गुजरात उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक और संवेदनशील फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि ट्रेन दुर्घटना में जान गंवाने वाली गर्भवती महिला के गर्भ में पल रहा बच्चा भी एक स्वतंत्र यात्री माना जाएगा। अदालत के अनुसार, अगर दुर्घटना में मृत जन्म लेने वाले (स्टिलबॉर्न) बच्चे की मौत होती है, तो उसे रेलवे अधिनियम के तहत अलग से मुआवजे का अधिकार है।
न्यायालय ने माना कि गर्भावस्था के उन्नत चरण में भ्रूण को एक बच्चे और मां से अलग एक स्वतंत्र पीड़ित के रूप में देखा जाना चाहिए।
यह महत्वपूर्ण टिप्पणी जस्टिस जे.सी. दोशी की पीठ ने की। अदालत रेलवे दावा न्यायाधिकरण (रेलवे क्लेम्स ट्रिब्यूनल) के उस आदेश को चुनौती देने वाली एक प्रथम अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें एक पिता की याचिका खारिज कर दी गई थी। इस याचिका में व्यक्ति ने रेलवे दुर्घटना में अपनी पत्नी और अजन्मे बच्चे की मौत के एवज में मुआवजे की मांग की थी।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस जे.सी. दोशी ने कहा कि चूंकि भ्रूण को एक बच्चे के रूप में माना जाता है, इसलिए उसकी मृत्यु को मां की मृत्यु से अलग एक स्वतंत्र दुर्घटना माना जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक मृत जन्मा बच्चा सभी उद्देश्यों के लिए एक ‘व्यक्ति’ है और वह रेलवे अधिनियम के तहत मुआवजे का दावा करने का पूरा हकदार है।
पीठ ने न्यायाधिकरण के पुराने आदेश को अनुचित और पेटेंट अवैध करार दिया। न्यायालय ने कहा कि नौ महीने का भ्रूण हर मायने में अस्तित्व में मौजूद एक बच्चा है। पीठ के अनुसार, ‘वास्तविक यात्री’ (बोनाफाइड पैसेंजर) की उदार और व्यावहारिक व्याख्या में मृत जन्मे बच्चे को भी शामिल किया जाना चाहिए।
इस दर्दनाक घटना की पृष्ठभूमि के अनुसार, अपीलकर्ता अपनी नौ महीने की गर्भवती पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ ट्रेन में यात्रा कर रहा था। भारी भीड़ के कारण महिला कोच के प्रवेश द्वार के पास खड़ी थी।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, जैसे ही ट्रेन ने चलना शुरू किया, एक जोरदार झटके के कारण उसकी पत्नी चलती ट्रेन से गिर गई। इस हादसे में उसे गंभीर चोटें आईं और अस्पताल ले जाते समय उसकी मृत्यु हो गई। इस घटना में गर्भ में पल रहे बच्चे की भी जान चली गई।
इस मामले में अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता रथिन पी. रावल और रेलवे प्रशासन की ओर से अधिवक्ता अर्चना यू. अमीन पेश हुईं। पीड़ित पति ने रेलवे दावा न्यायाधिकरण अधिनियम 1987 और रेलवे अधिनियम 1989 के तहत मृत जन्मे बच्चे के लिए 8 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की थी।
इसके जवाब में रेलवे ने यह कहते हुए मुआवजे का विरोध किया कि महिला चलती ट्रेन में चढ़ने की कोशिश करते हुए गिरी थी। रेलवे का तर्क था कि यह घटना रेलवे अधिनियम की धारा 123(सी)(2) के तहत ‘अप्रिय घटना’ (अनटुवर्ड इंसिडेंट) के दायरे में नहीं आती।
रेलवे ने यह भी दावा किया कि अजन्मे बच्चे को वैध यात्री नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर न्यायाधिकरण ने शुरुआत में मेंटेनेबिलिटी के मुद्दे पर ही याचिका खारिज कर दी थी।
हालांकि, उच्च न्यायालय ने पोस्टमार्टम, इन्क्वेस्ट रिपोर्ट और दुर्घटना रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा कि महिला की मौत और उसके गर्भ में नौ महीने के जीवित भ्रूण की मौजूदगी एक निर्विवाद तथ्य है।
अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि पति को पत्नी की मौत का मुआवजा अलग कार्यवाही में पहले ही मिल चुका है और रेलवे ने उस फैसले को चुनौती नहीं दी थी।
अजन्मे बच्चों के अधिकारों की व्याख्या करते हुए न्यायालय ने ‘नैसिटुरस प्रो इयाम नाटो हैबेटुर’ (Nasciturus pro iam nato habetur) के कानूनी सिद्धांत का जिक्र किया। यह सिद्धांत कानूनी तौर पर यह मान्यता देता है कि एक अजन्मा बच्चा अपने लाभ के लिए जन्म लिया हुआ माना जाता है।
अदालत ने कहा कि भारतीय न्यायशास्त्र में समय के साथ अजन्मे और मृत जन्मे बच्चों के अधिकारों को मान्यता देने का विकास हुआ है।
पीठ ने अपने फैसले में कई पुराने मामलों का भी हवाला दिया। इनमें नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम कुसुमा (2011), एस. सईदुद्दीन बनाम कमिश्नर, भोपाल गैस विक्टिम्स (1997), डिविजनल कंट्रोलर, केएसआरटीसी बनाम विद्या शिंदे (2003) और श्रद्धा बनाम भद्रेश (2005) शामिल हैं। इन सभी मामलों में अदालतों ने अजन्मे बच्चों की मौत या उन्हें लगी चोटों के लिए मुआवजे को मान्यता दी थी।
इसके अलावा, अदालत ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक हालिया फैसले का भी संदर्भ दिया। उस फैसले में भी यह माना गया था कि मां के गर्भ में पल रहा पांच महीने से अधिक का भ्रूण अस्तित्व में मौजूद बच्चे के समान है और रेलवे अधिनियम के तहत मुआवजे का हकदार है।
मोटर वाहन अधिनियम के तहत न्यायशास्त्र का हवाला देते हुए, न्यायालय ने कहा कि भ्रूण का नुकसान केवल मां को हुई शारीरिक चोट नहीं है, बल्कि यह एक और जीवन का अंत है जो समय के साथ एक शिशु के रूप में दुनिया में आता।
इन सभी ठोस कानूनी तर्कों के आधार पर गुजरात उच्च न्यायालय ने अपील को स्वीकार कर लिया और रेलवे दावा न्यायाधिकरण के फैसले को रद्द कर दिया। न्यायालय ने आदेश दिया कि मृत जन्मे बच्चे की मौत के लिए 8 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए।
साथ ही, दुर्घटना की तारीख से राशि चुकाने तक सालाना 9 प्रतिशत ब्याज का भी भुगतान किया जाए। उच्च न्यायालय ने रेलवे प्रशासन को यह पूरी राशि बारह सप्ताह के भीतर न्यायाधिकरण के समक्ष जमा करने का सख्त निर्देश दिया है।
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