देश के कई राज्यों में स्थित केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों ने अपने आधिकारिक दस्तावेजों में एक बड़ा बदलाव करने का कदम उठाया है। इन शिक्षण संस्थानों ने अपनी डिग्रियों, मार्कशीट, आधिकारिक पत्राचार, निमंत्रण पत्रों और साइनबोर्ड जैसी सभी जगहों पर “इंडिया” शब्द को हटाकर “भारत” लिखने का निर्णय लिया है।
इस बड़े बदलाव की एक साफ झलक इस रविवार को मध्य प्रदेश के जबलपुर में देखने को मिलेगी। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू यहां रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में शिरकत करेंगी। इस भव्य समारोह में छात्रों को बांटी जाने वाली सभी डिग्रियों पर इंडिया के बजाय भारत लिखा होगा।
रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय के कुलपति राजेश कुमार वर्मा ने मीडिया से बातचीत के दौरान बताया कि अब से हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के दस्तावेजों में भारत शब्द का ही इस्तेमाल किया जाएगा। जी-20 शिखर सम्मेलन में भारत शब्द के उपयोग का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि देश का असली नाम भारत ही है और उनकी कार्यकारी परिषद ने इस संबंध में एक प्रस्ताव पारित कर दिया है। इस खास पहल के लिए साल 2025 में प्रयागराज में आयोजित ज्ञान महाकुंभ के दौरान विश्वविद्यालय को सम्मानित भी किया गया था।
जब उनसे अखंड भारत से जुड़े तर्क के बारे में पूछा गया, तो कुलपति वर्मा ने एक बहुत ही व्यावहारिक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि उनका नाम जन्म से ही राजेश वर्मा है और अगर परिवार वाले उन्हें राजू बुलाने लगें, तो भी उनका मूल नाम राजेश ही रहेगा। उनका मानना है कि चूंकि यह धरती सम्राट भरत की है, इसलिए इसका वास्तविक और सनातन नाम भारत ही है।
मध्य प्रदेश के ही एक अन्य बड़े संस्थान, इंदौर के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय ने इस मामले में सबसे आगे होने का दावा किया है। कुलपति राकेश सिंघई के अनुसार, उनके विश्वविद्यालय ने सबसे पहले यह प्रस्ताव पारित किया था और अपने यहां हर जगह लिखित में इंडिया को भारत से बदल दिया है। उनका कहना है कि राज्य के अन्य विश्वविद्यालय अब उनके इसी ऐतिहासिक कदम का अनुसरण कर रहे हैं।
यह वैचारिक मुहिम सिर्फ मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ के बिलासपुर स्थित गुरु घासीदास केंद्रीय विश्वविद्यालय ने भी इसी राह पर चलने का फैसला किया है। कुलपति आलोक कुमार चक्रवाल ने स्पष्ट किया कि देश का असली नाम भारत है और इंडिया नाम असल में विदेशियों द्वारा दिया गया था। उन्होंने बताया कि जैसे ही पुरानी मार्कशीट और डिग्रियों का छपा हुआ स्टॉक खत्म होगा, नए दस्तावेजों पर आधिकारिक रूप से भारत छपकर आएगा।
इस व्यापक बदलाव के पीछे मुख्य रूप से ‘शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास’ नामक संगठन का एक बड़ा अभियान है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से गहराई से जुड़े इस संगठन का संबंध शिक्षाविद स्वर्गीय दीनानाथ बत्रा से भी रहा है। न्यास के एक अनुषांगिक संगठन, भारतीय भाषा मंच की केंद्रीय कार्यकारी समिति के सदस्य एम. एल. गुप्ता ने बताया कि उन्होंने दस्तावेजों में भारत शब्द के इस्तेमाल के लिए देशभर में बड़े पैमाने पर अभियान चलाया है।
एम. एल. गुप्ता का मजबूत तर्क है कि किसी भी देश के दो नाम नहीं होने चाहिए। उनका कहना है कि अंग्रेजों के आने के बाद सिंधु नदी (इंडस) के नाम पर देश को इंडिया कहा जाने लगा, जिसका इस्तेमाल विदेशी शासकों ने अपमानजनक संदर्भ में किया था। गुप्ता ने अपनी पुस्तक “इंडिया नहीं भारत” में लिखा है कि आजादी के बाद भी विदेशी प्रभाव के कारण ही संविधान में इंडिया शब्द को जगह मिली।
उन्होंने अपनी किताब में यह भी दावा किया है कि मध्य प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात और महाराष्ट्र के कुल 17 विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों ने आधिकारिक तौर पर इस बदलाव का प्रस्ताव पारित कर दिया है।
इसी कड़ी में ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय की कुलपति स्मिता सहस्रबुद्धे ने भी न्यास के तर्कों से पूरी सहमति जताई है। उन्होंने कहा कि चूंकि हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है, इसलिए इंडिया के स्थान पर भारत का ही प्रयोग होना चाहिए।
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी साल 2025 में कोच्चि में आयोजित राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन ‘ज्ञान सभा’ में इस मुद्दे पर अपनी स्पष्ट राय रखी थी। उन्होंने जोर देकर कहा था कि भारत एक व्यक्तिवाचक संज्ञा है और इसका अनुवाद नहीं किया जाना चाहिए। उनका मानना था कि बोलते, लिखते या संवाद करते समय हमेशा भारत नाम का ही उपयोग होना चाहिए।
गौरतलब है कि वर्तमान में भारतीय संविधान देश के लिए इंडिया और भारत दोनों नामों का उपयोग करता है। हालांकि, साल 2023 में जी-20 के एक आधिकारिक रात्रिभोज निमंत्रण में द्रौपदी मुर्मू को ‘प्रेसिडेंट ऑफ भारत’ के रूप में संबोधित किया गया था।
इसी तरह 2026 के गणतंत्र दिवस के एक आधिकारिक ज्ञापन में भी ‘भारत सरकार’ और ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया’ दोनों का जिक्र किया गया है। वहीं दूसरी ओर, नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार अपने आधिकारिक कामकाज और योजनाओं, जैसे ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्टार्टअप इंडिया’ और ‘स्टैंड-अप इंडिया’ में इंडिया शब्द का इस्तेमाल निरंतर कर रही है।
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