किन नेताओं को गुजरात कांग्रेस की कमजोर कड़ी मान रहा है आलाकमान

| Updated: April 12, 2022 8:24 pm

कांग्रेस आलाकामन गुजरात चुनाव को पूरी ताकत से लड़ना चाहता है , इसलिए पुराने दिग्गजों को बड़ी शालीनता से किनारे लगाया जा रहा है , नेतृत्व की उपेक्षा से नेता परेशान है , लेकिन विफल हो चुके यह नेता कुछ खास कर नहीं पा रहे हैं। गुजरात प्रभारी डॉ रघु शर्मा - प्रदेश प्रमुख जगदीश ठाकोर ,नेता प्रतिपक्ष सुखराम राठवा की तिकड़ी बात सबसे करती है ,मीटिंग पर मीटिंग करती है लेकिन निर्णय इसके खिलाफ हो रहे है। यह अपनी नाराजगी नेतृत्व तक पहुंचाने की कोशिश भी कर रहे हैं लेकिन नेतृत्व कोई भाव नहीं दे रहा।

गुजरात विधानसभा चुनाव 2022 के पहले गुजरात कांग्रेस 2017 के विधानसभा चुनाव से सबक ले रही है , जब पार्टी अपने दिग्गजों की जिद और हार के कारण सरकार बनाने से चूक गयी थी। कांग्रेस आलाकामन गुजरात चुनाव को पूरी ताकत से लड़ना चाहता है , इसलिए पुराने दिग्गजों को बड़ी शालीनता से किनारे लगाया जा रहा है , नेतृत्व की उपेक्षा से नेता परेशान है , लेकिन विफल हो चुके यह नेता कुछ खास कर नहीं पा रहे हैं। गुजरात प्रभारी डॉ रघु शर्मा – प्रदेश प्रमुख जगदीश ठाकोर ,नेता प्रतिपक्ष सुखराम राठवा की तिकड़ी बात सबसे करती है ,मीटिंग पर मीटिंग करती है लेकिन निर्णय इसके खिलाफ हो रहे है। यह अपनी नाराजगी नेतृत्व तक पहुंचाने की कोशिश भी कर रहे हैं लेकिन नेतृत्व कोई भाव नहीं दे रहा।

जिला और तहसील स्तर के नेताओं सीधी बात के बाद 6 जुलाई को कोर कमेटी की बैठक नया रोड मैप बनाया गया हैं , जिसमे इन नेताओं को जमीनी निर्णय से दूर रखने पर सहमति बनी है। लेकिन इनके वरिष्ठता का सम्मान होगा , निर्णय में समावेश नहीं। डॉ रघु शर्मा के इस रणनीति को आलाकमान का समर्थन हांसिल है। इसी का परिणाम है की विभिन्न सेल मोर्चो के गुजरात प्रमुख की जिम्मेदारी युवाओं और नए चेहरों को दी गयी है ,फिर चाहे वह महिला कांग्रेस हो, आदिवासी कांग्रेस हो, अनुसूचित जाति कांग्रेस हो या अन्य भाषा भाषी सेल हो ,या पीसीसी।

2007 में गुजरात की सड़के नाप चुके डॉ रघु शर्मा अपने निजी सम्पर्को के राय का भी इस्तेमाल फैसलों में कर रहे हैं । गुजरात में लम्बे समय के बाद प्रदेश प्रमुख की आफिस का नेता प्रतिपक्ष -प्रभारी महासचिव और प्रदेश प्रमुख सार्वजनिक रूप से इस्तेमाल कर रहे हैं।

भरत सिह सोलंकी

गुजरात कांग्रेस के सर्वेसर्वा का दंभ भरने वाले और कभी दस जनपथ के सबसे नजदीकी पूर्व प्रदेश प्रमुख भरत सिह सोलंकी इन दिनों आलाकमान से मुलाकात के लिए तरस रहे है , द्वारिका अधिवेशन के दौरान भी राहुल गाँधी की नाराजगी का वह शिकार हुए थे , उसके बाद हुए “आणंद कांड ” के बाद आलाकमान उनसे खफा है। पूर्व मुख्यमंत्री माधव सिह सोलंकी के पुत्र पूर्व केंद्रीय रेल राज्य मंत्री भरत सिंह सोलंकी ने तीन दिन दिल्ली में रहकर आलाकमान से मिलने के लिए समय का इंतजार किया लेकिन उनकी मुलाकात नहीं हो पायी। गुजरात आने के बाद वह राहुल गाँधी के नजदीकियों निखिल अल्वा ,कृष्णा अल्लावरु के सहारे संपर्क की कोशिश की , लेकिन उधर से भी कोई जबाब नहीं मिल रहा है। 6 अप्रैल को गाँधी आश्रम से दिल्ली के लिए रवाना यात्रा में भी वह अनुपस्थित थे। कांग्रेस के सार्वजनिक कार्यक्रमो से भी वह दूर है , अब अपने समर्थको के साथ मिलकर ” ऐसे कैसे चलेगा ” की रणनीति बना रहे है। गुजरात प्रदेश प्रमुख जगदीश ठाकोर उनके समर्थक माने जाते थे लेकिन हाल ही हुयी प्रदेश कांग्रेस , और जिला प्रमुखों की नियुक्ति में भरत सिंह सोलंकी के “कई अपनों ” के पर क़तर दिए गए हैं। नियुक्ति के एक दिन पहले ही “डिनर ” का आयोजन कर शक्ति प्रदर्शन किया लेकिन नियुक्ति में उसका प्रभाव नहीं पड़ा। अभी अपने समर्थको को “देखते हैं “का सन्देश दिया है।

अर्जुन मोढवाडिया

गुजरात कांग्रेस के पूर्व प्रमुख और नेता विरोध पक्ष रह चुके अर्जुन मोढवाडिया भी बिना पते के लिफाफे बने हुए है। द्वारिका अधिवेशन के दौरान “नेता 2 सीट जीतने की कोशिश करें बाकि सरकार हम बना लेंगे “,राहुल गाँधी द्वारा यह कहने को उनसे जोड़कर देखा जा रहा है। नयी नियुक्ति में उनके समर्थको को उम्मीद थी लेकिन जगह मिल नहीं पायी। गाँधी की जन्मस्थली पोरबंदर का कभी प्रतिनिधित्व करने वाले इस अर्जुन को किसी कृष्ण की तलाश है। अहमद पटेल के नजदीकी रहे मोढवाडिया तमाम कोशिश के बाद भी आलाकमान से नजदीकी नहीं बना पा रहे हैं , एनसीपी विधायक कांधल जाडेजा की कांग्रेस से बढ़ रही नजदीकी अर्जुन मोढवाडिया को परेशान करने वाली है। निर्णय में उनकी “लम्बी सूची ” शामिल नहीं हो पा रही है।नयी पीसीसी में मुस्लिमो को संख्या के मुताबिक प्रतिनिधित्व नहीं मिलने का ” नाराजगी ” का दाव भी फेल हो गया , विभिन्न सेल मोर्चो में हुयी नियुक्ति में भी उनका प्रभाव नजर नहीं आया। अहमदाबाद के आयोजनों में सक्रियता और प्रवास के सहारे वह अपने समर्थको तक पहुंच बरकरार रखने की कोशिश में हैं।

सिद्धार्थ पटेल

पूर्व मुख्यमंत्री चिमन पटेल के पुत्र और प्रदेश प्रमुख आइसीसीसी सचिव रह चुके सिद्धार्थ पटेल वडोदरा जिला की सियासत से भी बाहर हैं , डभोई से लगातार तीन चुनाव हार चुके और कभी पटेल चेहरे रहे सिद्धार्थ , नरेश पटेल के प्रवेश के पहले बातचीत में भी शामिल नहीं है। हार्दिक पटेल की प्रियंका गाँधी से नजदीकी और पटेल समाज के बीच बढ़ते दखल के कारण कांग्रेस की पटेल राजनीति के “पोस्टर बॉय ” की जगह भी छीन चुकी है , उनके समर्थक भी समय के साथ नया आशियाना ढूढ़ रहे हैं। 6 अप्रैल को रघु शर्मा द्वारा की अध्यक्षता में हुयी कोर कमेटी की मीटिंग में सिद्धार्थ ख़ामोशी परिस्थिति बया करने के लिए काफी है। कभी कांग्रेस में “जनता दल” का जलवा होता था लेकिन अब परिस्थिति यह है की नयी पीसीसी में जनता दल का केवल एक प्रतिनिधित्व है , वह भी सूरत से , जगदीश ठाकोर के कोटे से। सोनिया गाँधी के नजदीकी रहे इस पटेल नेता की राहुल गाँधी और उनकी टीम के साथ केमेस्ट्री बन नहीं पा रही है ,कई दिल्ली प्रवास के बाद कोई परिणाम ना मिलने से अब वह भी थक चुके हैं। गुजरात की राजनीति में कमजोर होती पकड़ के बाद एआईसीसी में जगह बनाने की कोशिश में भी सफलता नहीं मिल रही है , ना दूसरे राज्यों में कोई जिम्मेदारी। हार्दिक पटेल हर जगह उन पर भारी पड़ रहे हैं।

तुषार चौधरी

गुजरात के एकमात्र आदिवासी मुख्यमंत्री रहे अमर सिंह चौधरी के पुत्र और यूपीए -2 में लगातार पांच साल केंद्रीय राज्य मंत्री रहे तुषार चौधरी भी आलाकमान की उपेक्षा से परेशान है। दक्षिण गुजरात के इस आदिवासी नेता के विरोधियो को पीसीसी में खूब जगह मिली , जबकि एक भी समर्थक को जगह नहीं मिल पायी। अपने गृह जिले सूरत की समीक्षा बैठक में भी उन्हें नहीं बुलाया गया। द्वारिका अधिवेशन में भी मंच पर जगह नहीं मिली। दो बार गुजरात के कार्यकारी अध्यक्ष रह चुके तुषार चौधरी अभी तक सूरत शहर और जिला में अपनी पसंद की नियुक्तियां भी नहीं करवा पाए हैं। तापी -पार – नर्मदा रिवर लिंक प्रोजेक्ट के विरोध में आयोजित तमाम प्रदर्शनों में सक्रियता के बावजूद राहुल गाँधी की नजर में विधायक अनंत पटेल आ गए। पिछले दो महीने में राहुल गाँधी तीन बार अनंत पटेल से लम्बी मुलाकात कर चुके हैं। उन्हें गुजरात आदिवासी कांग्रेस का प्रमुख भी बनाया गया है। दिल्ली में आयोजित पत्रकार परिषद में भी सुखराम राठवा और अनंत पटेल ने प्रतिनिधित्व किया। लेकिन इस दिग्गज नेता को जगह नहीं मिली। अहमद पटेल के रहते कभी दूसरे नेता का दरवाजा नहीं देखने वाले चौधरी कांग्रेस के आयोजनों की सक्रियता के सहारे अपनी जमीन पाने की कोशिश में हैं। लेकिन आलाकमान की नजर से वंचित हैं।

परेश धनाणी

कभी राहुल गाँधी के नजदीकी रहे इस युवा तुर्क की गृह जिले में ही घेराबंदी कर दी गयी है। नेता प्रतिपक्ष रहे परेश धनाणी की जगह अमरेली में उनके प्रतिस्पर्धी रहे वीर जी ठुम्मर को बढ़ावा दिया जा रहा है। जिला की भी राजनीति में और “राजीव भवन” में भी। वीर जी की बेटी जेनी ठुम्मर को महिला कांग्रेस का प्रमुख बनाया गया है। परेश के साथ इस्तीफ़ा देने वाले प्रदेश प्रमुख अमित चावड़ा तो जगदीश ठाकोर के साथ साये की तरह नजर आते हैं , लेकिन परेश गायब रहते हैं। कांग्रेस सूत्रों के मुताबिक आलाकमान ” मूंगफली ” से नाराज है। नेता प्रतिपक्ष के तौर पर भी वह पटेल नेता नहीं बन पाए , और ना ही अमरेली के बाहर निकल पाए। नरेश पटेल मामले में भी पटेल नेता होने के बावजूद उन्हें मध्यस्थ नहीं बनाया गया। हार्दिक पटेल का कांग्रेस में बढ़ता प्रभाव इस पटेल नेता के भी आड़े आ रहा है। साथ ही प्रभारी रघु शर्मा – प्रमुख जगदीश ठाकोर की सक्रियता और आसान उपलब्धता , सीधा संवाद परेशान कर रहा है।

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