरकार से सवाल न पूछने और केवल सरकारी प्रेस विज्ञप्तियों में परोसे गए कचरे को चुपचाप स्वीकार करने की ट्रेनिंग दे रही है। यह उस समाज को ही खोखला कर रही है जिसकी सेवा करने का यह दावा करती है।
इस पूरे परीक्षा घोटाले की असली कहानी सिर्फ यह शानदार जांच नहीं है। असली बात यह है कि बिना किसी संसाधन वाले युवा छात्रों ने संस्थागत समर्थन और जांच के साधनों वाले अनुभवी पत्रकारों को उनके ही खेल में हरा दिया। इस साल मेडिकल कॉलेज, अंडरग्रेजुएट प्रोग्राम और इंजीनियरिंग स्कूलों की राष्ट्रीय परीक्षाओं में भी ऐसे ही विवाद देखे गए हैं। यह उन कहानियों का एक शर्मनाक उदाहरण है जो सबके सामने होने के बावजूद जानबूझकर छुपाई जा रही हैं।
इस घटना ने देश के तमाम न्यूज़ रूम के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। क्या इन्वेस्टिगेशन से ज्यादा ओपिनियन को तवज्जो देने वाली मीडिया संस्कृति का यही अंतिम परिणाम है?
जहां तक बच्चों की बात है, वे बिल्कुल सही रास्ते पर हैं। उनका नैतिक नजरिया बिल्कुल स्पष्ट है और वे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर, पारदर्शिता के पैरोकार और एक खोजी पत्रकार की भूमिका शानदार तरीके से निभा रहे हैं। भारत के युवा स्पष्ट रूप से मौजूदा सिस्टम की हकीकत को समझ चुके हैं। उन्हें पता है कि रहने लायक शहर, साफ नदियां और हरे-भरे जंगल तेजी से खत्म हो रहे हैं और वे अपने भविष्य को बचाने के लिए पूरी तत्परता से काम कर रहे हैं।
इस पूरी तस्वीर में असली समस्या भारत के पत्रकार हैं। उनकी इस औसत दर्जे की और कायरतापूर्ण पत्रकारिता का खामियाजा हमारे समाज को आने वाले कई दशकों तक भुगतना पड़ेगा।
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