अहमदाबाद: गुजरात उच्च न्यायालय ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जो कानूनी दांव-पेच से ऊपर उठकर मानवीय संवेदनाओं को छूता है। अदालत ने एक बुजुर्ग दंपति को आईवीएफ (IVF) तकनीक के जरिए फिर से माता-पिता बनने की अनुमति दे दी है।
इससे पहले, नए कानून के तहत निर्धारित अधिकतम उम्र सीमा का हवाला देते हुए उनके आवेदन को खारिज कर दिया गया था। अपने जवान बेटे को खोने के बाद दर्द से गुजर रहे इस जोड़े के लिए कोर्ट का यह रुख एक नई उम्मीद लेकर आया है।
इस दंपति ने साल 2022 में अपने 25 वर्षीय बेटे को खो दिया था। उनका बेटा जयपुर नेशनल यूनिवर्सिटी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च सेंटर में मेडिकल की पढ़ाई कर रहा था, जहां उसने आत्महत्या कर ली थी। इस हृदय विदारक घटना ने माता-पिता को बुरी तरह तोड़ दिया था। इस असहनीय दुख से उबरने की कोशिश में, दोनों ने एक बार फिर से संतान प्राप्ति का फैसला किया।
चूंकि महिला मेनोपॉज (रजोनिवृत्ति) से गुजर चुकी हैं और प्राकृतिक रूप से गर्भधारण नहीं कर सकती हैं, इसलिए वे मदद के लिए मेहसाणा के एक एआरटी (ART) क्लिनिक पहुंचे। लेकिन वहां डॉक्टर ने उनका मामला लेने से साफ इनकार कर दिया।
डॉक्टर ने इसके पीछे ‘असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (रेगुलेशन) एक्ट, 2021’ का हवाला दिया। इस कानून के तहत आईवीएफ के लिए महिलाओं की उम्र 21 से 50 वर्ष और पुरुषों की उम्र 21 से 55 वर्ष निर्धारित की गई है। इस मामले में पत्नी की उम्र 50 को पार कर चुकी है, जबकि पति की उम्र 54 साल है।
क्लिनिक से निराशा मिलने के बाद, दंपति ने 31 मई को अनुमति के लिए जिला चिकित्सा अधिकारी को आवेदन दिया। हालांकि, उम्र की इस कानूनी सीमा के कारण 3 जुलाई को उनका यह अनुरोध भी ठुकरा दिया गया। इसके बाद अपनी आखिरी उम्मीद लिए उन्होंने गुजरात हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अदालत में याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए वकील मोहित बैंकर ने मजबूती से अपना पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि ऐसे मामलों में पात्रता का आकलन हर केस की परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग किया जाना चाहिए।
उनका मुख्य तर्क यह था कि यदि दोनों में से कोई एक साथी वैधानिक आयु सीमा के भीतर आता है, तो उन्हें इलाज के अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। अपने दावों को पुख्ता करने के लिए उन्होंने पहले के कुछ अहम अदालती फैसलों का भी संदर्भ दिया।
सरकारी अधिकारियों ने शुरुआत में इस याचिका का विरोध जरूर किया, लेकिन वे याचिकाकर्ता के वकील द्वारा उठाए गए कानूनी बिंदुओं को काट नहीं सके।
मामले की पूरी सुनवाई के बाद जस्टिस निर्जर देसाई ने अपना फैसला सुनाते हुए दंपति को राहत दी। उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड देखने पर पता चलता है कि पत्नी ने भले ही अधिनियम की धारा 21(जी) के तहत निर्धारित 50 वर्ष की अधिकतम आयु सीमा पार कर ली है, लेकिन पति की उम्र 54 वर्ष है। इसलिए, वह आईवीएफ उपचार से गुजरने के लिए पूरी तरह से पात्रता मानदंडों के अंतर्गत आते हैं।
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