अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सेवा केंद्र प्राधिकरण (IFSCA) ने ‘IFSC में एक्सचेंज ट्रेडेड फंड्स की सेकेंडरी लिस्टिंग’ पर एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया है। इसके जरिए बाजार से राय मांगी जा रही है कि न्यूयॉर्क, लंदन, डबलिन या लक्जमबर्ग में पहले से लिस्टेड ग्लोबल ईटीएफ को बिना किसी अनावश्यक जद्दोजहद के गिफ्ट सिटी में कैसे सूचीबद्ध किया जाए। यह लिस्टिंग इंडिया आईएनएक्स या एनएसई आईएफएससी के माध्यम से हो सकेगी।
इसे आप डुअल-लिस्टिंग (दोहरे सूचीकरण) के ईटीएफ संस्करण के रूप में समझ सकते हैं। यह प्रोडक्ट बाजार में पहले से मौजूद है और इसका ट्रैक रिकॉर्ड पूरी तरह से सार्वजनिक होता है। इसके साथ ही, इसके घरेलू बाजार में हर दिन एनएवी (NAV) की गणना की जाती है। इस नई पहल से गिफ्ट सिटी एक ऐसा एक्सचेंज बन जाएगा, जहां निवेशक एक साफ-सुथरे रेगुलेटरी दायरे में डॉलर में बिल्कुल समान यूनिट्स की खरीद-बिक्री कर सकेंगे।
देखा जाए तो इसकी बुनियादी व्यवस्था पहले से ही मौजूद है। मौजूदा आईएफएससीए फंड मैनेजमेंट नियमों के तहत, भारत (आईएफएससी के बाहर) या किसी विदेशी अधिकार क्षेत्र में पहले से लिस्टेड ईटीएफ गिफ्ट सिटी में सेकेंडरी लिस्टिंग कर सकते हैं। इसके लिए उन्हें केवल अपने घरेलू देश के नियमों का पालन करना होगा और इसका आवेदन सीधे एक्सचेंज को जाता है। अगर फंड मैनेजर अपने होम एक्सचेंज के साथ ही अंग्रेजी भाषा के दस्तावेज यहां भी जमा कर दे, तो उसे निरंतर खुलासे (डिस्क्लोजर) के नियमों से भी राहत मिल जाती है।
सबसे अहम बात यह है कि इस शुद्ध सेकेंडरी लिस्टिंग के लिए विदेशी मैनेजर्स को सिर्फ यूनिट्स लिस्ट करने के लिए पूर्ण रजिस्टर्ड एफएमई (रिटेल) लाइसेंस लेने की आवश्यकता नहीं दिखती। वहीं, गिफ्ट सिटी के अधिकार क्षेत्र में बिल्कुल नया ईटीएफ लॉन्च करना एक अलग और काफी बड़ी प्रक्रिया है। सेकेंडरी लिस्टिंग को एक आसान और एक्सचेंज-संचालित विकल्प के तौर पर डिजाइन किया गया है।
यह कदम इस समय इसलिए काफी महत्वपूर्ण है क्योंकि गिफ्ट सिटी ने पिछले कुछ वर्षों में अपना ढांचा बेहद मजबूत किया है। यहां डीएसपी, एडलवाइज, पीपीएफएएस और अन्य कंपनियों के आउटबाउंड फंड्स मौजूद हैं। इसके अलावा, हाल के हफ्तों में एनएसई आईएफएससी पर अमेरिकी शेयरों (अमेज़न, टेस्ला, माइक्रोसॉफ्ट आदि) के अनस्पॉन्सर्ड डिपॉजिटरी रिसीट्स की ट्रेडिंग भी शुरू हो चुकी है। अब यहां फंड मैनेजर्स की संख्या भी लगातार बढ़ रही है।
जियो ब्लैकरॉक को पहले ही अपना एफएमई लाइसेंस मिल चुका है और कंपनी लगातार आउटबाउंड प्रोडक्ट्स व कमोडिटी ईटीएफ को लेकर अपनी योजनाएं साझा कर रही है। वहीं, मिरे एसेट ने भी गिफ्ट सिटी से ईटीएफ लिस्ट करने वाली पहली कंपनियों में शामिल होने की प्रबल इच्छा जताई है।
दुनिया की बड़ी वित्तीय कंपनियां जैसे ब्लैकरॉक, वैनगार्ड और अमुंडी अब तक मुख्य रूप से वितरण के मोर्चे पर या स्थानीय संयुक्त उद्यमों (JVs) के जरिए ही काम कर रही हैं। हालांकि, सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार वैनगार्ड इंडिया आईएनएक्स के जरिए इस सेकेंडरी लिस्टिंग के अवसर पर गंभीरता से विचार कर रहा है। वह निकट भविष्य में अपना ईटीएफ लॉन्च कर सकता है।
सूत्रों का यह भी कहना है कि ब्लैकरॉक गिफ्ट सिटी में एक वेल्थ एडवाइजरी फर्म स्थापित करने के विकल्पों की सक्रिय रूप से तलाश कर रहा है, जिसकी शुरुआत इसी साल हो सकती है। इसके साथ ही, अमुंडी भी इस साल एक ऑफशोर और एक ऑनशोर फंड स्थापित करने की योजना बना रहा है।
माना जा रहा है कि यह कंपनी भी इस नए अवसर का जल्द लाभ उठाने वालों में शामिल होगी। हालांकि, इन तीनों वैश्विक कंपनियों की ओर से अभी तक इस बारे में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।
सेकेंडरी लिस्टिंग इन कंपनियों को एक बेहतरीन मौका देती है। इसके जरिए वे शून्य से एक पूरा नया फंड कॉम्प्लेक्स बनाए बिना, भारतीय और एनआरआई निवेशकों के सामने अपने मौजूदा और उच्च एयूएम (AUM) वाले प्रोडक्ट्स पेश कर सकती हैं।
अगर क्षेत्रीय स्तर पर नजर डालें, तो वहां भी ऐसी ही रणनीति अपनाई जा रही है। हांगकांग और मलेशिया ने हाल ही में डुअल लिस्टिंग और ईटीएफ की पारस्परिक मान्यता को सरल बनाने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। सिंगापुर भी नैस्डैक के साथ फिजिकल गोल्ड ईटीएफ और डुअल-लिस्टिंग ब्रिज को तेजी से बढ़ावा दे रहा है।
वहीं दूसरी ओर, हांगकांग कवर्ड-कॉल और गोल्ड ईटीएफ को टोकनाइज कर रहा है। हर देश सीमा पार उत्पाद पहुंच की राह में आने वाली रुकावटों को कम करने की कोशिश में लगा है।
गिफ्ट सिटी में कंपनियों के लिए काम करने का एक स्पष्ट तरीका सामने आ रहा है, फिर चाहे वे पहले से यहां मौजूद हों या अभी सिर्फ बाजार का रुख देख रही हों। इसके तहत सबसे पहले उन ईटीएफ को चुना जाता है जिनकी सेकेंडरी मार्केट में अच्छी लिक्विडिटी है और उनका घरेलू रेगुलेशन पारदर्शी है। इसके बाद इंडिया आईएनएक्स या एनएसई आईएफएससी में लिस्टिंग एप्लिकेशन फाइल की जाती है।
इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए यह सुनिश्चित करना होता है कि होम एक्सचेंज के सभी खुलासे अंग्रेजी में नियमित तौर पर होते रहें। अंत में यह तय करना होता है कि स्थानीय बाजार बनाने के लिए या क्रिएशन/रिडेम्प्शन भागीदार के रूप में किसी मदद की जरूरत है या नहीं। यहीं पर एक स्थानीय एफएमई या ब्रोकर के साथ संबंध उपयोगी साबित होता है, भले ही लिस्टिंग के लिए यह अनिवार्य न हो।
हालांकि, असली चुनौती व्यावसायिक है। बाजार को 64,000 डॉलर (या यों कहें कि कई अरब डॉलर) के इस सबसे बड़े सवाल का जवाब देना होगा कि क्या भारतीय एलआरएस (LRS) का पैसा और एनआरआई के डॉलर वास्तव में स्थानीय रूप से पैकेज्ड फंड-ऑफ-फंड की तुलना में सेकेंडरी लिस्टेड शेयरों के लिए आएंगे?
निष्कर्ष के तौर पर, आईएफएससीए कोई नया क्रांतिकारी प्रोडक्ट नहीं बना रहा है। वह बस पहले से मौजूद एक रास्ते को बेहतर बना रहा है और इंडस्ट्री से राय ले रहा है कि इस प्रक्रिया को निवेशकों के लिए और अधिक सुगम कैसे बनाया जाए।
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