गुजरात में पुलिस द्वारा हथियारों के इस्तेमाल के बढ़ते मामलों ने एक बार फिर से नई बहस छेड़ दी है। हाल ही में आनंद जिले में एक चार साल की मासूम से दुष्कर्म और हत्या के आरोपी सुरेश परमार की पुलिस फायरिंग में मौत हो गई। पुलिस के अनुसार, जांच के दौरान आरोपी ने अधिकारियों पर चाकू से जानलेवा हमला कर दिया था, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में जवानों को गोली चलानी पड़ी।
यह कोई इकलौती घटना नहीं है बल्कि राज्य में पुलिस कार्रवाई का एक नया पैटर्न उभर कर सामने आ रहा है। आधिकारिक आंकड़ों पर गौर करें तो मई 2025 से जुलाई 2026 के बीच गुजरात पुलिस ने 18 अलग-अलग घटनाओं में गोलियां चलाई हैं। इन 15 महीनों में हुए एनकाउंटर में दो आरोपियों की जान जा चुकी है। वहीं, बाकी 16 मामलों में आरोपी घायल हुए हैं, जिनमें से ज्यादातर के पैरों में गोलियां लगी हैं।
सुरेश परमार के मामले से पहले पिछले साल 24 सितंबर 2025 को भी बिल्कुल ऐसी ही एक घटना सामने आई थी। तब गांधीनगर में हत्या और दुष्कर्म के एक अन्य आरोपी विपुल परमार को पुलिस ने मार गिराया था। उस वक्त अधिकारियों ने बताया था कि क्राइम सीन रीक्रिएशन के दौरान विपुल ने एक पुलिसकर्मी की सर्विस रिवॉल्वर छीन ली थी और टीम पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी थी।
इस 15 महीने की समयावधि में दिसंबर 2025 का महीना सबसे ज्यादा उथल-पुथल वाला रहा। अकेले इसी महीने में पुलिस फायरिंग की छह घटनाएं दर्ज की गईं। ये मामले हत्या और रेप जैसे गंभीर अपराधों से लेकर शराबबंदी कानून के उल्लंघन से भी जुड़े थे। इन सभी मामलों में पुलिस का लगातार यही दावा रहा कि आरोपियों ने या तो गिरफ्तारी का विरोध किया, भागने की कोशिश की, या फिर टीम पर हमला किया।
डेटा का गहराई से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि ज्यादातर फायरिंग की नौबत क्राइम सीन को दोहराने, वारदात में इस्तेमाल हथियार या सबूत बरामद करने और आरोपियों को हिरासत से भागने से रोकने के दौरान आई है। इन 18 घटनाओं में से तीन में सीधे तौर पर स्टेट मॉनिटरिंग सेल शामिल थी। इसके अलावा, दो मामले ऐसे भी थे जो किसी व्यक्तिगत जांच से नहीं, बल्कि बेकाबू भीड़ को नियंत्रित करने से जुड़े थे।
भले ही इन दर्ज मामलों की प्रकृति एक-दूसरे से काफी अलग रही हो, लेकिन पुलिस का आधिकारिक स्पष्टीकरण हर बार लगभग एक जैसा ही रहा है। विभाग का साफ तौर पर कहना है कि आग्नेयास्त्रों (हथियारों) का इस्तेमाल हमेशा एकदम आखिरी विकल्प के रूप में किया गया। पुलिस के मुताबिक, जब भी आरोपियों ने चाकू या बंदूक से हमला कर जवानों की जान खतरे में डाली या हिरासत से फरार होने का प्रयास किया, सिर्फ उसी स्थिति में आत्मरक्षा के लिए गोलियां चलाई गईं।
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