सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक बेहद सख्त और स्पष्ट संदेश दिया है कि डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी में शामिल किसी भी आरोपी को आसानी से जमानत नहीं दी जाएगी। अदालत ने साफ किया है कि जब तक कोई बहुत ही ‘असाधारण कारण’ न हो, तब तक ऐसे अपराधियों को हिरासत से रिहा नहीं किया जा सकता।
सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने देश भर के उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों को कड़ा निर्देश दिया है। पीठ ने इस बात पर भारी जोर दिया कि डिजिटल अरेस्ट जैसे घोटाले आम जनता, विशेषकर वरिष्ठ नागरिकों के खिलाफ होने वाले सबसे जघन्य अपराधों में से एक हैं। यह वह उम्र होती है जब बुजुर्गों को अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई की सबसे ज्यादा जरूरत होती है, और धोखेबाज उनके उसी पैसे को चालाकी से उड़ा ले जाते हैं।
सुनवाई के दौरान एक आरोपी ने अदालत से गुहार लगाई कि उसने मुख्य आरोपी की केवल बैंक खाता खोलने में मदद की थी और वह एक साल से अधिक समय से जेल में बंद है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि यह कृत्य भी उसे इस संगीन अपराध में बराबर का भागीदार बनाता है।
आरोपी की जमानत याचिका खारिज करते हुए अदालत ने स्पष्ट किया कि डिजिटल अरेस्ट से जुड़े मामलों में बिना असाधारण परिस्थितियों के कोई राहत नहीं मिलेगी। इससे पहले शुक्रवार को भी इसी पीठ ने कहा था कि पुलिस और जांच एजेंसियों को साइबर धोखाधड़ी में शामिल लोगों के खिलाफ संगठित अपराध विरोधी कानून के तहत कड़ी धाराएं लगानी चाहिए। अदालत ने दो टूक कहा कि डिजिटल अरेस्ट और साइबर धोखाधड़ी के मामलों को सीधे तौर पर ‘लूट और डकैती’ के बराबर माना जाना चाहिए।
पिछले साल भी सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाने वाले इन डिजिटल अरेस्ट मामलों का स्वतः संज्ञान लिया था। अदालत ने तब केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को पूरे भारत में इन मामलों की गहराई से जांच करने का जिम्मा सौंपा था। इसके अलावा, इस बढ़ते खतरे को रोकने और कड़े कदम उठाने के लिए विभिन्न एजेंसियों को मिलाकर एक अंतर-विभागीय तंत्र भी सक्रिय किया गया था।
इस अपराध की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जांच एजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार, अब तक डिजिटल अरेस्ट और साइबर चोरी के जरिए देश भर में भोले-भाले लोगों से करीब 3,000 करोड़ रुपये की भारी-भरकम ठगी की जा चुकी है।
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