लगातार कई वर्षों तक वायु गुणवत्ता में सुधार के बाद, अब अहमदाबाद शहर की आबोहवा फिर से बिगड़ने लगी है। नेशनल क्लीन एयर प्रोग्राम (NCAP) के तहत प्रदूषण कम करने में मिली शानदार कामयाबी की रफ्तार अब धीमी पड़ गई है। ताजा रिपोर्ट के मुताबिक शहर में पार्टिकुलेट मैटर यानी PM10 का स्तर एक बार फिर बढ़ने लगा है।
केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा जारी किए गए नए आंकड़ों ने चिंताएं बढ़ा दी हैं। इन आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, साल 2025-26 में अहमदाबाद का औसत वार्षिक PM10 स्तर बढ़कर 101 µg/m³ हो गया है। जबकि इससे पहले 2023-24 में यह आंकड़ा 98 µg/m³ दर्ज किया गया था।
इससे पहले शहर ने वायु प्रदूषण से निपटने में एक बेहतरीन मिसाल पेश की थी। साल 2017-18 के NCAP बेसलाइन (164 µg/m³) की तुलना में अहमदाबाद ने अपने PM10 स्तर में 38.4 प्रतिशत की बड़ी गिरावट दर्ज की थी। उस शानदार प्रदर्शन के चलते शहर को इस प्रोग्राम के तहत सबसे अच्छा काम करने वाले शहरों में गिना जाने लगा था।
ताजा आंकड़े इस बात की गवाही दे रहे हैं कि पहले हासिल की गई कामयाबी को शहर ने काफी हद तक बरकरार तो रखा है, लेकिन प्रदूषण कम करने के इस ग्राफ को लगातार नीचे बनाए रखना अब प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है।
प्रसिद्ध जन स्वास्थ्य विशेषज्ञ डॉ. दिलीप मावलंकर इस बढ़ोतरी के पीछे शहर में चल रही धूल उड़ाने वाली गतिविधियों को जिम्मेदार मानते हैं। उनका कहना है कि निर्माण कार्यों और सड़कों पर दौड़ते वाहनों के कारण उड़ने वाली धूल से ही PM10 प्रदूषण सबसे ज्यादा पैदा होता है।
डॉ. मावलंकर ने स्पष्ट किया कि अहमदाबाद में तेजी से हो रहे निर्माण कार्यों को देखते हुए अगर धूल नियंत्रण के सख्त उपाय नहीं किए गए, तो आने वाले समय में यह उत्सर्जन और बढ़ेगा। बढ़े हुए PM10 स्तर से लगातार खांसी, ऊपरी श्वसन तंत्र में जलन और संक्रमण जैसी गंभीर सांस की बीमारियां हो सकती हैं। इसके कारण बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस की बीमारियों से जूझ रहे लोगों में आंखों की जलन की समस्या भी काफी बढ़ सकती है।
प्रदूषण बढ़ने का यह सिलसिला सिर्फ अहमदाबाद तक सीमित नहीं है, बल्कि गुजरात के अन्य शहरों का भी यही हाल है। राज्य के चार NCAP शहरों में से तीन ने पिछले दो वर्षों की तुलना में इस बार अधिक वार्षिक PM10 स्तर दर्ज किया है।
वडोदरा में सबसे तेज उछाल देखा गया, जहां 2023-24 के 95 µg/m³ के मुकाबले 2025-26 में PM10 का स्तर बढ़कर 119 µg/m³ तक पहुंच गया। इसी तरह राजकोट का वार्षिक औसत भी 92 µg/m³ से बढ़कर 98 µg/m³ हो गया है। हालांकि, इन सबके बीच सूरत एकमात्र ऐसा शहर रहा जिसने शानदार सुधार दिखाया और अपना PM10 स्तर 103 µg/m³ से घटाकर 87 µg/m³ पर ला दिया।
पर्यावरणविद् महेश पंड्या का मानना है कि शहर की खस्ताहाल सड़कें और निजी वाहनों पर बढ़ती निर्भरता इस धूल प्रदूषण को और ज्यादा खतरनाक बना रही है। उनके मुताबिक अहमदाबाद के अधिकांश इलाकों में कोई उद्योग नहीं हैं, फिर भी PM10 का स्तर अधिक होना यह साबित करता है कि सड़क की धूल ही इसका मुख्य कारण है।
सड़कों की बार-बार खुदाई और मरम्मत से भारी मात्रा में धूल जमा होती है, जो यातायात के कारण हवा में घुल जाती है। पंड्या बताते हैं कि सार्वजनिक परिवहन की कमी के कारण लोग निजी वाहनों का रुख कर रहे हैं, जिससे स्थिति और बिगड़ रही है। इसके अलावा, काटे जा रहे पेड़ों की सही भरपाई न होने से वह प्राकृतिक सुरक्षा कवच भी खत्म हो रहा है जो धूल को रोकने का काम करता था।
ताजा वृद्धि के बाद, वडोदरा अब राज्य में सबसे अधिक वार्षिक PM10 और PM2.5 सांद्रता वाला शहर बन गया है और उसने अहमदाबाद को पीछे छोड़ दिया है। इस चिंताजनक सूची में अहमदाबाद ने अब चार NCAP शहरों के बीच दूसरा स्थान ले लिया है।
अहमदाबाद का वार्षिक PM2.5 स्तर 39 µg/m³ दर्ज किया गया है, जो 40 µg/m³ के राष्ट्रीय वार्षिक मानक से बस थोड़ा ही नीचे है। वहीं दूसरी तरफ, वडोदरा 49 µg/m³ के आंकड़े के साथ इस तय राष्ट्रीय सीमा को भी पार कर गया है।
NCAP बेसलाइन वर्ष के बाद से किए गए तमाम सुधारों के बावजूद, अहमदाबाद, वडोदरा, राजकोट और सूरत अभी भी 60 µg/m³ के वार्षिक PM10 मानक को पार कर रहे हैं। इस कारण ये सभी शहर अभी भी इस राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत ‘नॉन-अटेनमेंट’ (लक्ष्य न हासिल कर पाने वाले) शहरों की सूची में बने हुए हैं।
हाल ही में दिए गए एक संसदीय जवाब में यह स्पष्ट किया गया था कि जो शहर नियमित रूप से अपने वार्षिक PM10 मानकों को पूरा करने में विफल रहते हैं, उन्हें स्वतः ही ‘नॉन-अटेनमेंट’ श्रेणी में डाल दिया जाता है।
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